नई दिल्ली के सत्य निकेतन क्षेत्र में हुआ खतरनाक इमारत का ढह जाना केवल सीमेंट और ईंटों का बिखरा हुआ मलबा नहीं है, बल्कि यह उन तमाम परिवारों के लिए कभी न खत्म होने वाले आंसुओं और डरावने इंतजार का सबब बन चुका है, जिनके बच्चे इस दुर्घटना की चपेट में आए। हालांकि इस बड़ी घटना को बीते हुए तीस घंटे से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन एक बेबस और परेशान बहन अपने लापता भाई की तलाश में राजधानी की सड़कों, अस्पतालों और प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है, जहां उसकी दर्द भरी पुकार सुनने वाला कोई नहीं दिखाई दे रहा। इस गंभीर हादसे के बाद से लापता हुए छात्र पवन की बहन प्रियांशी ने बेहद भारी और रुंधे गले से अपनी इस दुखद आपबीती को साझा किया है।
सोशल मीडिया के जरिए मिली हादसे की भयानक खबर
प्रियांशी ने जानकारी दी कि उसे इस दिल दहला देने वाली घटना की सूचना किसी भी सरकारी अधिकारी या पुलिस महकमे की तरफ से नहीं मिली, बल्कि उसने सोशल मीडिया के माध्यम से इसके बारे में जाना। प्रियांशी का कहना है कि उसे इंटरनेट और सोशल प्लेटफॉर्म्स से पता चला कि साउथ कैंपस के सत्य निकेतन में एक इमारत भरभराकर गिर चुकी है और उसका भाई उसी के भीतर फंसा हुआ है। वह बिना कुछ सोचे-समझे तुरंत बदहवास हालत में उस जगह पर पहुंच गई, लेकिन वहां उसे किसी भी तरह की ठोस जानकारी मुहैया नहीं कराई जा रही है। न तो प्रशासन का कोई नुमाइंदा उससे किसी तरह की बात कर रहा है और न ही यह स्पष्ट कर रहा है कि उसके भाई को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है या नहीं, या फिर उसे किस अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
महज एक महीने पहले ही पीजी में शिफ्ट हुआ था पवन
पीड़ित बहन ने बताया कि उसका भाई पवन केवल एक महीना पहले ही इस पीजी आवास में रहने के लिए आया था। दुर्घटना होने से ठीक पिछली रात ही दोनों भाई-बहन आपस में बातचीत कर रहे थे। किसी को इस बात का दूर-दूर तक अंदाजा नहीं था कि मुस्कुराते हुए और हंसकर बात करने वाला भाई अगली ही सुबह मलबे के ढेर और सन्नाटे के ऐसे गहरे अंधकार में हमेशा के लिए गुम हो जाएगा। सत्य निकेतन की इस घटना ने साफ तौर पर यह उजागर कर दिया है कि जब लापरवाही की दीवारें ढहती हैं, तो उनके मलबे के नीचे केवल ईंट-पत्थर नहीं दबते, बल्कि कई मासूमों की सांसें और उनके परिवारों की खुशियां भी हमेशा के लिए दफन हो जाती हैं।
अस्पतालों की दौड़ और हर दरवाजे पर मिलती निराशा
घटना की जानकारी मिलते ही प्रियांशी सबसे पहले एम्स ट्रॉमा सेंटर के लिए रवाना हुई। वहां इलाज के लिए लाए गए हर एक घायल छात्र के चेहरे से पट्टी हटाकर उसने अपने भाई को बड़ी उम्मीद के साथ ढूंढा। मगर अस्पताल के आईसीयू और वार्डों से लेकर इमरजेंसी तक, उसे पवन का दूर-दूर तक कोई सुराग हाथ नहीं लगा। तीस घंटे से भी अधिक का लंबा समय बीत जाने के बाद, उस मलबे के ढेर के सामने खड़ी प्रियांशी की आंखें अब पूरी तरह से पथरा चुकी हैं। प्रशासनिक अमले का कोई भी व्यक्ति इस स्थिति में नहीं है जो यह बता सके कि पवन अभी भी मलबे के नीचे दबा हुआ है या उसे किसी अन्य अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया है। एक बहन के लिए यह अनिश्चितता का इंतजार किसी जीते-जी मिलने वाली सजा से कम नहीं है।
छात्र संगठनों की मदद और नेताओं की बयानबाजी
लापता छात्र पवन को ढूंढने के प्रयासों में अब विभिन्न छात्र संगठन भी आगे बढ़कर मदद का हाथ बढ़ा रहे हैं। एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने मीडिया को बताया कि पवन की तस्वीर को तमाम प्रमुख छात्र समूहों और व्हाट्सएप ग्रुप्स पर धड़ल्ले से शेयर किया जा रहा है ताकि यदि वह किसी भी अस्पताल में भर्ती हो, तो उसकी आसानी से पहचान की जा सके। विनोद जाखड़ ने आगे कहा कि वे लोग लगातार स्थानीय प्रशासन के संपर्क में बने हुए हैं और ईश्वर से यही प्रार्थना कर रहे हैं कि पवन पूरी तरह सुरक्षित मिल जाए। हालांकि एक तरफ जहां प्रशासनिक अधिकारी अपनी पीठ थपथपाने और औपचारिकताएं पूरी करने में जुटे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ एक बेसहारा बहन अस्पतालों के गलियारों में अपने भाई का नाम लेकर लगातार भटक रही है और उसका केवल एक ही सवाल है कि मेरा भाई पवन कहां है?



















