प्रवर्तन निदेशालय की कार्यप्रणाली और कानूनी अधिकारों को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यह एजेंसी कोई सुपर कॉप नहीं है जो अपनी मर्जी से किसी भी मामले में दखल दे सके। हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि किसी अन्य जांच एजेंसी ने मूल अपराध के मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है, तो ईडी उस आधार पर अपने स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग का दायरा आगे नहीं बढ़ा सकती।
विधायक के खिलाफ दर्ज ईसीआईआर और कार्यवाही रद्द
जस्टिस एमआई अरुण ने शुक्रवार को यह अहम फैसला सुनाते हुए कांग्रेस विधायक केवाई नांजे गौड़ा और अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज एनफोर्समेंट केस इंफॉर्मेशन रिपोर्ट यानी ईसीआईआर को पूरी तरह से रद्द कर दिया। यह पूरा कानूनी विवाद कोलार-चिक्काबल्लापुर मिल्क यूनियन में सामने आई कथित अनियमित भर्तियों से जुड़ा हुआ था। इस मामले में दाखिल की गई कुल पांच अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने यह आदेश जारी किया है।
मूल अपराध पर निर्भर है ईडी की जांच की ताकत
अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानी पीएमएलए के तहत ईडी को मिलने वाली जांच की ताकत कोई स्वतंत्र या बुनियादी अधिकार नहीं है। यह पूरी तरह से किसी अन्य प्राथमिक जांच एजेंसी द्वारा दर्ज की गई एफआईआर या औपचारिक शिकायत पर निर्भर करती है। जस्टिस एमआई अरुण के अनुसार, एजेंसी केवल अपने स्तर पर किसी शक के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू करने का अधिकार नहीं रखती है।
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जब तक कोई दूसरी अधिकृत एजेंसी कानून के तहत सूचीबद्ध किसी अपराध में एफआईआर दर्ज नहीं करती, तब तक पीएमएलए के प्रावधानों के तहत आगे की कानूनी कार्रवाई संभव नहीं है। यदि मूल अपराध का मामला ही कानूनी तौर पर समाप्त हो जाता है या आरोपी के पक्ष में उसका निपटारा हो जाता है, तो उस बुनियाद पर चल रही मनी लॉन्ड्रिंग की जांच स्वतः ही बेमानी हो जाती है।
क्या था जमीन आवंटन और क्लोजर रिपोर्ट से जुड़ा विवाद
इस पूरे कानूनी प्रकरण की शुरुआत 30 नवंबर 2023 को हुई थी जब ईडी ने जमीन आवंटन से जुड़े एक पुराने मामले के आधार पर अपनी जांच शुरू की थी। आरोप यह लगाया गया था कि जब केवाई नांजे गौड़ा मालूर लैंड ग्रांट कमेटी के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत थे, तब उन्होंने करीब 80 एकड़ जमीन कुल 38 लोगों के पक्ष में आवंटित करने की संस्तुति की थी।
इस सिलसिले में एक निजी शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने क्राइम नंबर 489/2022 के तहत मामला दर्ज किया था। हालांकि यह मामला कभी भी अदालत में ट्रायल के स्तर तक नहीं पहुंच पाया क्योंकि पुलिस ने इसमें अपनी क्लोजर रिपोर्ट लगा दी थी। इसके अलावा आवश्यक सरकारी मंजूरी न मिलने की वजह से ट्रायल कोर्ट ने भी अभियोजन पक्ष के अभाव में इस मामले को खारिज कर दिया था।
विधायक को बड़ी राहत और पीएमएलए की सीमाएं तय
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि मूल मामले में आए उस आदेश को अब अंतिम रूप मिल चुका है। ऐसी स्थिति में जब प्राथमिक अपराध से जुड़ी कोई कार्यवाही ही अस्तित्व में नहीं बची है, तो ईडी उसी पुराने आधार पर पीएमएलए के तहत अपनी जांच को जारी रखने का अधिकार नहीं रखती है।
इस अदालत के फैसले से कांग्रेस विधायक केवाई नांजे गौड़ा समेत तमाम अन्य याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट की इस टिप्पणी ने स्पष्ट कर दिया है कि मनी लॉन्ड्रिंग के किसी भी मामले की जांच आगे बढ़ाने के लिए एक मजबूत और वैध मूल अपराध का होना अनिवार्य शर्त है, जिसके अभाव में ईडी मनमाने ढंग से कार्रवाई नहीं कर सकती।



















