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न्याय प्रणाली की लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, छह साल जेल में बिताने वाले बेकसूर को छह लाख रुपये मुआवजा देने का आदेशअपराध
27 अक्तू॰ 2026, 9:41 am (2 दिन पहले)· 1

न्याय प्रणाली की लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, छह साल जेल में बिताने वाले बेकसूर को छह लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की लापरवाही भरी जांच पर कड़ी नाराजगी जताई है और छह साल तक जेल में रहे बेकसूर व्यक्ति को छह लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि केवल कयासों के आधार पर गढ़ी गई कहानी से एक नागरिक के जीवन के बहुमूल्य साल बर्बाद हो गए।

सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए राज्य सरकार को एक विचाराधीन कैदी को छह लाख रुपये का मुआवजा देने का सख्त निर्देश 26 अक्टूबर को दिया है। शीर्ष अदालत ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि कैसे महज अटकलों और मनगढ़ंत कहानियों के आधार पर एक निर्दोष व्यक्ति के जीवन के छह महत्वपूर्ण वर्ष सलाखों के पीछे बीत गए। अदालत ने माना कि यह मामला न्याय व्यवस्था के गंभीर उपहास का एक सटीक उदाहरण है और पीड़ित व्यक्ति पूरी तरह से इस लचर व्यवस्था का शिकार बना है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ की दो टूक

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की इस महत्वपूर्ण पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि राज्य सरकार नागरिकों की सुरक्षा करने के अपने मूल दायित्व से कभी पीछे नहीं हट सकती है। अदालत ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति तब तक पूरी तरह से निर्दोष माना जाता है, जब तक कि अदालत में उसका अपराध साबित न हो जाए। इसके साथ ही, न्यायालय ने अभियोजन और जांच एजेंसियों को याद दिलाया कि उनका प्राथमिक उद्देश्य केवल किसी भी कीमत पर दोषसिद्धि हासिल करना नहीं होना चाहिए, बल्कि सच्चाई को सामने लाना होना चाहिए।

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न्याय प्रणाली की भूमिका और निष्पक्षता

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि इन सभी एजेंसियों को खुद को न्याय प्रणाली का एक अभिन्न हिस्सा मानना बेहद जरूरी है। इनका असली काम न केवल शिकायतकर्ता, पीड़ित और घायल व्यक्ति को न्याय दिलाना है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि आरोपी के साथ भी किसी प्रकार का अन्याय न हो। अदालत ने टिप्पणी की कि हालांकि कई मामलों में न्याय प्रक्रिया कमजोर नजर आती है, लेकिन वर्तमान मामला इतना अधिक चौंकाने वाला और स्पष्ट है कि इसमें पीड़ित को मुआवजा दिया जाना पूरी तरह से न्यायसंगत है क्योंकि वह पूरी व्यवस्था की खामियों का शिकार हुआ है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ याचिका

शीर्ष अदालत का यह बहुप्रतीक्षित फैसला एक आरोपी की तरफ से दायर की गई याचिका पर आया है। इस याचिका में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी गई थी जिसमें जनवरी के महीने में आगरा में दर्ज हुए एक मामले में आरोपी को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि 23 मार्च को उसने निचली अदालत को यह सख्त निर्देश दिया था कि वह आगामी तीन महीने के भीतर इस पूरे मामले की सुनवाई को हर हाल में पूरा करे।

सुनवाई पूरी होने के बाद बरी हुआ आरोपी

सर्वोच्च अदालत के निर्देशों का पालन करते हुए तय समय सीमा के भीतर सुनवाई की प्रक्रिया पूरी कर ली गई, जिसके अंत में याचिकाकर्ता को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। अदालत ने इस मामले को इस बात का एक क्लासिक उदाहरण बताया कि आपराधिक मामलों में कभी भी इस स्तर की लापरवाही भरी जांच नहीं होनी चाहिए। ऐसी दोषपूर्ण जांच के कारण ही अभियोजन पक्ष ने एक आम नागरिक के जीवन और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बहुत बड़े खतरे में डाल दिया था।

चौदह नवंबर 2019 से जेल में बंद था पीड़ित

न्यायालय की पीठ ने अपने आदेश में इस अहम तथ्य पर विशेष गौर किया कि याचिकाकर्ता को 14 नवंबर 2019 से लगातार जेल में बंद रखा गया था। अदालत ने इस स्थिति को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया कि बिना किसी ठोस सबूत के भी उस व्यक्ति को पूरे छह साल तक एक विचाराधीन कैदी की तरह जेल की यातनाएं झेलनी पड़ीं। बेहद लचर और गैर-जिम्मेदाराना जांच के बल पर अव्यवस्थित ढंग से मुकदमा चलाया गया, हालांकि राहत की बात यह रही कि अंततः आरोपी को अदालत से सम्मानजनक बरी कर दिया गया।

एक महीने के भीतर मुआवजा देने का आदेश

जांच प्रक्रिया और अभियोजन के इस पूरे तौर-तरीके पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका का आधिकारिक तौर पर निपटारा कर दिया। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को यह स्पष्ट निर्देश दिया कि वह एक महीने की अवधि के भीतर याचिकाकर्ता के बैंक खाते में छह लाख रुपये की मुआवजा राशि का भुगतान करे। हालांकि, इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि हिरासत में काटे गए इन अनमोल वर्षों की भरपाई के लिहाज से यह मुआवजा राशि काफी कम है।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को क्या निर्देश दिया है?
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को छह साल तक जेल में रहने वाले बेकसूर व्यक्ति को एक महीने के भीतर छह लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
याचिकाकर्ता कब से जेल में बंद था?
याचिकाकर्ता 14 नवंबर 2019 से जेल में बंद था और उसे विचाराधीन कैदी के रूप में रखा गया था।
इस मामले की सुनवाई किन जजों की पीठ ने की?
यह फैसला जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ द्वारा सुनाया गया।
याचिकाकर्ता को किस अदालत से राहत मिली?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा जनवरी में जमानत खारिज किए जाने के बाद याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से राहत मिली और वह बरी हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों के बारे में क्या कहा?
अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों का काम केवल दोषसिद्धि करना नहीं है, बल्कि आरोपी के साथ भी न्याय सुनिश्चित करना है क्योंकि वे न्याय प्रणाली का अहम हिस्सा हैं।
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टिप्पणियाँ 5

Li Wei@li-wei·1 दिन पहले

छह साल किसी की जिंदगी से छीनने के बाद सिर्फ छह लाख रुपये का मुआवजा बहुत कम लगता है। क्या इतनी सी रकम से उस आदमी के बर्बाद हुए साल वापस आ जाएंगे?

Dr. Aditya Sharma@aditya-sharma·1 दिन पहले

छह साल किसी की जिंदगी से छीन लेना और फिर बस छह लाख देकर बात खत्म कर देना, कौन सा न्याय है?

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·1 दिन पहले

आदित्य जी, बात तो बिल्कुल सही है। छह साल की बर्बादी की भरपाई छह लाख रुपये से कभी नहीं हो सकती।

Rohan Verma@rohan-verma·1 दिन पहले

छह साल किसी की ज़िंदगी के बहुत होते हैं यार। जब आगरा कवर करने जाता हूँ और ऐसे बेकसूर लोगों से मिलता हूँ, तो सोचता हूँ कि पुलिस की ऐसी लापरवाही का ज़िम्मा कौन लेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

रोहन भाई, बिल्कुल सही कहा। छह साल जेल में बिताने के बाद छह लाख रुपये का मुआवजा भी उस शख्स की बर्बाद जिंदगी वापस नहीं ला सकता। पुलिस की इस लापरवाही पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।

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