तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद अपने ऐतिहासिक किलों, भव्य महलों और अनूठी वास्तुकला के लिए दुनिया भर में मशहूर है। इसी शहर के नौबत पहाड़ पर एक ऐसी शानदार इमारत स्थित है, जिसने समय के साथ कई दौर देखे हैं। इसे हिल फोर्ट पैलेस के नाम से जाना जाता है। एक जमाने में न्यायधीश का निजी आवास, फिर निज़ाम रियासत के शहज़ादे का शाही महल, उसके बाद शहर का पहला फाइव-स्टार हेरिटेज होटल और आज केवल एक वीरान खंडहर, इस इमारत की दास्तान किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। रखरखाव के अभाव में बदहाली के आंसू बहा रही यह धरोहर अपने पुराने गौरव को वापस पाने का इंतजार कर रही है।
नवाब निजामत जंग का सपना और यूरोपीय वास्तुकला
इस आलीशान पैलेस का निर्माण वर्ष 1915 में हुआ था। उस दौर में हैदराबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नवाब सर निजामत जंग बहादुर ने अपने व्यक्तिगत निवास के रूप में इसे बनवाया था। दरअसल, निजामत जंग साहब को सांस लेने की बीमारी थी, जिसके चलते डॉक्टरों ने उन्हें किसी ऊंची, खुली और ताजी हवा वाली जगह पर रहने की सलाह दी थी। इसी वजह से उन्होंने शहर की हलचल से दूर नौबत पहाड़ की ऊंचाई को चुना। निजामत जंग ने अपनी उच्च शिक्षा इंग्लैंड में पूरी की थी। वहां के विशाल किलों और महलों की वास्तुकला से वे काफी प्रभावित थे। यही कारण था कि उन्होंने इस महल का नक्शा भी यूरोपीय किलों की तर्ज पर ही तैयार करवाया, जिसमें बड़े-बड़े खंभे, ऊंचे हॉल और मेहराबदार खिड़कियां शामिल थीं।
सातवें निज़ाम की खरीदारी और शाही महफिलों का दौर
महल बनने के कुछ ही सालों बाद इसका इतिहास एक नया मोड़ लेने वाला था। वर्ष 1929 में नवाब निजामत जंग ने सादगी भरा जीवन अपनाने का संकल्प लिया और इस भव्य महल को बेचने का मन बनाया। उस समय हैदराबाद के सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली खान की नजर इस आलीशान इमारत पर पड़ी। उन्हें यह महल इतना पसंद आया कि उन्होंने बिना किसी देरी के इसे खरीद लिया। निज़ाम ने यह खूबसूरत संपत्ति अपने छोटे बेटे प्रिंस मोअज्जम जाह और उनकी पत्नी प्रिंसेस नीलोफर को रहने के लिए तोहफे के तौर पर सौंप दी। शाही परिवार का हिस्सा बनते ही हिल फोर्ट पैलेस में नई जान आ गई। प्रिंस मोअज्जम जाह अपनी शानदार और रंगीन रातों की महफिलों के लिए जाने जाते थे। महल के हरे-भरे बगीचे, विशाल डांस हॉल और जगमगाते कमरे कई दशकों तक भव्य शाही दावतों, संगीत समारोहों और सांस्कृतिक आयोजनों के गवाह बने रहे।
हैदराबाद का पहला फाइव-स्टार हेरिटेज होटल
1947 में देश की आजादी और उसके बाद रियासतों के विलय के साथ ही हैदराबाद का शाही शासन समाप्त हो गया। इसके बाद यह ऐतिहासिक महल सरकारी नियंत्रण में आ गया। साल 1955 में राज्य सरकार ने इस जगह का व्यावसायिक और सांस्कृतिक इस्तेमाल करने के लिए इसे प्रसिद्ध रिट्स होटल कंपनी को पट्टे यानी किराए पर दे दिया। रिट्स कंपनी ने इस इमारत को हैदराबाद के सबसे पहले और सबसे आलीशान फाइव-स्टार हेरिटेज होटल के रूप में तब्दील कर दिया। होटल बनने के बाद यहाँ देश और दुनिया भर से आने वाले दिग्गज राजनेता, विदेशी मेहमान, वीआईपी और मशहूर हस्तियां ठहरने लगीं। यहाँ की शाही मेहमाननवाजी और अनूठा माहौल पूरे देश में चर्चा का विषय बना रहा।
कानूनी पचड़े, तालेबंदी और जीर्ण-शीर्ण वर्तमान
कई दशकों तक अपनी कामयाबी का परचम लहराने के बाद 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में इस इमारत पर संकट के बादल मंडराने लगे। कुछ उलझे हुए कानूनी विवादों, मालिकाना हक के मामलों और प्रशासनिक अड़चनों के कारण होटल प्रबंधन मुश्किल में पड़ गया। आखिरकार साल 1997 में इस ऐतिहासिक होटल पर हमेशा के लिए ताला लगा दिया गया। होटल बंद होते ही इस परिसर की सारी रौनक और चहल-पहल गायब हो गई। वर्तमान में यह खूबसूरत ऐतिहासिक धरोहर पूरी तरह से सुनसान और जर्जर अवस्था में पहुंच चुकी है। देखरेख न होने की वजह से इसकी दीवारें दरक रही हैं, छतें ढहने की कगार पर हैं और चारों ओर सन्नाटा पसरा है। यह संपत्ति अब तेलंगाना पर्यटन विभाग के अधीन है। हैदराबाद के इतिहास प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों द्वारा लगातार मांग की जा रही है कि सरकार इसका तुरंत रेनोवेशन कराए ताकि इस अमूल्य विरासत को पूरी तरह से नष्ट होने से बचाया जा सके।



















