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हैदराबाद में एक नवाब ने अकेले दम पर खड़ा कर दिया दुनिया के सबसे विशाल निजी संग्रहालयों में से एककल्चर
5 अग॰ 2026, 12:11 pm (47 दिन पहले)· 0

हैदराबाद में एक नवाब ने अकेले दम पर खड़ा कर दिया दुनिया के सबसे विशाल निजी संग्रहालयों में से एक

हैदराबाद के सालार जंग म्यूजियम की नींव किसी सरकार ने नहीं, बल्कि नवाब मीर यूसुफ अली खान यानी सालार जंग तृतीय के अकेले दम पर 40 साल तक जुटाई गई कलाकृतियों से पड़ी, जिसमें आज 43,000 से ज्यादा कलाकृतियां और करीब 50,000 दुर्लभ किताबें शामिल हैं।

हैदराबाद के सालार जंग म्यूजियम की दीवारों के बीच घूमते हुए बहुत कम लोग सोच पाते हैं कि इसकी हर कलाकृति के पीछे एक अकेले इंसान के चार दशक लंबे जुनून और मेहनत की कहानी छिपी है। यह संग्रहालय दुनिया के उन गिने-चुने संग्रहालयों में शुमार है, जिसे किसी सरकार, राजघराने या संस्था ने सामूहिक रूप से नहीं बल्कि एक इंसान ने अकेले अपने दम पर खड़ा किया।

चालीस साल तक चला कलाकृतियां जुटाने का सफर

इस विशाल संग्रह के केंद्र में नवाब मीर यूसुफ अली खान थे, जिन्हें दुनिया सालार जंग तृतीय के नाम से जानती है। वे हैदराबाद रियासत के प्रधानमंत्री रह चुके थे और सत्ता से जुड़े रहते हुए भी उन्होंने करीब 40 साल से ज्यादा का लंबा वक्त दुनिया भर से दुर्लभ चीजें ढूंढने और जुटाने में लगा दिया। उन्होंने अपनी भारी-भरकम निजी दौलत का एक बड़ा हिस्सा यूरोप, मध्य पूर्व, सुदूर पूर्व और एशिया के अलग-अलग देशों से कलाकृतियां, पुराने ऐतिहासिक ग्रंथ, पेंटिंग्स और पांडुलिपियां खरीदने में खर्च कर दिया। सालार जंग म्यूजियम के डायरेक्टर नागेंद्र रेड्डी के मुताबिक, उनकी इसी अटूट लगन का नतीजा है कि आज संग्रहालय के पास 43,000 से ज्यादा दुर्लभ कलाकृतियां और करीब 50,000 दुर्लभ किताबें व पांडुलिपियां मौजूद हैं। इतने बड़े और विविध संग्रह को देखकर आज भी शोधकर्ता और सैलानी दोनों हैरान रह जाते हैं।

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वेल्ड रेबेका और म्यूजिकल क्लॉक जैसी दुर्लभ चीजें हैं खास आकर्षण

इस संग्रहालय में रखी कई ऐतिहासिक चीजें दुनियाभर के सैलानियों को अपनी ओर खींचती हैं। इनमें इटली की मशहूर संगमरमर मूर्ति ‘द वेल्ड रेबेका’ सबसे ज्यादा चर्चित है और इसे देखने के लिए लोग खासतौर पर यहां आते हैं। इसके अलावा फ्रांस की दोहरी लकड़ी की मूर्ति ‘मेफिस्टोफिलीज और मार्गरेटा’, मुगल बादशाहों के रत्नजड़ित हथियार और उन्नीसवीं सदी की मशहूर ‘म्यूजिकल क्लॉक’ भी यहां के सबसे बड़े आकर्षणों में गिनी जाती हैं। इन दुर्लभ चीजों के साथ-साथ अलग-अलग एशियाई देशों से लाए गए चीनी मिट्टी के बर्तन और बारीक कारीगरी वाली हाथीदांत की चीजें भी संग्रहालय की शोभा बढ़ाती हैं और इसकी विविधता को दिखाती हैं।

1961 में मिला राष्ट्रीय महत्व के संस्थान का दर्जा

साल 1949 में सालार जंग तृतीय के निधन के बाद उनके इस बेशकीमती निजी संग्रह की देखभाल के लिए एक विशेष ट्रस्ट बनाया गया, ताकि यह अनमोल खजाना बिखरने या बर्बाद होने से बच सके। ट्रस्ट बनने के बाद इस संग्रह को आम जनता के देखने के लिए खोल दिया गया। इसके कुछ साल बाद 1961 में भारतीय संसद के एक अधिनियम के जरिए इसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित कर दिया गया, जिससे इसकी अहमियत और बढ़ गई। मूसी नदी के किनारे बना यह संग्रहालय आज सिर्फ हैदराबाद की शान भर नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए एक अहम सांस्कृतिक धरोहर बन चुका है।

सालार जंग तृतीय की यह कहानी यह सिखाती है कि अगर किसी सपने के पीछे सच्ची लगन, धैर्य और समर्पण हो, तो एक अकेला इंसान भी इतिहास के पन्नों में अपनी अलग जगह बना सकता है।

सवाल-जवाब

सालार जंग म्यूजियम किसने बनाया?
यह संग्रहालय नवाब मीर यूसुफ अली खान यानी सालार जंग तृतीय के निजी संग्रह से बना, जो हैदराबाद रियासत के प्रधानमंत्री रह चुके थे।
इस संग्रहालय में कितनी कलाकृतियां और किताबें हैं?
डायरेक्टर नागेंद्र रेड्डी के मुताबिक यहां 43,000 से ज्यादा दुर्लभ कलाकृतियां और करीब 50,000 दुर्लभ किताबें व पांडुलिपियां मौजूद हैं।
संग्रहालय के सबसे बड़े आकर्षण कौन-कौन से हैं?
इटली की ‘द वेल्ड रेबेका’ मूर्ति, फ्रांस की ‘मेफिस्टोफिलीज और मार्गरेटा’, मुगल बादशाहों के रत्नजड़ित हथियार और 19वीं सदी की ‘म्यूजिकल क्लॉक’ यहां के मुख्य आकर्षण हैं।
यह संग्रहालय राष्ट्रीय महत्व का संस्थान कब घोषित हुआ?
भारतीय संसद के एक अधिनियम से 1961 में इसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया।
सालार जंग तृतीय का निधन कब हुआ और उसके बाद संग्रह का क्या हुआ?
उनका निधन 1949 में हुआ, जिसके बाद एक ट्रस्ट बनाकर इस संग्रह को आम जनता के लिए खोल दिया गया।
यह संग्रहालय कहां स्थित है?
यह हैदराबाद में मूसी नदी के किनारे स्थित है।
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