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ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले पहले उर्दू शायर फिराक गोरखपुरी की कहानी, जिन्होंने देश के लिए छोड़ दी थी आईसीएस की नौकरीकल्चर
28 अग॰ 2026, 4:50 am (62 दिन पहले)· 5

ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले पहले उर्दू शायर फिराक गोरखपुरी की कहानी, जिन्होंने देश के लिए छोड़ दी थी आईसीएस की नौकरी

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्मे फिराक गोरखपुरी ने देश की आजादी के लिए आईसीएस की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़ दी और जेल गए। बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन करते हुए वे 'गुले-नग्मा' के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार जीतने वाले उर्दू के पहले साहित्यकार बने।

उर्दू अदब की दुनिया में फिराक गोरखपुरी का नाम एक ऐसा प्रकाश स्तंभ है, जिसकी रोशनी आज भी गजल और नज्मों के जरिए कायम है। 28 अगस्त 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्मे फिराक का असली नाम रघुपति सहाय था, लेकिन वे अपनी शायरी के दम पर फिराक गोरखपुरी के रूप में देश-दुनिया में मशहूर हुए। एक समृद्ध और शिक्षित परिवार में पले-बढ़े फिराक का जीवन बेहद अनूठा रहा। उन्होंने न केवल देश की आजादी की खातिर प्रतिष्ठित आईसीएस (इंडियन सिविल सर्विस) और पीसीएस जैसी सरकारी नौकरियों को ठोकर मार दी, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेकर जेल की सजा भी काटी। बाद में उन्होंने अध्यापन और साहित्य को अपना जीवन समर्पित किया और उर्दू साहित्य के इतिहास में पहले भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता बनने का गौरव हासिल किया।

बचपन से ही साहित्य के प्रति रुझान और मुंशी प्रेमचंद का साथ

फिराक गोरखपुरी का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जहाँ पढ़ाई-लिखाई और अदबी माहौल को बेहद तरजीह दी जाती थी। उनके पिता गोरख प्रसाद खुद भी साहित्य प्रेमी थे और नियमित रूप से कविताएँ लिखा करते थे। घर के इस साहित्यिक वातावरण ने बाल मन पर गहरा प्रभाव डाला। इसी का नतीजा था कि फिराक ने बेहद कम उम्र में ही उर्दू और फारसी भाषाओं की शिक्षा प्राप्त करना शुरू कर दिया था। अपनी शुरुआती पढ़ाई गोरखपुर में पूरी करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद चले गए।

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वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के छात्र थे। स्नातक स्तर की परीक्षा यानी बीए में उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए पूरे प्रदेश में चौथा स्थान हासिल किया। पढ़ाई में अव्वल रहने के साथ-साथ उनका मन शायरी और साहित्य की रचनाओं में गहराई से रमने लगा था। साल 1916 में, जब उनकी उम्र लगभग 20 वर्ष थी और वे बीए की पढ़ाई कर रहे थे, तब उन्होंने अपनी पहली गजल की रचना की थी। उसी दौर में उनकी मुलाकात कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद से हुई, जो उस समय गोरखपुर में ही रह रहे थे। मुंशी प्रेमचंद ने युवा फिराक के अंदर छिपी शायरी की असाधारण प्रतिभा को तुरंत पहचान लिया। उन्होंने फिराक की शुरुआती गजलों को निखारने और उन्हें मंच देने में अहम भूमिका निभाई। प्रेमचंद ने उनकी रचनाओं को उस समय की प्रसिद्ध पत्रिका 'जमाना' के संपादक दयानारायण निगम के पास भेजा। इस तरह मुंशी प्रेमचंद के सहयोग से फिराक की शायरी को आम पाठकों तक पहुँचने का एक बड़ा माध्यम मिला।

सरकारी नौकरी का त्याग और स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी

अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद फिराक गोरखपुरी की प्रतिभा को देखते हुए उनका चयन प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवाओं में हो गया। वे प्रांतीय सिविल सेवा (पीसीएस) के साथ-साथ ब्रिटिश हुकूमत की सबसे बड़ी और सम्मानीय परीक्षा आईसीएस के लिए भी चुन लिए गए थे। उस दौर में आईसीएस अधिकारी बनना किसी भी युवा के लिए सफलता का सर्वोच्च शिखर माना जाता था, जिससे न केवल आर्थिक सुरक्षा मिलती थी बल्कि समाज में अत्यधिक प्रतिष्ठा भी हासिल होती थी। लेकिन फिराक के दिल में देश की आजादी का जज्बा किसी भी व्यक्तिगत फायदे से कहीं बड़ा था।

उस समय पूरा देश ब्रिटिश शासन से मुक्ति के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन से जुड़ रहा था। महात्मा गांधी के इस राष्ट्रव्यापी आह्वान का फिराक गोरखपुरी के दिल और दिमाग पर गहरा असर पड़ा। उन्होंने एक आरामदायक और प्रतिष्ठित प्रशासनिक करियर को ठुकराते हुए अपनी आईसीएस की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। इस फैसले के कारण उन्हें ब्रिटिश हुकूमत का कोपभाजन बनना पड़ा और राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया। फिराक को लगभग डेढ़ साल तक जेल की सलाखों के पीछे अपनी जिंदगी गुजारनी पड़ी। जेल से रिहा होने के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें कांग्रेस संगठन के कार्यों से जोड़ा। फिराक ने कुछ समय तक ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के कार्यालय में अवर सचिव (अंडर सेक्रेटरी) के रूप में अपनी सेवाएँ दीं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन और ज्ञानपीठ पुरस्कार का सफर

कुछ समय तक सक्रिय राजनीति में भूमिका निभाने के बाद फिराक गोरखपुरी ने राजनीति से दूरी बना ली और अपना पूरा ध्यान शिक्षा तथा साहित्य साधना पर केंद्रित कर दिया। साल 1930 के आसपास वे प्रसिद्ध इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े, जहाँ उन्होंने लंबे समय तक अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर के रूप में विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया। फिराक की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी तीनों भाषाओं पर समान अधिकार रखते थे और तीनों के प्रकांड विद्वान थे।

उनकी शायरी में केवल पारंपरिक प्रेम या सौंदर्य का वर्णन ही नहीं था, बल्कि उसमें इंसानी रिश्तों की गहराई, आम आदमी की संवेदनाएँ, सामाजिक परिस्थितियाँ और जिंदगी के फलसफे बखूबी झलकते थे। उन्होंने केवल गजलें ही नहीं लिखीं, बल्कि नज्म, रुबाई और काव्य की अन्य विधाओं में भी ऐतिहासिक रचनाएँ पेश कीं। साहित्य के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया। साल 1960 में उनकी प्रसिद्ध कृति 'गुले-नग्मा' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके बाद साल 1969 में उन्हें देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान 'भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार' से विभूषित किया गया। इस प्रतिष्ठित पुरस्कार को प्राप्त करने वाले वे उर्दू साहित्य के इतिहास में पहले साहित्यकार बने।

सवाल-जवाब

फिराक गोरखपुरी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
फिराक गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था।
फिराक गोरखपुरी का असली नाम क्या था?
फिराक गोरखपुरी का असली नाम रघुपति सहाय था।
फिराक गोरखपुरी ने आईसीएस की नौकरी क्यों छोड़ दी थी?
महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर देश की आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी।
फिराक गोरखपुरी को ज्ञानपीठ पुरस्कार किस वर्ष और किस कृति के लिए मिला था?
उन्हें 1969 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था, जबकि 1960 में उनकी काव्य कृति 'गुले-नग्मा' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।
उर्दू साहित्य में फिराक गोरखपुरी के नाम कौन सा ऐतिहासिक रिकॉर्ड दर्ज है?
फिराक गोरखपुरी उर्दू साहित्य के क्षेत्र में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले साहित्यकार हैं।
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