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बार काउंसिल वकील झड़प मामले में सुप्रीम कोर्ट का दखल से इनकार, प्रशांत भूषण को दिल्ली हाईकोर्ट जाने की सलाहदिल्ली
3 सित॰ 2026, 1:10 pm (55 मिनट पहले)· 0

बार काउंसिल वकील झड़प मामले में सुप्रीम कोर्ट का दखल से इनकार, प्रशांत भूषण को दिल्ली हाईकोर्ट जाने की सलाह

बार काउंसिल ऑफ इंडिया परिसर में वकीलों के बीच हुई कथित हाथापाई की सीबीआई जांच और सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। सीजेआई सूर्यकांत ने प्रशांत भूषण को दिल्ली हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया परिसर में वकीलों के दो पक्षों के बीच हुई कथित हाथापाई और विवाद के मामले में सुप्रीम कोर्ट से याचिकाकर्ता को राहत नहीं मिली है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले पर दाखिल याचिका पर सीधे सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया। सर्वोच्च अदालत ने याचिकाकर्ता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण को निर्देश दिया कि वे अपनी मांगों को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएं। सीजेआई सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीधे हस्तक्षेप करने से बचना जरूरी है, ताकि संस्थागत पक्षपात की किसी भी तरह की धारणा उत्पन्न न हो सके।

बार काउंसिल परिसर में हाथापाई और विवाद की पृष्ठभूमि

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत बार काउंसिल ऑफ इंडिया के दिल्ली स्थित कार्यालय में 21 तारीख को घटी एक घटना से हुई, जहां वकीलों के बीच कथित तौर पर तीखी झड़प और हाथापाई देखने को मिली थी। इस घटना का एक वीडियो भी सामने आया था। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के अनुसार, वकील बार काउंसिल में प्रशासनिक सुधारों से संबंधित एक ज्ञापन सौंपने के बाद अपना विरोध दर्ज करा रहे थे। उन्होंने अदालत में तर्क दिया कि वकीलों को अपनी जायज मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करने का पूर्ण अधिकार है, लेकिन घटना वाले दिन स्थिति अचानक बिगड़ गई और परिसर के भीतर हिंसा की नौबत आ गई।

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सीबीआई जांच और सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने की मांग

गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष मामले का जिक्र करते हुए प्रशांत भूषण ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के बयानों पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। याचिका में आरोप लगाया गया कि चेयरमैन ने सार्वजनिक रूप से बयान जारी कर प्रदर्शनकारी वकीलों को लीगल कॉकरोच कहकर संबोधित किया और कहा कि कुछ लोगों ने आधी रात को आकर उनकी पिटाई की। प्रशांत भूषण ने अदालत से मांग की कि इस हिंसक घटना की निष्पक्ष जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई से कराई जाए। इसके साथ ही, उन्होंने यह आशंका जताई कि बार काउंसिल प्रशासन सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता है, इसलिए 21 तारीख की सीसीटीवी फुटेज को तुरंत सुरक्षित करने के निर्देश दिए जाएं।

सुप्रीम कोर्ट का रुख और संस्थागत निष्पक्षता की बात

प्रशांत भूषण की दलीलों को सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने उनसे सवाल किया कि वे इस मामले को लेकर हाईकोर्ट क्यों नहीं जा रहे हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता दिल्ली हाईकोर्ट का रुख कर सकते हैं और वहां अपनी बात रख सकते हैं। सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट इस तरह के संस्थागत विवादों में सीधे सुनवाई शुरू कर देगा, तो लोगों के बीच यह गलत संदेश जा सकता है कि अदालत किसी पक्ष विशेष का संस्थागत समर्थन या पक्षपात कर रही है। प्रशांत भूषण ने यह भी कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया से जुड़े अन्य मामले भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, फिर भी शीर्ष अदालत ने अपने रुख पर कायम रहते हुए याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट भेजने का निर्णय सुनाया।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया मामले में क्या आदेश दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर सीधे सुनवाई करने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को दिल्ली हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया।
प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में क्या मांग रखी थी?
प्रशांत भूषण ने बीसीआई परिसर में हुई वकील झड़प की सीबीआई जांच और घटना की सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने की मांग की थी।
सीजेआई सूर्यकांत ने याचिका स्वीकार न करने का क्या कारण बताया?
सीजेआई ने कहा कि सीधे सुनवाई करने से सुप्रीम कोर्ट द्वारा संस्थागत पक्षपात किए जाने की धारणा बन सकती है, इसलिए हाईकोर्ट जाना उचित है।
बीसीआई चेयरमैन के किस बयान पर विवाद हुआ था?
याचिका के अनुसार, बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने कथित तौर पर प्रदर्शनकारी वकीलों को लीगल कॉकरोच कहा था।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·30 मिनट पहले

यह मामला शीर्ष कानूनी संस्थाओं के भीतर बढ़ते आंतरिक तनाव और पेशेवर अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब वकीलों और नेतृत्व के बीच की तल्खी इस स्तर पर पहुंच जाए, तो न केवल बार की साख प्रभावित होती है, बल्कि न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर भी परोक्ष असर पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीधे हस्तक्षेप से इंकार करना और दिल्ली हाईकोर्ट का रास्ता दिखाना यह सुनिश्चित करता है कि न्यायिक प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर ही अपनी पदानुक्रमित मर्यादा के अनुसार आगे बढ़े। आने वाले दिनों में हाईकोर्ट का यह रुख तय करेगा कि कानूनी निकायों में सुधार की मांग और अनुशासनहीनता के आरोपों के बीच संतुलन कैसे बिठाया जाता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·29 मिनट पहले

यह मामला सिर्फ एक संस्थागत विवाद नहीं, बल्कि वकीलों के पेशेवर आचरण और साख से जुड़ा एक संवेदनशील आपराधिक मामला बन गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीधे सुनवाई से इनकार करना यह दर्शाता है कि अदालतें निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों के पदानुक्रम को बनाए रखने पर जोर दे रही हैं। अब जब मामला दिल्ली हाईकोर्ट जाएगा, तो सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने और सबूतों से छेड़छाड़ रोकने की याचिकाकर्ताओं की मांग पर अदालत का शुरुआती रुख बेहद अहम होगा। यदि समय रहते डिजिटल साक्ष्यों को संरक्षित नहीं किया गया, तो निष्पक्ष जांच की मांग कानूनी दांव-पेच में उलझ सकती है।

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