दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव 2026 के हालिया चुनाव परिणामों ने कांग्रेस की छात्र इकाई नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) की अंदरूनी राजनीति में गहरा संकट पैदा कर दिया है। संगठन के प्रभारी कन्हैया कुमार इस चुनावी विफलता के सीधे केंद्र में आ गए हैं। केंद्रीय पैनल की चारों सीटों पर मिली शिकस्त और खासकर संगठन से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़े उम्मीदवारों के शानदार प्रदर्शन ने पार्टी आलाकमान को असहज कर दिया है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने डूसू में इस निराशाजनक प्रदर्शन और गलत प्रत्याशी चयन को लेकर संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल से फोन पर सीधी बातचीत कर अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर की है। इसके तत्काल बाद बुलाई गई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में केसी वेणुगोपाल ने कन्हैया कुमार से चुनाव प्रबंधन को लेकर सख्त सवाल किए और कई बिंदुओं पर जवाब मांगा।
दीपांशु शौकीन की ऐतिहासिक जीत और सामाजिक पृष्ठभूमि
डूसू उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उतरे दीपांशु शौकीन की जीत छात्र राजनीति में एक दुर्लभ मिसाल बन गई है। वह पिछले लगभग 17 वर्षों में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के केंद्रीय पैनल में जगह बनाने वाले पहले स्वतंत्र उम्मीदवार बने हैं, साथ ही उपाध्यक्ष पद पर विजयी होने वाले पहले निर्दलीय प्रत्याशी भी हैं। दीपांशु दिल्ली के पीरागढ़ी क्षेत्र के रहने वाले हैं। उनके पिता दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) में बस कंडक्टर के रूप में कार्यरत हैं और उनकी माता आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। शहीद भगत सिंह कॉलेज से स्नातक की शिक्षा पूरी करने के उपरांत वह दिल्ली विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन विभाग से परास्नातक (पोस्ट ग्रेजुएशन) की पढ़ाई कर रहे हैं।
सत्या निकेतन में छात्रावास और पीजी से जुड़ी एक इमारत में हुए हादसे के बाद छात्र सुरक्षा और आवास की समस्या को दीपांशु ने अपने अभियान का मुख्य केंद्र बनाया था। उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में विद्यार्थियों से जुड़े बुनियादी मुद्दों को लगातार और आक्रामक ढंग से उठाया, जिससे उन्हें आम छात्रों का व्यापक समर्थन हासिल हुआ।
उपाध्यक्ष पद के चुनावी आंकड़े और एनएसयूआई की दुर्गति
डूसू 2026 के चुनावी नतीजों में मुख्य विपक्षी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने केंद्रीय पैनल के चार में से तीन पदों पर कब्जा जमाया, जबकि एक पद निर्दलीय प्रत्याशी के खाते में गया। एनएसयूआई केंद्रीय पैनल में खाता खोलने में भी असफल रही। सबसे चौंकाने वाले आंकड़े उपाध्यक्ष पद के सामने आए
- दीपांशु शौकीन (निर्दलीय): कुल 30,615 वोट पाकर विजयी रहे।
- इशू मौर्य (एबीवीपी): 16,910 वोट प्राप्त कर दूसरे स्थान पर रहे।
- वीर छत्रथ (एनएसयूआई): मात्र 4,313 वोट पाकर तीसरे स्थान पर खिसक गए।
दीपांशु ने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 13,705 मतों के भारी अंतर से पराजित किया। एनएसयूआई के आधिकारिक उम्मीदवार को निर्दलीय विजेता की तुलना में सात गुना से भी कम वोट मिले। दीपांशु लंबे समय तक एनएसयूआई के सक्रिय कार्यकर्ता रहे थे और वर्ष 2025 तथा 2026 दोनों ही सत्रों में संगठन से चुनाव लड़ने के लिए टिकट की दावेदारी कर रहे थे।
टिकट वितरण में पक्षपात और बागी नेताओं का उभार
चुनावी कार्यक्रम घोषित होते ही एनएसयूआई के भीतर टिकट आवंटन को लेकर गंभीर खींचतान सामने आने लगी थी। छात्र नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रभारी कन्हैया कुमार ने जमीनी स्तर पर काम करने वाले सक्रिय छात्र प्रतिनिधियों की अनदेखी की और अपने चहेते उम्मीदवारों को आगे बढ़ाया। इसका खामियाजा संगठन को अन्य सीटों पर भी भुगतना पड़ा। संयुक्त सचिव पद के प्रमुख दावेदार विशेष यादव को जब एनएसयूआई ने टिकट देने से इनकार किया, तो उन्होंने समाजवादी छात्रसभा के बैनर तले ताल ठोक दी। विशेष यादव ने चुनाव में 15,778 वोट बटोरे और एनएसयूआई के आधिकारिक प्रत्याशी को पछाड़ते हुए तीसरे नंबर पर धकेल दिया।
राहुल गांधी का हस्तक्षेप और देर रात हुई समीक्षा बैठक
डूसू परिणाम सार्वजनिक होने के तुरंत बाद राहुल गांधी ने इंदौर में आयोजित 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम से पहले संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल से फोन पर बात की। उन्होंने छात्र राजनीति के जमीनी स्तर से सटीक जानकारी न जुटाने और चुनावी प्रक्रिया में हुई चूकों को लेकर तीखे सवाल उठाए। इसके बाद केसी वेणुगोपाल ने देर रात एक आपातकालीन बैठक आयोजित की, जिसमें कन्हैया कुमार सहित कई अन्य नेता उपस्थित रहे। बैठक के दौरान संगठन महासचिव ने टिकट वितरण के तौर-तरीकों, कार्यकर्ताओं की अनदेखी और बागी प्रत्याशियों की बड़ी जीत को लेकर कन्हैया कुमार से जवाब-तलब किया और उन्हें पांच कड़े सवालों का सामना करना पड़ा।
कन्हैया कुमार के सांगठनिक नेतृत्व पर उठे सवाल
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) के अध्यक्ष पद से राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाने वाले कन्हैया कुमार को कांग्रेस ने युवाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण सांगठनिक दायित्व सौंपे थे। उन्हें एनएसयूआई का प्रभारी बनाकर छात्र राजनीति को नई दिशा देने की जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि, दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे देश के सबसे प्रतिष्ठित छात्र राजनीति के मंच पर इस संपूर्ण पराजय और खुद संगठन के पूर्व कार्यकर्ताओं की भारी जीत ने उनकी रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संगठन के आंतरिक हलकों में चर्चा है कि जब एक निर्दलीय उम्मीदवार अपने दम पर तीस हजार से ज्यादा वोट जुटाकर जीत सकता है, तब आधिकारिक संगठन का केवल चार हजार वोटों पर सिमट जाना प्रभारी के जमीनी आकलन की भारी विफलता को दर्शाता है।




















