मथुरा के बरसाना समेत समूचे ब्रज मंडल में श्रीराधा के जन्मोत्सव का उल्लास चरम पर पहुंच चुका है। पंचांग व्यवस्था के मुताबिक भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर यह पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न होता है। इस विशेष अवसर पर मंदिरों और घरों में सुबह से ही अभिषेक, नयनाभिराम श्रृंगार और संकीर्तन का दौर निरंतर जारी है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस पर्व के साथ सौभाग्य और आयुष्मान जैसे कल्याणकारी योगों का दुर्लभ संयोग उपस्थित हुआ है। मान्यता है कि इस पावन बेला में युगल सरकार की संयुक्त उपासना साधक के जीवन से अनिष्ट ग्रहों की शांति कर घर-परिवार में सुख और समृद्धि लाती है।
तिथि का प्रसार और महालक्ष्मी व्रत का शुभारंभ
पंचांग विवरण के अनुसार भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि का आगमन 18 सितंबर को दिन में लगभग 1 बजे हुआ था। इस तिथि की पूर्णता 19 सितंबर को तीसरे पहर 3 बजकर 26 मिनट पर निर्धारित है। सनातन धर्म की मान्य परंपरा में सूर्योदयकालीन उदयातिथि की प्रधानता स्वीकार की जाती है, जिसके आधार पर अष्टमी का उपवास 19 सितंबर के दिन रखा जा रहा है। इसी शुभ तिथि के साथ सनातन परंपरा का बहुप्रतीक्षित 16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत अनुष्ठान भी विधिवत प्रारंभ हो चुका है, जो धन और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी को समर्पित रहता है।
भक्ति भाव और ब्रज क्षेत्र की अनूठी परंपरा
अध्यात्म की दृष्टि से राधारानी को प्रेम, निष्ठा और आत्मसमर्पण की सर्वोच्च अधिष्ठात्री माना गया है। साधक इस दिन उपवास रखकर युगल सरकार के अनुग्रह की याचना करते हैं। मान्यता यह भी है कि राधारानी के चरणों का आश्रय लेने से साधक के अंतःकरण में शुद्ध प्रेम का प्राकट्य होता है और सांसारिक क्लेशों का निवारण होता है। बरसाना और वृंदावन के देवालयों में इस दिन भोर से ही श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़ता है। विग्रहों का भव्य अभिषेक करने के उपरांत विशेष वस्त्राभूषणों से श्रृंगार किया जाता है और पारंपरिक पदों का गायन होता है।
मध्याह्न पूजा अवधि और दुर्लभ राजयोग
शास्त्रों के अनुसार राधारानी का प्राकट्य दोपहर के समय माना जाता है, इसलिए इनकी अर्चना मध्याह्न काल में ही संपन्न की जाती है। पंचांग के अनुसार आज पूजन का मुख्य समय सुबह 11:01 बजे से प्रारंभ होकर दोपहर 1:28 बजे तक बना रहेगा। संपूर्ण पूजन प्रक्रिया संपन्न करने के लिए श्रद्धालुओं को कुल 2 घंटे 27 मिनट की समयावधि उपलब्ध हो रही है।
ग्रह-नक्षत्रों के दृष्टिकोण से भी यह दिन अत्यंत दुर्लभ माना जा रहा है। इस समय सौभाग्य, आयुष्मान तथा रवि योग का संयोग बना हुआ है। इसके अतिरिक्त देवगुरु बृहस्पति के उच्च राशिगत प्रभाव से हंसराज योग का निर्माण हो रहा है, जबकि दैत्यगुरु शुक्र के तुला राशि में विराजमान रहने से मालव्य राजयोग प्रभावी है। इसी कड़ी में कन्या राशि के भीतर सूर्य और बुध का मिलन बुधादित्य योग का सृजन कर रहा है, जो बौद्धिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए विशेष माना गया है।
अनुष्ठान की शास्त्रीय विधि और भोग व्यवस्था
प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्वच्छ परिधान धारण करें और पूजा स्थल को व्यवस्थित करें। एक काष्ठ की चौकी पर पीला अथवा लाल वस्त्र बिछाकर युगल विग्रह या चित्रपट विराजमान करें। मध्याह्न काल उपस्थित होने पर सर्वप्रथम गंगाजल के छींटे देकर पूरे परिसर को पवित्र करें। इसके उपरांत पंचामृत तैयार करके विग्रहों को स्नान कराएं और नूतन वस्त्र, माला एवं आभूषण पहनाएं।
गंध, रोली, अक्षत, धूप और दीपक जलाकर विधिवत अर्चन करें। मिष्ठान्न, मखाने, माखन-मिश्री, खीर तथा ताजे मौसमी फलों का नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद निर्धारित स्तोत्र व मंत्रों का शांत चित्त से जप करें, व्रत से जुड़ी प्राकट्य कथा का श्रवण करें और अंत में पारंपरिक आरती गाकर उपस्थित लोगों में नैवेद्य वितरित करें।
कल्याणकारी मंत्र और स्तुति
पूजा के समय विभिन्न शास्त्रीय मंत्रों के पाठ का विधान है। श्रद्धालु हरे कृष्ण महामंत्र के साथ-साथ युगल नाम का कीर्तन करते हैं। इसके अलावा विशिष्ट अनुष्ठानों में बीज मंत्र 'ॐ ह्रीं श्रीं राधिकायै नमः' तथा मूल महामंत्र 'ॐ ह्रीं श्रीराधायै स्वाहा' का जप फलदायी माना गया है। देवी के ध्यान हेतु 'ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमो भगवते राधाप्रियाय' का उच्चारण किया जाता है। साथ ही श्री राधा गायत्री मंत्र 'ॐ ह्रीं श्रीराधिकायै विद्महे गान्धर्विकायै विधीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात्' का जप अंतःकरण को शांति प्रदान करता है। पूजन का समापन वृषभानु लली की आरती और स्तुति के साथ किया जाता है।


















