देश की राजधानी में उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाने वाला दिल्ली विश्वविद्यालय हर साल सितंबर के महीने में जबर्दस्त चुनावी सरगर्मी का गवाह बनता है। चारों तरफ लगे पर्चे, दीवारों पर चस्पा प्रचार सामग्री और छात्र संगठनों के जोशीले नारों के बीच होने वाला यह मुकाबला किसी आम कॉलेज स्तर की गतिविधि जैसा बिल्कुल नजर नहीं आता। छात्र संघ के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव जैसे शीर्ष चार पदों पर कब्जा जमाने के लिए चलने वाली यह होड़ राष्ट्रीय स्तर के आम चुनावों जैसा माहौल तैयार कर देती है।
आम तौर पर परिसर से बाहर रहने वाले लोगों को लगता है कि विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त हर कॉलेज और संकाय इस लोकतांत्रिक महासमर का हिस्सा बनता है। वास्तविकता इससे एकदम जुदा है, क्योंकि इस विश्वविद्यालय का प्रशासनिक ताना-बाना बेहद व्यापक होने के साथ-साथ काफी पेचीदा भी है। दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में फैले दर्जनों महाविद्यालयों, नॉर्थ कैंपस, साउथ कैंपस और केंद्रीय परिसरों में से केवल एक निश्चित वर्ग ही केंद्रीय छात्र संघ की चुनावी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। कई नामी संस्थान इस पूरी प्रक्रिया से पूरी तरह किनारा कर अपनी स्वतंत्र व्यवस्था का संचालन करते हैं।
केंद्रीय छात्र संघ मुकाबले में उतरने वाले प्रमुख संस्थान
विश्वविद्यालय का केंद्रीय छात्र संघ ढांचा मुख्य रूप से उन नियमित और गैर-व्यावसायिक महाविद्यालयों का साझा मंच है जो मुख्यधारा की शैक्षणिक व्यवस्था के तहत काम करते हैं। नॉर्थ और साउथ कैंपस के कई ऐतिहासिक संस्थान इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मुख्य रीढ़ माने जाते हैं।
इनमें शामिल प्रमुख संस्थानों की सूची इस प्रकार है
- उत्तरी और दक्षिणी परिसर के संस्थान: हिंदू कॉलेज, हंसराज कॉलेज, किरोड़ीमल कॉलेज, रामजस कॉलेज, मिरांडा हाउस और दौलत राम कॉलेज जैसे जाने-माने संस्थान हर साल इस चुनावी समर में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इसी क्रम में साउथ कैंपस के श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज और देशबंधु कॉलेज भी केंद्रीय पैनल के लिए अपनी मजबूत भागीदारी दर्ज कराते हैं।
- मताधिकार का दायरा: इन सभी संस्थानों के पहले और दूसरे वर्ष में नियमित पढ़ाई करने वाले पंजीकृत छात्र केंद्रीय पैनल के चारों प्रमुख पदों के चुनाव में अपने वोट का प्रयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त कला संकाय, विज्ञान संकाय और सामाजिक विज्ञान संकाय के विभिन्न स्नातकोत्तर विभागों के नियमित अध्येता भी इस मतदान में हिस्सा लेते हैं।
कुछ नामी संस्थानों के चुनावी दौड़ से अलग रहने की वजहें
पूरे परिसर में जब चुनावी बिगुल बजता है, तब कुछ सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज पूरी तरह शांत और अपनी सामान्य शैक्षणिक दिनचर्या में लीन नजर आते हैं। इसके पीछे कई गंभीर प्रशासनिक, संरचनात्मक और नीतिगत कारण मौजूद हैं।
इन संस्थानों के दूर रहने के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं
- अल्पसंख्यक संस्थानों की स्वायत्तता: सेंट स्टीफेंस कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थान अपनी प्रशासनिक स्वायत्तता और विशेष आंतरिक नियमों के संरक्षण के लिए केंद्रीय राजनीति से पूरी दूरी बनाकर रखते हैं। सिख अल्पसंख्यक प्रबंधन समितियों के अधीन संचालित होने वाले संस्थान भी अपनी गवर्निंग बॉडी के निर्धारित नियमों और अपनी आंतरिक छात्र परिषदों को ही प्राथमिकता देते हैं।
- महिला कॉलेज और आंतरिक छात्र परिषद: लेडी श्रीराम कॉलेज जैसे प्रमुख महिला संस्थान भारी खर्च और तीखे राजनीतिक टकराव वाली केंद्रीय व्यवस्था के बजाय अपनी आंतरिक छात्र परिषदों को तरजीह देते हैं। उनका मानना है कि कॉलेज स्तर की लोकतांत्रिक बहसों और परिषदों से परिसर का शांत, सुरक्षित और अकादमिक माहौल बिना किसी व्यवधान के कायम रहता है।
- चिकित्सा और तकनीकी संस्थान: मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज और फैकल्टी ऑफ टेक्नोलॉजी जैसे विशिष्ट संस्थान अपने अलग पेशेवर संगठनों और कड़े अकादमिक नियमों के तहत संचालित होते हैं। इन संस्थानों का प्राथमिक ध्यान पेशेवर प्रशिक्षण पर केंद्रित रहने के कारण वे सामान्य छात्र राजनीति की खींचतान से अलग रहते हैं।
- दूरस्थ शिक्षा के छात्र: स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग से ताल्लुक रखने वाले छात्र विश्वविद्यालय के कुल नामांकन का एक विशाल हिस्सा तैयार करते हैं। इसके बावजूद पत्राचार और गैर-नियमित माध्यम से अध्ययन करने की वजह से इन लाखों विद्यार्थियों को केंद्रीय पैनल के लिए मतदान करने या उम्मीदवार के रूप में खड़े होने की अनुमति नहीं मिलती है।



















