राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रामलीला मैदान और जंतर-मंतर पर लगातार खिंचने वाले धरना-प्रदर्शनों को लेकर शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। दिल्ली के प्रमुख व्यापारिक संगठनों द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई के बाद अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। इस मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने लोकतांत्रिक दायरे में शांतिपूर्ण आंदोलन के मौलिक अधिकार और आम नागरिकों के अपने व्यापार व रोजी-रोटी कमाने के संवैधानिक अधिकार के बीच संतुलन कायम करने पर खास जोर दिया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि तय किए गए प्रदर्शन स्थलों पर भी किसी एक संगठन या समूह द्वारा अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं रखा जा सकता।
व्यापारियों की शीर्ष अदालत में गुहार
यह कानूनी चुनौती दिल्ली के प्रतिष्ठित व्यापारिक संगठनों द्वारा एक साथ मिलकर पेश की गई है, जिनमें किराना कमेटी, दिल्ली आयरन एंड हार्डवेयर मर्चेंट्स एसोसिएशन और राष्ट्रीय राजधानी के कई अन्य वाणिज्यिक निकायों के प्रतिनिधि शामिल हैं। व्यापारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड जय अनंत देहाद्राई समेत अन्य वकीलों ने अदालत में दलीलें रखीं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने यह गंभीर संकट उठाया कि जंतर-मंतर और रामलीला मैदान दिल्ली के अत्यंत व्यस्त और घने व्यापारिक केंद्रों के बिल्कुल करीब हैं। वहां लंबे समय तक अनिश्चितकालीन धरने जारी रहने से आसपास के पूरे कारोबारी तंत्र की कमर टूट जाती है।
संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन पर पीठ का जोर
सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई करते हुए बेहद अहम संवैधानिक सिद्धांत रेखांकित किए। पीठ ने टिप्पणी की कि लोकतंत्र में नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज उठाने और विरोध दर्ज कराने का निर्विवाद मौलिक अधिकार प्राप्त है, किंतु यह स्वतंत्रता असीमित नहीं हो सकती। अदालत ने कहा कि विरोध के अधिकार का प्रयोग इस ढंग से नहीं किया जा सकता जिससे अन्य नागरिकों के व्यापार करने, आने-जाने और सम्मानपूर्वक आजीविका कमाने के बुनियादी अधिकारों का व्यापक तथा असंगत हनन होने लगे। दोनों ही मौलिक अधिकार संविधान के तहत महत्वपूर्ण हैं और अदालत को इन दोनों के बीच व्यावहारिक संतुलन सुनिश्चित करना होगा।
प्रदर्शन स्थलों पर एकाधिकार की मनाही
सार्वजनिक स्थलों के निष्पक्ष और न्यायसंगत उपयोग पर टिप्पणी करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने साफ किया कि किसी भी संगठन को यह अधिकार नहीं मिल सकता कि वह चिन्हित विरोध स्थलों पर अपना एकाधिकार बना ले। अदालत ने संकेत दिया कि किसी भी एक गुट द्वारा लंबे समय तक स्थल को घेरे रखने से अन्य लोकतांत्रिक समूहों के अवसर छिन जाते हैं। विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों को अपनी बात शांतिपूर्ण तरीके से रखने के लिए समान और निष्पक्ष अवसर मिलने चाहिए। इसी क्रम में अदालत ने याचिकाकर्ताओं को यह निर्देश भी दिया कि वे आंदोलनकारी समूहों और संबंधित राजनीतिक पक्षों को मामले में विधिवत पक्षकार बनाएं, जिनमें सीजेपी, राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के प्रतिनिधि शामिल हैं।
व्यापारिक गतिविधियों और कामगारों पर भारी असर
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा कि वे लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का विरोध नहीं करते और न ही किसी भी नागरिक के विरोध करने के अधिकार में कटौती चाहते हैं। उनका विरोध केवल इस बात से है कि घनी आबादी और वाणिज्यिक गतिविधियों के केंद्र के पास तय किए गए स्थलों पर महीनों तक चलने वाले धरनों से बड़े पैमाने पर आर्थिक तबाही होती है। राष्ट्रीय राजधानी का व्यापारिक ताना-बाना लाखों लोगों को दैनिक रोजगार देता है और सरकारी राजस्व में भारी योगदान देता है। जब इन इलाकों में अनिश्चितकाल तक सड़कें और रास्ते बाधित होते हैं, तो इसका असर केवल बड़े दुकानदारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दैनिक वेतनभोगी मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले, ट्रांसपोर्टर, दुकानों के कर्मचारी और खरीदारी करने आने वाले आम उपभोक्ता सभी गंभीर संकट में पड़ जाते हैं।
संतुलित व्यवस्था तैयार करने की मांग
व्यापारियों ने अदालत से आग्रह किया है कि इन स्थलों के उपयोग के लिए एक पारदर्शी, निष्पक्ष और व्यावहारिक व्यवस्था स्थापित की जाए। ऐसी प्रणाली बने जिससे विरोध दर्ज कराने का अधिकार भी सुरक्षित रहे और वह आम जनता के लिए अनिश्चितकालीन आर्थिक व्यवधान तथा आजीविका पर संकट का कारण न बने। शीर्ष अदालत द्वारा केंद्र सरकार को नोटिस जारी किए जाने के बाद अब इस जटिल संवैधानिक मुद्दे पर विस्तृत न्यायिक विमर्श का रास्ता खुल गया है, जिस पर आगे की तारीखों में विचार किया जाएगा।



















