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समय पर इंसाफ के लिए दिल्ली दौड़ना मजबूरी न बने: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने अदालती प्रक्रिया में सुधार पर दिया जोरदिल्ली
2 नव॰ 2026, 11:00 am (2 घंटे पहले)· 0

समय पर इंसाफ के लिए दिल्ली दौड़ना मजबूरी न बने: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने अदालती प्रक्रिया में सुधार पर दिया जोर

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने अदालती मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए आत्ममंथन की जरूरत बताते हुए कहा कि न्याय की पहुंच इस बात पर निर्भर नहीं होनी चाहिए कि वादी राष्ट्रीय राजधानी तक पहुंच सकता है या नहीं।

देश की न्यायिक व्यवस्था में मामलों के निपटारे और मुकदमों की त्वरित सुनवाई को लेकर आत्ममंथन की जरूरत रेखांकित की गई है। भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने 1 नवंबर को इस बात पर विशेष ध्यान दिलाया कि उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की जल्द या तत्काल सुनवाई कराने के मकसद से लोगों का सर्वोच्च न्यायालय पहुंचने का चलन लगातार बढ़ता जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा उच्च न्यायालयों की संस्थागत स्वायत्तता का सम्मान किया है, जिसमें अपने मुकदमों का रोस्टर तय करने का उनका पूर्ण अधिकार भी शामिल है। इसके बावजूद, सुप्रीम कोर्ट के समक्ष ऐसे आग्रहों की बढ़ती संख्या इस बात पर विचार करने के लिए विवश करती है कि क्या मौजूदा कार्यप्रणालियों में तत्परता और तेजी लाने की गुंजाइश बाकी है।

केरल हाईकोर्ट के 75 वर्ष पूरे होने पर उठाए अहम सवाल

केरल हाईकोर्ट की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष समारोह को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायिक सुधारों से जुड़े कई बुनियादी सवाल सामने रखे। उन्होंने पूछा कि क्या तत्काल सुनवाई की दरकार वाले मामलों की पहचान अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकती है। इसके साथ ही उन्होंने मुकदमों को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की पूरी प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी और पूर्वानुमान योग्य बनाने की आवश्यकता जताई। उनका कहना था कि आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल उन गंभीर मामलों को प्राथमिकता के आधार पर छांटने में किया जाना चाहिए, जिनमें सुनवाई में तनिक भी देरी होने से पक्षकारों को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। इसके अलावा उन्होंने यह भी सुनिश्चित करने का आह्वान किया कि किसी भी नागरिक के लिए समय पर न्याय पाना इस मजबूरी पर निर्भर न हो कि वह लंबी यात्रा करके राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली तक आ सकता है या नहीं।

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संवैधानिक न्याय का आधार हैं 25 उच्च न्यायालय

प्रधान न्यायाधीश ने संवैधानिक न्याय के व्यापक ढांचे को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत में न्याय का दायरा केवल नई दिल्ली तक सीमित नहीं है और न ही यह वहीं शुरू होकर समाप्त होता है। देश में संवैधानिक न्याय की वास्तविक ताकत राज्यों में फैले 25 उच्च न्यायालयों के सुदृढ़ नेटवर्क में बसी हुई है। इनमें से प्रत्येक उच्च न्यायालय को देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने और कानून का शासन बनाए रखने का महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्व सौंपा गया है।

जमीनी हकीकत और आम नागरिकों से सीधा जुड़ाव

जस्टिस सूर्यकांत ने जोर देकर कहा कि उच्च न्यायालय आम जनमानस के रोजमर्रा के जीवन और वास्तविकताओं से बेहद गहराई से जुड़े हुए हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि वे स्थानीय लोगों की शिकायतों की भाषा को भली-भांति समझते हैं, क्षेत्रीय समुदायों की विशिष्ट परिस्थितियों से परिचित होते हैं और सरकारी तंत्र की किसी भी कार्रवाई के जमीनी स्तर पर पड़ने वाले व्यावहारिक प्रभावों का सटीक आकलन कर सकते हैं। इसलिए वादियों को हर छोटे-बड़े मामले में राहत के लिए दिल्ली भागने की जरूरत न पड़े, इसके लिए स्थानीय स्तर पर ही मुकदमों की समयबद्ध सुनवाई की व्यवस्था को मजबूत करना बेहद जरूरी है।

सवाल-जवाब

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने न्यायिक व्यवस्था में किस बात पर आत्ममंथन का आह्वान किया?
उन्होंने अदालती प्रक्रियाओं में तत्परता बढ़ाने और मामलों को सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने पर विचार करने को कहा।
वादी किस मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख कर रहे हैं?
वादी विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित अपने मामलों की तत्काल या जल्द सुनवाई की गुहार लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच रहे हैं।
चीफ जस्टिस ने यह संबोधन किस अवसर पर दिया?
उन्होंने 1 नवंबर को केरल हाईकोर्ट की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में यह वक्तव्य दिया।
मुकदमों की सुनवाई में तकनीक के इस्तेमाल पर क्या कहा गया?
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या तकनीक उन मामलों को प्राथमिकता देने में मदद कर सकती है जिनमें देरी से अपूरणीय नुकसान हो सकता है।
संवैधानिक न्याय को लेकर चीफ जस्टिस ने क्या राय रखी?
उन्होंने कहा कि संवैधानिक न्याय केवल नई दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के 25 उच्च न्यायालय इसके मुख्य आधार हैं।
हाईकोर्ट आम लोगों से किस प्रकार सीधे जुड़े होते हैं?
हाईकोर्ट स्थानीय भाषा, क्षेत्रीय परिस्थितियों और सरकारी फैसलों के व्यावहारिक जमीनी परिणामों को गहराई से समझते हैं।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

दिल्ली न जाना पड़े, ये बात ठीक है पर हाईकोर्ट खुद कहां जल्दी तारीख देते हैं?

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

रोहन भाई, बात तो सही है पर ये तकनीक और पारदर्शिता वाली बात कब तक ज़मीन पर उतरेगी?

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