कारगिल की जंग को छिड़े अब 27 साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है, फिर भी इस लड़ाई के कई पहलू आज भी आम लोगों की नजरों से ओझल हैं। इन्हीं में से एक पहलू यह है कि जिस वक्त भारतीय फौज बर्फीली चोटियों पर दुश्मन से जूझ रही थी, ठीक उसी दौरान दिल्ली स्थित सैन्य मुख्यालय के भीतर हालात को समझने और सही रणनीति बनाने की एक अलग ही लड़ाई चल रही थी। इस दोहरे संघर्ष का ब्योरा तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल वेद प्रकाश मलिक ने खुद बड़ी बेबाकी से रखा है।
मोर्चे पर लड़ाई, मुख्यालय में मंथन
जनरल वेद प्रकाश मलिक के मुताबिक, कारगिल में असल लड़ाई दो स्तरों पर चल रही थी। एक तरफ जवान ऊंची चोटियों पर बैठे घुसपैठियों को खदेड़ने में जुटे थे, तो दूसरी तरफ दिल्ली में सैन्य मुख्यालय के अफसर यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि आखिर घुसपैठ की असली गहराई और मकसद क्या है। यही वजह है कि शुरुआती हफ्तों में मैदान और मुख्यालय, दोनों जगह हलचल एक साथ तेज हो गई थी।
जनरल मलिक का वो सबक जो कारगिल में काम आया
जनरल मलिक बताते हैं कि किसी भी घटना की पहली रिपोर्ट में दिया गया आकलन शायद ही कभी संतुलित होता है। कई बार स्थिति को जरूरत से ज्यादा बड़ा करके पेश किया जाता है, तो कई बार उसे बहुत निराशाजनक बताया जाता है। यह सबक उन्होंने अपने करियर की शुरुआत में ही सीख लिया था कि हालात का सटीक अंदाजा तभी लगाया जा सकता है जब कमांडर खुद जमीन पर जाकर स्थिति को परखे। कारगिल में भी यही सिद्धांत लागू हुआ और शुरुआती भ्रम को दूर करने के लिए बार-बार जमीनी हकीकत जांचनी पड़ी।
21 मई की बैठक में खुली घुसपैठ की असली तस्वीर
जनरल मलिक के अनुसार, आर्मी हेडक्वार्टर के ऑपरेशंस रूम में 21 मई को चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी यानी सीओएससी की एक अहम बैठक हुई। इसी बैठक में पहली बार अफसरों के सामने कारगिल में घुसपैठ की पूरी और साफ तस्वीर उभरकर आई। उससे पहले तक अलग-अलग हिस्सों से मिल रही खबरें बिखरी हुई थीं, लेकिन इस मीटिंग ने घटना की गंभीरता को एक जगह जोड़कर दिखा दिया।
बटालिक से निकलकर पूरे ब्रिगेड इलाके में फैली जंग
शुरुआत में लड़ाई बटालिक सेक्टर में घुसपैठियों के साथ छोटी झड़प के तौर पर सामने आई थी, लेकिन बहुत जल्द इसने बड़ा रूप ले लिया। यह टकराव 121 (I) इन्फैंट्री ब्रिगेड के तहत आने वाले सभी बटालियन-डिफेंडेड इलाकों तक जा पहुंचा। नतीजा यह हुआ कि हर उस जगह पर तैनात भारतीय गश्ती दलों का सामना घुसपैठियों से होने लगा, जहां पहले शांति मानी जा रही थी।
हाईवे और सप्लाई लाइन पर मंडराता खतरा
इसी दौरान सेना को यह भी अंदाजा लगने लगा कि घुसपैठियों की तादाद एक हजार से भी ज्यादा है। ये हथियारबंद घुसपैठिए अकेले नहीं थे, बल्कि उनके पास मोर्टार और तोपखाने का भी सहारा मौजूद था। इनकी नजर सिर्फ नेशनल हाईवे तक सीमित नहीं थी, बल्कि एलओसी पर मौजूद भारतीय चौकियों तक पहुंचने वाले सप्लाई रूट्स पर भी इन्होंने आवाजाही रोकनी शुरू कर दी थी, जिससे जवानों तक राशन और साजो-सामान पहुंचाना मुश्किल होने लगा था।
इतनी खामोश घुसपैठ कि किसी चौकी को भनक तक नहीं लगी
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि घुसपैठ इतने गुपचुप ढंग से अंजाम दी गई थी कि एलओसी पर तैनात किसी भी चौकी या पोस्ट के जवानों को घुसपैठियों के आने की भनक तक नहीं लगी। न तो किसी पोस्ट पर सीधा हमला हुआ और न ही आसपास कोई बड़ी मुठभेड़ दर्ज हुई। इसका मतलब यह निकलता है कि घुसपैठिए बिना किसी सीधी टक्कर के काफी अंदर तक घुसने में सफल हो गए थे, जिसने बाद में पूरी सेना को चौंका दिया।
खतरा भांपते ही मोर्चे पर उतरीं नई बटालियनें
जैसे ही खतरे की असली गंभीरता सामने आने लगी, सेना ने बिना देर किए अतिरिक्त जवानों को मोर्चे पर भेजना शुरू कर दिया। 3 इन्फैंट्री डिवीजन से 1/11 गोरखा राइफल्स और 12 जेएकेएलआई यानी जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फैंट्री, इन दो बटालियनों को प्रभावित इलाकों की ओर रवाना किया गया। इन दोनों को 70 इन्फैंट्री ब्रिगेड हेडक्वार्टर के अधीन रखा गया, जिस पर बटालिक सेक्टर की सुरक्षा संभालने की जिम्मेदारी पहले से थी।
द्रास सेक्टर में सिख और नागा बटालियनों की एंट्री
कारगिल में तेजी से बदल रहे हालात को देखते हुए कश्मीर घाटी से भी दो और बटालियनों, 1 नागा और 8 सिख, को द्रास सेक्टर भेजा गया। इनकी कमान 56 माउंटेन ब्रिगेड हेडक्वार्टर को सौंपी गई, जिसने पूरे इलाके की सुरक्षा व्यवस्था अपने हाथ में ले ली। साथ ही, मोर्चे को और मजबूत बनाने के मकसद से राष्ट्रीय राइफल्स की कुछ यूनिट्स को भी द्रास और कारगिल की ओर रवाना किया गया था।
पाकिस्तानी फौज की मिलीभगत का शक कैसे गहराया
उस दौर में सेना के भीतर काफी हद तक यह राय बन चुकी थी कि इस घुसपैठ के पीछे पाकिस्तानी सेना का सीधा हाथ है, मगर ऐसा कोई पुख्ता सबूत हाथ नहीं लगा था जिसे अंतिम प्रमाण माना जा सके। घुसपैठियों ने अपनी असली पहचान छिपाने के लिए मुजाहिदीन जैसे सामान्य कपड़े पहन रखे थे। इसके बावजूद उनके काम करने का ढंग, इस्तेमाल की गई रणनीति, हथियारों की बनावट और लड़ने की शैली, यह सब साफ इशारा कर रहा था कि ये कोई साधारण आतंकी नहीं, बल्कि पूरी तरह ट्रेंड सैनिक हैं।
हथियार और हमले के तरीके ने खोली पोल
पहले-पहल यही समझा जा रहा था कि सामने सिर्फ जिहादी घुसपैठिए मौजूद हैं, लेकिन धीरे-धीरे यह धारणा बदलती चली गई। इन घुसपैठियों के पास ऐसे आधुनिक हथियार थे, जो आमतौर पर किसी नियमित इन्फैंट्री बटालियन को ही जारी किए जाते हैं। इसके अलावा वे भारतीय जवानों की आवाजाही वाले रास्तों और सप्लाई रूट्स पर आर्टिलरी व मोर्टार से बेहद सटीक निशाना साध रहे थे। इस सटीकता ने इस शक को और पुख्ता कर दिया कि यह महज आतंकियों का हमला नहीं हो सकता।
इंटेलिजेंस इनपुट और जमीनी हकीकत में फासला
घुसपैठ के दौरान पाकिस्तान की तरफ से तोपखाने से लगातार गोलाबारी जारी थी। दूसरी तरफ पाकिस्तान के रेडियो नेटवर्क से पकड़े गए इंटरसेप्ट और भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसियों की शुरुआती रिपोर्टें यही संकेत दे रही थीं कि घुसपैठिए पाकिस्तानी जिहादी आतंकी हैं। मगर मैदान में उनकी हरकतें और लड़ने का अंदाज कुछ और ही कहानी बयां कर रहा था, जो साफ बता रहा था कि ये आतंकी नहीं बल्कि प्रशिक्षित सैनिक हैं।
17 मई की एक तस्वीर ने बदल दी पूरी जांच की दिशा
17 मई को नई दिल्ली स्थित एविएशन रिसर्च सेंटर ने एक अहम हवाई तस्वीर हासिल की, जिसे 19 मई को सेना मुख्यालय को सौंप दिया गया। इस तस्वीर में पाकिस्तानी सेना का एक हेलीकॉप्टर एलओसी पार करके भारतीय क्षेत्र की दिशा में उड़ता हुआ कैद हुआ था। इस अकेली तस्वीर ने वह कड़ी जोड़ दी, जिसकी तलाश हफ्तों से थी, यह साफ हो गया कि चोटियों पर बैठे घुसपैठियों को पाकिस्तानी सेना से सीधी मदद मिल रही है।
सैटेलाइट तस्वीरों की कमी बनी सबसे बड़ी अड़चन
17 मई को एविएशन रिसर्च सेंटर से मिली इस हवाई तस्वीर के अलावा, उस वक्त कोई और हवाई या सैटेलाइट तस्वीर सेना के पास मौजूद नहीं थी। यही वजह रही कि घुसपैठिए ठीक-ठीक कहां-कहां बैठे हैं, उनकी असल संख्या कितनी है और उन्होंने किन इलाकों पर कब्जा जमाया है, इसका सटीक आकलन करना बेहद मुश्किल हो गया था। सीमित जानकारी के चलते सेना के सामने पूरी स्थिति की तस्वीर लंबे समय तक अस्पष्ट बनी रही।



















