जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने राजधानी के जंतर-मंतर पर 10 अक्टूबर 2026 को आयोजित विरोध प्रदर्शन में हिस्सा न लेने का फैसला किया है. कॉकरोच जनता पार्टी की तरफ से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर यह प्रदर्शन रखा गया था. पहले इसी संगठन के आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभा चुके वांगचुक ने एक वीडियो संदेश साझा कर स्पष्ट किया कि इस समय उनका पूरा ध्यान लद्दाख की नाजुक पर्यावरणीय परिस्थितियों और आने वाली कड़ाके की ठंड से पहले स्थानीय स्तर पर राहत कार्य पूरा करने पर लगा है.
लद्दाख में आसन्न जल संकट और हिमनदों की सुरक्षा बनी मुख्य वजह
सोनम वांगचुक के अनुसार लद्दाख के ऊंचाई वाले पर्वतीय इलाकों में जल संकट एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है. क्षेत्र के काश्तकारों और ग्रामीण आबादी को वसंत के महीनों में सिंचाई और दैनिक उपयोग के लिए पर्याप्त पानी मिल सके, इसके लिए उनकी टीम मानव निर्मित कृत्रिम ग्लेशियर तैयार करने के प्रोजेक्ट पर दिन-रात जुटी है. यदि सर्दियों की शुरुआत से पहले यह ढांचा तैयार नहीं किया गया, तो पूरे इलाके में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है.
इसके साथ ही हिमालयी क्षेत्र में हिमनद झीलों के अप्रत्याशित रूप से फटने से पैदा होने वाले विनाशकारी जलप्रलय, जिसे वैज्ञानिक भाषा में जीएलओएफ या ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहा जाता है, की रोकथाम के लिए भी उनका दल तकनीकी उपाय तलाश रहा है. पूरे पर्वतीय इलाके में ऐसी करीब 200 से ज्यादा हिमनद झीलें चिह्नित हैं जो कभी भी टूटकर निचले रिहायशी इलाकों को तबाह कर सकती हैं. वांगचुक ने कहा कि इन 200 से अधिक संवेदनशील झीलों के खतरे को बेअसर करने के लिए तुरंत फील्ड वर्क की दरकार है, जिसे बीच में नहीं छोड़ा जा सकता.
प्रशासनिक अड़चनों के बीच जमीनी मोर्चे पर डटे रहने का संकल्प
पर्यावरण कार्यकर्ता ने इस बात का भी उल्लेख किया कि उनकी टीम द्वारा स्थानीय स्तर पर चलाए जा रहे अभियानों को अक्सर व्यवस्थागत और आधिकारिक रुकावटों का सामना करना पड़ता है. इसके बावजूद उनका मानना है कि सरहदी इलाकों में पारिस्थितिकी तंत्र की हिफाजत करना सीधे तौर पर देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला है. उन्होंने जोर देकर कहा कि शीतकाल के बेहद सख्त मौसम के दस्तक देने से पहले संवेदनशील भूभागों को सुरक्षित बनाना उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, जिसके आगे राजनीतिक धरने गौण हो जाते हैं.
नीट विरोध में 26 दिनों के अनशन से इस बार का रुख एकदम अलग
सोनम वांगचुक का मौजूदा रुख उनके पुराने आंदोलनों से एकदम अलग दिखाई देता है. इससे पहले जब कॉकरोच जनता पार्टी ने नीट परीक्षा के पर्चे लीक होने को लेकर दिल्ली में मोर्चा खोला था, तब वांगचुक उस संघर्ष के सबसे बड़े चेहरे बने थे. उन्होंने छात्रों की मांग के समर्थन में जंतर-मंतर पर पूरे 26 दिन तक लगातार भूख हड़ताल की थी. उनके उस कड़े उपवास ने पूरे देश में परीक्षा प्रणाली में सुधार की बहस छेड़ दी थी, जिसके बाद सरकार ने औपचारिक लिखित भरोसा दिया था और तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा था. लेकिन उस सफलता के बाद अब वांगचुक ने चुनावी और दलीय खींचतान से अलग होकर अपनी वैज्ञानिक व पर्यावरण केंद्रित प्राथमिकताओं पर लौटने का निर्णय लिया है.
फैज के शेर से समझाया राजनीति और समाज का फर्क
सड़क पर होने वाले सियासी टकराव से खुद को अलग करते हुए सोनम वांगचुक ने मशहूर शायर फैज अहमद फैज के कलाम का सहारा लिया. उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि दुनिया में सियासत के अलावा भी इंसानी वजूद से जुड़ी कई गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं. उन्होंने राजनीतिक सुधारों के लिए संघर्ष कर रहे लोगों की निष्ठा की तारीफ तो की, लेकिन याद दिलाया कि जलवायु परिवर्तन और कुदरत के बदलते मिजाज से पैदा होने वाले खतरे किसी भी सियासी संकट से कम भयानक नहीं हैं. ऐसे खतरों से निपटने के लिए नारेबाजी के बजाय प्रयोगशालाओं और बर्फीली चोटियों पर व्यावहारिक वैज्ञानिक समाधान विकसित करने होंगे.
प्रदर्शनकारियों को नसीहत और शांतिपूर्ण संवाद की पैरवी
सोनम वांगचुक ने धरने के आयोजकों के प्रति सद्भाव व्यक्त करते हुए तमाम सियासी दलों और युवा संगठनों से संयम बरतने का आग्रह किया है. उनका कहना था कि मतभेदों के बावजूद बातचीत के रास्ते कभी बंद नहीं होने चाहिए. युवाओं और छात्र नेताओं को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सिद्धांतों की याद दिलाते हुए उन्होंने अपील की कि जंतर-मंतर पर होने वाले किसी भी प्रदर्शन की मर्यादा अहिंसा में ही निहित है. जनहित के बड़े मुद्दों पर आपसी कटुता बढ़ाने के बजाय सत्ता और समाज के बीच गंभीर और परिपक्व संवाद होना चाहिए.




















