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विपक्षी विरोध प्रदर्शनों के बीच विश्व बैंक और आईएमएफ के आंकड़ों में भारत की आर्थिक और रक्षा प्रगतिदिल्ली
2 नव॰ 2026, 12:03 am (2 घंटे पहले)· 0

विपक्षी विरोध प्रदर्शनों के बीच विश्व बैंक और आईएमएफ के आंकड़ों में भारत की आर्थिक और रक्षा प्रगति

दिल्ली में विपक्षी रैलियों और राजनीतिक टकराव के दौर में वैश्विक संस्थाओं के ताजा आंकड़े भारत में गरीबी में बड़ी गिरावट, मजबूत विकास दर और रक्षा क्षेत्र के विस्तार को रेखांकित कर रहे हैं।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में राजनीतिक गतिविधियों की गहमागहमी और आरोप-प्रत्यारोप के दौर के बीच देश के बुनियादी आर्थिक संकेतकों और विकास के आंकड़ों पर वैश्विक संस्थाओं के नए विश्लेषण सामने आए हैं। एक तरफ विपक्षी दल चुनावी प्रक्रियाओं, आयोगों की कार्यप्रणाली और संस्थानों की भूमिका को लेकर सवाल उठाते हुए सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संगठनों की रिपोर्टें भारत में गरीबी उन्मूलन, सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर और सामरिक आत्मनिर्भरता के मोर्चे पर महत्वपूर्ण बदलावों को रेखांकित कर रही हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि समकालीन भारतीय परिदृश्य में एक ओर तीखी चुनावी सियासत चल रही है, तो दूसरी ओर नीतिगत परिणामों और ढांचागत उपलब्धियों के ठोस आंकड़े नीति निर्माताओं के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं।

दिल्ली में राजनीतिक प्रदर्शन और परस्पर दावे

नवंबर के शुरुआती सप्ताह में दिल्ली के सियासी गलियारों में तीखा टकराव देखने को मिला। एक नवंबर को जहां विपक्षी दलों के गठबंधन ने एक बड़ी रैली का आयोजन किया, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के मुद्दे पर पैदल मार्च निकाला। इस रैली के समय को लेकर राजधानी के स्थानीय व्यापारिक हलकों में भी चर्चाएं रहीं, जहां कारोबारियों का मानना था कि त्योहारी सीजन के दौरान धरना-प्रदर्शन और मार्च आयोजित करने से वाणिज्यिक गतिविधियों और आम जनजीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। चुनावी विश्लेषक यह भी रेखांकित करते हैं कि बैलेट आधारित हालिया चुनावों में जिस तरह के कांटे के मुकाबले देखे गए और सीटें जीतने के लिए मशक्कत करनी पड़ी, उससे राजनीतिक समीकरणों में लगातार बदलाव की तस्वीर साफ होती है।

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रैली के प्रभाव और जनसमर्थन को लेकर दोनों पक्षों के दावे पूरी तरह विरोधाभासी रहे। जहां विपक्षी नेतृत्व ने लाखों लोगों के जुटने की बात कही, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने वीडियो फुटेज जारी करते हुए आरोप लगाया कि सभा स्थल का लगभग 40 फीसदी हिस्सा खाली था और भाषण के बीच में ही लोग वहां से जाने लगे थे। इसके साथ ही यह सवाल भी उठाया गया कि जब चुनाव आयोग और एसआईआर से जुड़े मामले पहले से ही देश की शीर्ष अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन हैं, तब न्यायिक प्रक्रिया की प्रतीक्षा करने के बजाय सड़कों पर आंदोलन खड़ा करने की रणनीति अपनाई जा रही है।

गरीबी उन्मूलन पर विश्व बैंक के आंकड़े

राजनीतिक नारों और वास्तविक नीतिगत बदलावों के बीच का अंतर अक्सर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय आंकड़ों से स्पष्ट होता है। भारत में गरीबी हटाने के नारे दशकों पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उसके बाद राजीव गांधी के समय से राजनीतिक विमर्श का मुख्य केंद्र रहे हैं। हालांकि, इन ऐतिहासिक नारों की तुलना में जमीनी धरातल पर आए बदलावों का ताजा मूल्यांकन विश्व बैंक के नए अध्ययन में किया गया है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2011 से 2023 के मध्य भारत में लगभग 49.6 करोड़ लोग गरीबी के एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मानक से ऊपर उठने में सफल रहे हैं।

यह संख्या बताती है कि पिछले दशक में चलाई गई कल्याणकारी योजनाओं, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और बुनियादी ढांचे में किए गए निवेश ने अत्यधिक गरीबी के जाल को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विश्लेषकों का मानना है कि दशकों तक जो लक्ष्य केवल चुनावी सभाओं और राजनीतिक घोषणापत्रों तक सीमित रहे, उन्हें सुनियोजित आर्थिक नीतियों, वित्तीय समावेशन और जमीनी क्रियान्वयन के जरिए गति दी गई है। वैश्विक मंचों पर भारत के इस सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण को एक बड़े सकारात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

वैश्विक उथल-पुथल के बीच विकास दर और आईएमएफ का अनुमान

वर्तमान समय में जब पूरी दुनिया गंभीर भू-राजनीतिक तनावों, रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया में अस्थिरता, यूरोप में आर्थिक सुस्ती और चीन की विकास दर में आ रही गिरावट से जूझ रही है, तब भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन तुलनात्मक रूप से मजबूत बना हुआ है। ऊर्जा संकट, महंगाई के दबाव और एल नीनो जैसी मौसमीय चुनौतियों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने अपने वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक में भारत की आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान को बढ़ाकर 7 फीसदी कर दिया है।

यह अनुमान स्पष्ट करता है कि घरेलू मांग, विनिर्माण क्षेत्र में निवेश और सुदृढ़ व्यापक आर्थिक नीतियों ने भारतीय बाजार को वैश्विक झटकों से काफी हद तक सुरक्षित रखा है। जहां विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों की अर्थव्यवस्थाएं मंदी और ऊंची ब्याज दरों की दोहरी मार झेल रही हैं, वहीं भारत में 7 फीसदी की अनुमानित वृद्धि दर इसे प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाले देशों की श्रेणी में बनाए रखती है।

रक्षा बजट और स्वदेशी अंतरिक्ष तकनीक में आत्मनिर्भरता

आर्थिक मोर्चे के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक तकनीक के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व बदलाव दर्ज किए गए हैं। देश का रक्षा बजट वित्तीय वर्ष 2013-14 में लगभग 2.53 लाख करोड़ रुपये था, जो वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए बढ़कर 7.85 लाख करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच गया है। बजट में यह तीन गुना से अधिक की वृद्धि न केवल सेना के आधुनिकीकरण और सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जरूरी संसाधनों को दर्शाती है, बल्कि बड़े रक्षा सौदों और स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में भी एक निर्णायक कदम है।

तकनीकी आत्मनिर्भरता का एक बड़ा उदाहरण अंतरिक्ष क्षेत्र में सामने आया है। भारत ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अपने जीएसएलवी-एफ18 रॉकेट का सफल प्रक्षेपण किया। यह रॉकेट अगली पीढ़ी के नेविगेशन उपग्रह एनवीएस-03 को कक्षा में स्थापित करने के लिए ले गया। स्वदेशी तकनीक और स्थानीय संसाधनों के दम पर विकसित यह उपग्रह प्रणाली देश की नेविगेशन क्षमताओं को सशक्त करती है, जिससे नेविगेशन सेवाओं के लिए अमेरिका अथवा विदेशी प्रणालियों पर भारत की सामरिक निर्भरता पूरी तरह समाप्त होने की दिशा में बड़ा मील का पत्थर स्थापित हुआ है।

नारेबाजी बनाम धरातलीय परिणाम

समूचे घटनाक्रम का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि देश में इस समय दो अलग-अलग तरह के राजनीतिक नैरेटिव समानांतर चल रहे हैं। एक तरफ संसद से लेकर रामलीला मैदान तक संस्थाओं की निष्पक्षता, वोटिंग प्रणाली और चुनावी शुचिता पर सवाल उठाकर जनभावनाओं को आंदोलित करने का प्रयास हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ सत्ता पक्ष का पूरा ध्यान आर्थिक संकेतकों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रमाणपत्रों, गरीबी निवारण के आंकड़ों और रक्षा क्षेत्र की स्वदेशी सफलताओं को सामने रखकर अपनी नीतियों को सही ठहराने पर केंद्रित है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जहां विपक्ष की ओर से उठाए गए सवालों का अपना महत्व है, वहीं आम जनता के जीवन में आए वास्तविक सुधार, आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा के ठोस नतीजे ही अंततः किसी भी शासन का अंतिम पैमाना तय करते हैं।

सवाल-जवाब

विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कितने लोग गरीबी से बाहर निकले हैं?
विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2011 से 2023 के बीच भारत में करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी के एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मानक से ऊपर आए हैं।
आईएमएफ ने भारत की आर्थिक विकास दर का क्या अनुमान लगाया है?
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने वैश्विक तनाव और ऊर्जा संकट के बावजूद भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान बढ़ाकर 7 फीसदी किया है।
भारत के रक्षा बजट में पिछले वर्षों में कितनी वृद्धि हुई है?
भारत का रक्षा बजट 2013-14 के करीब 2.53 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 में 7.85 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
हाल ही में श्रीहरिकोटा से किस रॉकेट और उपग्रह का प्रक्षेपण किया गया?
सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से जीएसएलवी-एफ18 रॉकेट के जरिए अगली पीढ़ी के नेविगेशन उपग्रह एनवीएस-03 का सफल प्रक्षेपण किया गया।
दिल्ली में एक नवंबर को किन प्रमुख राजनीतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ?
एक नवंबर को विपक्षी गठबंधन ने महारैली का आयोजन किया, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने सिख दंगों के मुद्दे पर पैदल मार्च निकाला।
दिल्ली के व्यापारियों ने त्योहारों के समय रैली को लेकर क्या चिंता जताई थी?
व्यापारियों का कहना था कि त्योहारों के समय धरना, प्रदर्शन और रैलियां आयोजित करने से कामकाज और स्थानीय व्यापार पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Tanvi Desai@tanvi-desai·30 मिनट पहले

त्योहारों के वक्त दिल्ली की सड़कों पर इस तरह की रैलियों से आम जनता और कारोबारियों को बहुत परेशानी होती है। राजनीति अपनी जगह है, पर विकास और गरीबी कम होने के आंकड़े देखकर थोड़ा सुकून मिलता है कि देश आगे बढ़ रहा है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·50 मिनट पहले

त्योहारी सीजन में रैलियां होने से व्यापार पर असर की बात तो ठीक है, पर सिर्फ विश्व बैंक के आंकड़ों से सब कुछ सही मान लेना भी जल्दबाजी होगी। ज़मीन पर आम आदमी की मुश्किलें अभी भी कम नहीं हुई हैं।

Vikram Yadav@vikram-yadav·49 मिनट पहले

अर्जुन भाई, बात सही है आपकी। त्योहार के समय दिल्ली में भीड़-भाड़ के बीच ऐसी रैलियों से दुकानदारों का नुकसान तो होता ही है।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

कल जब कनॉट प्लेस से गुजर रहा था, तो इन रैलियों की वजह से ट्रैफिक में दो घंटे फंस गया। त्योहार का समय है, जनता को परेशानी अलग होती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

रोहन भाई, त्योहार के समय सीपी में ट्रैफिक फंसना सच में बहुत सिरदर्द है। ये रैलियां आम जनता की दीवाली बिगाड़ देती हैं।

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