अंगूर सेहत के लिए बहुत गुणकारी होते हैं क्योंकि इनमें विटामिन, पोटेशियम, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। हालांकि बाजार में बिकने वाले अंगूरों पर ऑक्सेलिक एसिड जैसे केमिकल्स का छिड़काव किया जाता है ताकि वे लंबे समय तक तरोताजा रहें। इसके अलावा उन्हें चमकदार और आकर्षक बनाने के लिए वैक्स या ऑयल स्प्रे का भी इस्तेमाल किया जाता है। यही वजह है कि कई लोग अपने घर के गमलों में ही अंगूर उगाना पसंद करते हैं। कई बार गमले में लगे पौधे पर फूल और फल नहीं आते हैं या फिर फूल झड़ जाते हैं। अक्टूबर और नवंबर के महीनों में अंगूर के पौधे की विशेष देखभाल करनी होती है। सर्दियों के मौसम में पौधे में कौन सी खाद डाली जानी चाहिए और इसकी देखभाल कैसे की जाए, यह जानना बहुत जरूरी है।
बाजार से मिलने वाले खाने वाले अंगूर के बीजों से पौधा तो तैयार हो जाता है लेकिन उसमें फल नहीं आते हैं। इसके लिए नर्सरी से अंगूर की ग्राफ्टेड बेल लानी चाहिए जिसमें जल्दी फल आने की संभावना होती है। नर्सरी से पौधा या बेल लाते ही उसे शुरुआत में लिक्विड न्यूट्रिएंट देना चाहिए। आजकल एनपीके जैसे लिक्विड फर्टिलाइजर आसानी से ऑनलाइन मिल जाते हैं जिन्हें पानी में मिलाकर दिया जा सकता है। ऐसा करने से बेल मात्र 20 दिन के भीतर बहुत अच्छे से फैल जाती है। अंगूर की बेहतरीन वैराइटी में थॉम्पसन सीडलेस सबसे ज्यादा लोकप्रिय मानी जाती है। इसके अलावा सोनाका, मणिक चमन और पूसा नवरंग वैराइटी भी काफी अच्छी हैं जिनमें 15 से 20 के गुच्छों में फल लगते हैं।
अंगूर की बेल लगाने के लिए जुलाई और अगस्त का महीना सबसे उपयुक्त होता है क्योंकि इस बारिश के सीजन में पौधे की ग्रोथ बहुत अच्छी होती है। शुरुआत में इस पौधे को 18 इंच के गमले में लगाया जा सकता है। गमले को ऐसी जगह पर रखना चाहिए जहां भरपूर धूप आती हो और ग्रो बैग या गमले में पानी निकलने के लिए ड्रेन होल जरूर होना चाहिए। मिट्टी तैयार करते समय गमले में 50 प्रतिशत बगीचे की मिट्टी, 40 प्रतिशत वर्मी कंपोस्ट या सड़े हुए गोबर की खाद, 200 ग्राम नीम खली और 300 ग्राम स्टोन डस्ट या कैल्शियम पाउडर मिलाना चाहिए।
अंगूर की बेल के लिए नवंबर, दिसंबर और जनवरी के महीने डोरमेंसी वाले होते हैं जिनमें इसकी पत्तियां झड़ जाती हैं। इन तीन महीनों के दौरान बेल की प्रूनिंग या छंटाई करना बहुत जरूरी है और बेल की लंबाई 15 फीट से अधिक नहीं होनी चाहिए। अंगूर की बेल के लिए नेट का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए और केवल एक मुख्य बेल को ही रखना चाहिए। बेल पर निकलने वाली छोटी-छोटी शाखाओं को काट देना चाहिए जिससे मुख्य बेल मोटी और घनी हो जाती है और इसी दौरान फल-फूल ज्यादा मात्रा में आते हैं। अक्टूबर और नवंबर के महीने में ही पौधे को खाद देना उचित रहता है।
प्रूनिंग करने के बाद गमले की मिट्टी की अच्छी तरह गुड़ाई करें और फिर वर्मी कंपोस्ट, दो चम्मच सरसों खली तथा दो चम्मच सीवीड ग्रेन्यूल्स मिलाकर एक मिश्रण तैयार कर लें। इस मिश्रण को गमले में डालकर ऊपर से मिट्टी से हल्का सा कवर कर देना चाहिए क्योंकि ये तीनों ही ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर हैं। ये खाद जनवरी और फरवरी से पौधे को शानदार ग्रोथ देते हैं। यदि पौधा पुराना हो चुका है और उसकी ग्रोथ रुक गई है तो उसे रिपॉट कर लेना चाहिए और जड़ों की हल्की छंटाई करके नए सिरे से मिट्टी और वर्मी कंपोस्ट का मिश्रण भरकर पानी दे देना चाहिए।
सर्दियों के सीजन में अंगूर का पौधा बिल्कुल सूखा हुआ प्रतीत होता है और इसकी पत्तियां पीली होकर झड़ जाती हैं। दिलचस्प बात यह होती है कि पौधा अंदर से पूरी तरह हरा रहता है और उस पर एक भी पत्ता नजर नहीं आता है। इस स्थिति में पौधे को प्रोटीन प्लांट मिक्स खाद दी जा सकती है या फिर सरसों खली, नीम खली, वर्मी कंपोस्ट और ह्यूमिक एसिड या सीवीड का मिश्रण तैयार करके गमले की मिट्टी की गुड़ाई के बाद डाला जा सकता है। फरवरी के महीने से पौधे पर नई कलियां आने लगती हैं, नए गुच्छे निकलते हैं और खूब सारे फल लगते हैं। इसके अलावा पौधे में एप्सम सॉल्ट का इस्तेमाल भी किया जा सकता है जिससे पत्तियों में चमक आती है और एक चम्मच एप्सम सॉल्ट को एक लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे किया जा सकता है। गर्मियों के मौसम में अंगूर के पौधे की ग्रोथ सबसे ज्यादा होती है और इसी दौरान पानी का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। यदि इस प्रकार से पौधे की देखभाल की जाए तो एक ही पौधे से 10 से 20 किलो तक का उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है और पौधे पर गुच्छों में फल आएंगे।
























