मध्य प्रदेश में मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्रों और निजी कॉलेजों के लिए एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। राज्य सरकार मेडिकल शिक्षा में दाखिले की पूरी प्रक्रिया को नए सिरे से तय करने की तैयारी में है। इसके तहत वर्तमान में लागू मप्र मेडिकल एजुकेशन एडमिशन रूल्स-2018 में अहम संशोधन करके नए प्रवेश नियम-2026 का खाका तैयार किया जा रहा है। इस नए प्रस्ताव के लागू होने के बाद, राज्य के निजी मेडिकल कॉलेजों में 30 प्रतिशत सीटें सीधे तौर पर मैनेजमेंट कोटे के लिए आरक्षित कर दी जाएंगी।
सीटों के बंटवारे का नया गणित
सीटों के बंटवारे की इस नई व्यवस्था से प्रवेश प्रक्रिया का पूरा स्वरूप बदल जाएगा। प्रस्ताव के मुताबिक, निजी संस्थानों में 15 प्रतिशत एनआरआई (NRI) कोटा पहले की तरह ही बरकरार रहेगा और उसमें कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। इसके बाद बची हुई 55 प्रतिशत सीटों पर सामान्य काउंसलिंग प्रक्रिया के माध्यम से छात्रों को दाखिला दिया जाएगा। इतना ही नहीं, विभागीय सूत्रों का यह भी कहना है कि आने वाले समय में मैनेजमेंट कोटे की हिस्सेदारी को 30 प्रतिशत से बढ़ाकर 35 प्रतिशत करने के विकल्प पर भी गंभीरता से विचार किया जा सकता है।
सरकारी खजाने से बचेंगे 1000 करोड़ रुपये
इस बड़े बदलाव के पीछे सरकार का मुख्य उद्देश्य खजाने पर पड़ने वाले भारी आर्थिक बोझ को कम करना है। फिलहाल, राज्य सरकार मेधावी योजना के साथ-साथ एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों की फीस और स्कॉलरशिप पर हर साल एक बहुत बड़ी रकम खर्च करती है। यह सरकारी खर्च लगभग 1500 करोड़ रुपये के आंकड़े तक पहुंच जाता है। नए नियमों के पूरी तरह अस्तित्व में आने के बाद, सरकार को मैनेजमेंट और एनआरआई कोटे वाली सीटों की फीस का वहन नहीं करना पड़ेगा। इस कदम से सरकार को सालाना करीब 1000 करोड़ रुपये की बड़ी बचत होने का सीधा अनुमान है।
तमिलनाडु और राजस्थान मॉडल का अध्ययन
इन नए नियमों का एक मजबूत और पारदर्शी ड्राफ्ट तैयार करने के लिए चिकित्सा शिक्षा विभाग अन्य राज्यों के मॉडल का बारीकी से अध्ययन कर रहा है। विशेष रूप से तमिलनाडु और राजस्थान की प्रवेश व्यवस्था को परखा जा रहा है, क्योंकि वहां के निजी मेडिकल कॉलेजों में पहले से ही 30 प्रतिशत तक मैनेजमेंट कोटा सफलतापूर्वक लागू है। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि मैनेजमेंट कोटा होने का मतलब यह कतई नहीं है कि कोई भी छात्र केवल पैसे के दम पर सीधे प्रवेश ले सकेगा। इन विशेष सीटों पर भी दाखिला पूरी तरह से नीट (NEET) परीक्षा की मेरिट लिस्ट और राज्य स्तरीय काउंसलिंग के आधार पर ही सुनिश्चित किया जाएगा। बिना नीट परीक्षा पास किए किसी भी हाल में कॉलेज में एंट्री नहीं मिलेगी।
सामान्य से तीन गुना तक अधिक होगी फीस
फीस के मोर्चे पर मैनेजमेंट कोटे के छात्रों को एक बड़ी कीमत चुकानी होगी। प्रस्तावित ढांचे में, 55 प्रतिशत सामान्य सीटों की फीस तो पहले की तरह ही प्रवेश एवं शुल्क विनियामक समिति (एएफआरसी) द्वारा तय की जाएगी। लेकिन मैनेजमेंट कोटे वाली सीटों की फीस सामान्य निजी सीटों के मुकाबले करीब तीन गुना तक ज्यादा हो सकती है। अगर अन्य राज्यों के उदाहरण देखें, तो तमिलनाडु में मैनेजमेंट सीटों की सालाना फीस लगभग 40 से 56 लाख रुपये के बीच है, जबकि राजस्थान में यह आंकड़ा 28 से 30 लाख रुपये तक जाता है। मध्य प्रदेश में इन सीटों की अंतिम फीस तय करने का अधिकार एएफआरसी और एमपी पीयूआरसी के पास ही रहेगा।
विधानसभा में पेश होगा नया मसौदा
सरकार को पूरी उम्मीद है कि इस नई नीति से निजी मेडिकल कॉलेजों में काउंसलिंग खत्म होने के बाद भी सीटों के खाली रह जाने वाली एक बड़ी समस्या का स्थायी समाधान हो जाएगा। इसके अलावा, उन सक्षम छात्रों को भी डॉक्टर बनने का एक मौका मिलेगा, जो सामान्य मेरिट के कड़े मुकाबले में पीछे रह जाते हैं। इस प्रस्तावित ड्राफ्ट को कानून का रूप देने से पहले राज्य कैबिनेट की बैठक में मंजूरी के लिए रखा जाएगा, और वहां से हरी झंडी मिलने के बाद इसे विधानसभा के पटल पर अंतिम मुहर के लिए पेश किया जाएगा।



















