सिनेमा की दुनिया में करीब छह दशक बिताने के बाद भी किसी अभिनेता का हर दिन कैमरे के सामने उसी ताजगी से खड़े रहना किसी मिसाल से कम नहीं है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर अमिताभ बच्चन के एक व्लॉग के कुछ अंशों को गलत तरीके से जोड़कर उनके संन्यास की अटकलें लगाई जाने लगी थीं। कई लोग यह कयास लगाने लगे कि 83 साल की उम्र में शायद अब वह अभिनय की दुनिया को अलविदा कहने जा रहे हैं। इन चर्चाओं के जोर पकड़ने के बाद खुद अमिताभ बच्चन ने स्थिति स्पष्ट करते हुए दो टूक कहा कि वह रिटायर नहीं हो रहे हैं। उनके इस बयान ने यह साबित कर दिया कि उम्र चाहे जो भी हो, उनके भीतर काम करने की ऊर्जा अब भी पहले जैसी ही बनी हुई है।
हिंदी फिल्म उद्योग में लगभग 60 साल से लगातार सक्रिय अमिताभ बच्चन ने अपने सफर में हर तरह के दौर देखे हैं। उन्होंने बॉक्स ऑफिस पर साधारण शुरुआत से लेकर ऐतिहासिक ब्लॉकबस्टर फिल्मों तक का स्वाद चखा है। कभी दौलत और शोहरत की बुलंदियां देखीं, तो कभी भारी कर्ज और नाकामी का दबाव भी चुपचाप झेला। बड़े पर्दे के साथ-साथ टेलीविजन के छोटे पर्दे पर भी उन्होंने एक नया मुकाम हासिल किया। इन तमाम उतार-चढ़ावों के बीच जो बात कभी नहीं बदली, वह थी काम को लेकर उनकी असाधारण निष्ठा। अस्सी पार की उम्र में भी वह कई बार 24 घंटे लगातार काम करते हैं।
काम के प्रति अटूट समर्पण और रविवार का नियम
टेलीविजन शो 'कौन बनेगा करोड़पति' की शूटिंग के दौरान भी वह कई बार साझा कर चुके हैं कि लगातार 24 घंटे काम करने के कारण उनका खान-पान तक अनियमित हो जाता है। इसके बावजूद उनकी दिनचर्या में अनुशासन कभी कम नहीं हुआ। वह सेट पर कभी देर से नहीं पहुंचते और न ही कभी बेवजह काम से छुट्टी लेते हैं। फिल्मों, विज्ञापनों, टीवी शो और सोशल मीडिया के व्यस्त कार्यक्रम के बीच भी वह अपने प्रशंसकों को कभी नहीं भूलते। कई दशकों से चली आ रही परंपरा के अनुसार वह हर रविवार अपने मुंबई स्थित आवास जलसा के बाहर जुटने वाले प्रशंसकों से मिलते हैं, हाथ जोड़कर उनका अभिवादन करते हैं और उनके स्नेह के लिए आभार जताते हैं। जो इंसान जीवन को काम और अनुशासन के धागे में पिरोकर जीता हो, उसके लिए उम्र केवल एक संख्या बनकर रह जाती है।
1969 से शुरुआत और 70 के दशक का एंग्री यंग मैन
अमिताभ बच्चन के फिल्मी करियर की शुरुआत साल 1969 में आई फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' से हुई थी। शुरुआती दौर आसान नहीं था, लेकिन 1970 के दशक ने भारतीय सिनेमा में उनके कद को हमेशा के लिए बदल दिया। इस दशक में उन्होंने 'जंजीर', 'दीवार', 'शोले', 'त्रिशूल', 'मुकद्दर का सिकंदर' और 'काला पत्थर' जैसी ऐतिहासिक फिल्मों में अपने अभिनय से दर्शकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी।
शुरुआती दौर में उन्होंने 'आनंद', 'अभिमान', 'चुपके चुपके' और 'मिली' जैसी फिल्मों में संजीदा और पारिवारिक भूमिकाएं निभाई थीं। लेकिन यश चोपड़ा की 'दीवार' के बाद उनकी वह पुरानी छवि पूरी तरह टूट गई और वह पर्दे पर एक मजबूत 'एंग्री यंग मैन' बनकर उभरे। 'दीवार' को उनके अपने पसंदीदा सिनेमाई अनुभवों में भी बेहद खास माना जाता है। इस दौर ने उन्हें भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सुपरस्टार बना दिया।
80 का दशक: नए प्रयोग और जिंदगी का सबसे बड़ा हादसा
साल 1980 के दशक में भी उन्होंने अपनी जुझारू छवि को कायम रखा, लेकिन साथ ही भूमिकाओं के चयन में नए प्रयोग भी किए। इस दौरान उन्होंने 'सिलसिला', 'याराना', 'शक्ति' और 'मर्द' जैसी चर्चित फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं निभाईं। यश चोपड़ा निर्देशित 'सिलसिला' में रेखा और जया बच्चन के साथ उनकी जोड़ी ने पर्दे पर खासी सुर्खियां बटोरीं।
यह वही दशक था जब उन्हें अपने जीवन के सबसे बड़े और दर्दनाक हादसे का सामना करना पड़ा। फिल्म 'कुली' के एक एक्शन सीन की शूटिंग के दौरान वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। चोट इतनी जानलेवा थी कि अस्पताल में डॉक्टरों ने भी एक समय उम्मीद छोड़ दी थी। उस दौरान पूरे देश के लोगों ने उनकी सलामती के लिए प्रार्थनाएं की थीं। जनता के उसी अपार प्यार और दुआओं के दम पर वह मौत के मुंह से सुरक्षित बाहर निकले। इसी वजह से अमिताभ बच्चन हर साल 2 अगस्त के दिन को अपने दूसरे जन्मदिन के रूप में याद करते हैं।
90 का दशक: नाकामी, गहरा कर्ज और एबीसीएल का झटका
1990 का दशक उनके करियर के लिए सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। इस दौर में गोविंदा, शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान और अक्षय कुमार जैसे युवा अभिनेता अपनी नई पहचान और लोकप्रियता के साथ तेजी से आगे बढ़ रहे थे। दूसरी ओर अमिताभ बच्चन अपनी साख और प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे थे। उस दौर में एक वक्त ऐसा भी आया जब बॉक्स ऑफिस पर गोविंदा का नाम उनसे अधिक प्रभावी माना जाने लगा।
इस दशक में उनकी 'सूर्यवंशम', 'लाल बादशाह', 'जादूगर' और 'अग्निपथ' जैसी कई फिल्में टिकट खिड़की पर सफल नहीं रहीं। हालांकि 'अग्निपथ' में दमदार अभिनय के लिए उन्हें करियर का पहला राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, लेकिन लगातार कमजोर प्रदर्शन ने उनके स्टारडम को झटका दिया। संकट सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहा। 1995 में उन्होंने अमिताभ बच्चन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एबीसीएल) नाम से अपनी प्रोडक्शन कंपनी शुरू की थी। महज एक साल के भीतर यह कंपनी भारी घाटे में चली गई और वह करोड़ों के कर्ज में डूब गए। हालात ऐसे बन गए थे कि उन्हें कुछ समय के लिए अभिनय की दुनिया से भी दूरी बनानी पड़ी थी।
2000 का दौर: टीवी का सहारा और ऐतिहासिक वापसी
साल 2000 में जब उनके करियर की नाव पूरी तरह डगमगा चुकी थी, तब उन्होंने एक अभूतपूर्व वापसी की। फिल्म 'मोहब्बतें' और छोटे पर्दे के रियलिटी शो 'कौन बनेगा करोड़पति' ने उनके करियर को दोबारा जीवनदान दिया। 'कौन बनेगा करोड़पति' को वह साल 2026 तक निरंतर होस्ट करते आ रहे हैं। इस शो ने उनके स्टारडम को घर-घर में फिर से स्थापित कर दिया।
इसके बाद उन्होंने 'कभी खुशी कभी गम', 'बागबान', 'ब्लैक', 'सरकार', 'चीनी कम' और 'पा' जैसी फिल्मों में अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया। इस दशक में उन्होंने मुख्य नायक के बजाय पिता, मजबूत सेकंड लीड और अहम चरित्र भूमिकाओं को स्वीकार करना शुरू किया। उन्होंने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि पर्दे पर उनका किरदार कमजोर न दिखे बल्कि कहानी का सबसे मजबूत आधार बने।
2010 के बाद का सफर और उम्र के अनुरूप भूमिकाएं
2010 के दशक में अमिताभ बच्चन ने अपने काम के तरीके को एक नई दिशा दी। उन्होंने अपनी ढलती उम्र को छुपाने के बजाय उम्रदराज किरदारों को पूरी गरिमा के साथ पर्दे पर उतारा। दीपिका पादुकोण के साथ आई फिल्म 'पीकू' में उनके शानदार अभिनय के लिए उन्हें करियर का दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इसके अलावा उन्होंने 'बुड्ढा होगा तेरा बाप', 'आरक्षण', 'सत्याग्रह', 'भूतनाथ रिटर्न्स', 'वजीर', 'बदला', 'गुलाबो सिताबो' और 'ठग्स ऑफ हिंदुस्तान' जैसी फिल्मों में अलग-अलग मिजाज के किरदार निभाए। 'बदला' और 'आरक्षण' में उनके गंभीर अभिनय को आलोचकों और दर्शकों दोनों से भरपूर सराहना मिली।
छह दशकों के इस लंबे सफर में पीढ़ियां बदल गईं, सिनेमा के मायने बदल गए और दर्शकों की पसंद भी बदल गई। लेकिन अभिनय को लेकर अमिताभ बच्चन का उत्साह आज भी जस का तस है। उनके काम करने की इसी भूख ने यह साफ कर दिया है कि जब तक शरीर और मन साथ दे रहे हैं, वह पर्दे से संन्यास लेने का कोई इरादा नहीं रखते।


















