इतिहास के पन्नों में दफन हजारों साल पुरानी इबारतों को डिकोड करने के लिए अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई ने प्राचीन इतिहास की दुनिया में कदम रखा है। ऑस्ट्रियन एकेडमी ऑफ साइंस बुधवार को प्राचीन यूनानी भाषा के लिए दुनिया का पहला उन्नत लार्ज लैंग्वेज मॉडल जारी करने जा रही है। इस विशेष मॉडल का नाम अपोलो रखा गया है, जिसे फ्रांसीसी एआई प्रयोगशाला मिस्ट्रल और प्रौद्योगिकी सेवा कंपनी सेल रिप्लाई के सहयोग से संयुक्त रूप से तैयार किया गया है।
शोधकर्ताओं ने अपोलो को लगभग 60 करोड़ ऐतिहासिक यूनानी शब्दों के विशाल डेटासेट पर प्रशिक्षित किया है। ये तमाम शब्द सदियों पुरानी हस्तलिखित पांडुलिपियों, पपीरस के टुकड़ों और पत्थरों व धातुओं पर उकेरे गए प्राचीन शिलालेखों से जुटाए गए हैं। अकादमिक जगत के शोधकर्ताओं और इतिहासकारों के लिए यह मॉडल एक चैटबॉट इंटरफेस के जरिए पूरी तरह मुफ्त में उपलब्ध कराया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य विद्वानों को उनके विशिष्ट शोध क्षेत्रों से जुड़े पपीरस के टुकड़ों की तुरंत पहचान करने और नए शोध आयामों को तेजी से खोजने में सक्षम बनाना है। जब भी कोई दस्तावेज फटा या खंडित होता है, तो अपोलो सांख्यिकीय संभावनाओं के आधार पर उन खाली जगहों को सबसे उपयुक्त शब्दों या वाक्यों से भरने का काम करता है, जिससे प्राचीन घटनाओं और परंपराओं के छिपे हुए पहलू सामने आ सकते हैं। सेल रिप्लाई के पार्टनर दिमित्रिस व्लितास का कहना है कि इस तरह ज्ञान के नए रास्ते खोलना केवल एक साल पहले तक अकल्पनीय माना जाता था।
प्राचीन ग्रीक भाषा की जटिलताएं और पारंपरिक बहाली की चुनौतियां
अब तक पपीरस के किसी फटे या जीर्ण-शीर्ण टुकड़े को बहाल करना बेहद श्रमसाध्य और जटिल काम रहा है। प्राचीन यूनानी लेखन शैली में शब्दों के बीच कोई खाली जगह या स्पेस नहीं छोड़ा जाता था। इस वजह से किसी कुशल भाषाविद को सबसे पहले लगातार लिखे अक्षरों में से शब्दों के विभाजन की पहचान करनी पड़ती थी। इसके बाद उस दस्तावेज का सटीक कालखंड तय करना, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों का सूक्ष्म मूल्यांकन करना और छूटे हुए हिस्सों को भरने के लिए संदर्भ सामग्री खंगाल कर सही शब्दों का चयन करना पड़ता था। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में क्लासिक्स और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के प्रोफेसर स्टीफन कोल्विन बताते हैं कि यूनानी इतिहास में इतनी गहरी विशेषज्ञता रखने वाले विद्वान पूरी दुनिया में बहुत कम मौजूद हैं।
अपोलो मॉडल में इतिहास और भाषाविज्ञान का यह गहरा अनुभव पहले से ही समाहित कर दिया गया है। ऑस्ट्रियन एकेडमी ऑफ साइंस की इतिहासकार और पपीरोलॉजिस्ट अन्ना डोलगानोव बताती हैं कि जब यह मॉडल होमर की रचनाओं को देखता है, तो यह होमरिक ग्रीक के अनुसार खाली जगहों को पूरा करता है, और जब यह डोरिक बोली में लिखा कोई शिलालेख देखता है, तो यह डोरिक बोली के व्याकरण और शब्दों का ही इस्तेमाल करता है। घंटों और महीनों तक जीर्णोद्धार के बारीक काम में उलझे रहने वाले शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि अपोलो इस पूरी प्रक्रिया को कई गुना तेज कर देगा, जिससे वे शब्दों के अर्थ सुलझाने के बजाय दस्तावेजों के ऐतिहासिक प्रभावों और निष्कर्षों पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।
ऑक्सफोर्ड से लेकर वैश्विक शोध तक नई रफ्तार
प्राचीन पपीरस के दुनिया के सबसे बड़े संग्रह का केंद्र माने जाने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड में शास्त्रीय भाषाओं और साहित्य के प्रोफेसर आर्मंड डी'अंगौर इसे बेहद उत्साहजनक मानते हैं। उनका कहना है कि अगर कोई मशीन यह बता दे कि किसी खाली स्थान में कौन से तीन संभावित शब्द फिट बैठ सकते हैं, तो इससे शोध कार्य की गति में भारी इजाफा होगा। हालांकि यह मॉडल प्राचीन दुनिया को लेकर हमारी बुनियादी समझ को रातोंरात पूरी तरह बदल देगा, इसकी संभावना काफी कम है। दरअसल कई पपीरस इसलिए अब तक अप्रकाशित और असंसाधित पड़े रहे क्योंकि वे आम रोजमर्रा के जीवन से जुड़े थे, जैसे निजी चिट्ठियां, वैवाहिक समझौते और नागरिक प्रशासनिक कागजात।
स्टीफन कोल्विन का कहना है कि अगर कोई आम व्यक्ति यह सोच रहा है कि अचानक सोफोक्लीज के कई नए नाटक सामने आ जाएंगे, तो ऐसा नहीं होने जा रहा है। इसके बावजूद, यह मॉडल प्राचीन दौर के जनजीवन की कई अनकही बारीकियों को उजागर करने और विद्वानों के मौजूदा ऐतिहासिक अनुमानों को पुख्ता करने में मददगार साबित होगा। आर्मंड डी'अंगौर बताते हैं कि जब भी कोई नया दस्तावेज डिकोड होता है, तो वह प्राचीन दुनिया के बारे में हमारे ज्ञान में एक नया बारीक तत्व जोड़ देता है।
अन्य ऐतिहासिक भाषाओं में विस्तार और मानवीय निगरानी का सवाल
दिमित्रिस व्लितास के मुताबिक, यदि अपोलो अपने मकसद में सफल रहता है, तो इसी तकनीक को लैटिन या प्राचीन मिस्र की भाषाओं जैसी अन्य पुरानी जुबानों पर भी आसानी से लागू किया जा सकता है। इसके अलावा किसी भी ऐसे अकादमिक क्षेत्र में इसका लाभ उठाया जा सकता है जहां भारी मात्रा में उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री को क्रमबद्ध और सूचीबद्ध करने की जरूरत हो। आधुनिक शोध में एआई ने कई क्षेत्रों में असाधारण सफलता दिखाई है, जैसे हाल ही में ओपनएआई ने बताया था कि उसके एआई मॉडल्स ने 200 साल पुरानी गणित की एक पहेली हल की, जबकि गूगल डीपमाइंड ने आनुवंशिक म्यूटेशन के आणविक जीव विज्ञान पर पड़ने वाले प्रभावों का नक्शा तैयार करने वाला एक विशाल डेटासेट जारी किया था, जिसे एआई की मदद से संकलित किया गया था।
प्राचीन दस्तावेजों की खाली जगहों को भरने के लिए संभाव्यता पर काम करने वाले भाषा मॉडल पर निर्भर रहने से ऐतिहासिक रिकॉर्ड में गलतियों के शामिल होने का खतरा भी बना रहता है। इस अवांछित स्थिति से बचने के लिए अपोलो को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह किसी रिक्त स्थान के लिए सीधे अंतिम फैसला सुनाने के बजाय कुछ संभावित शब्दों के विकल्प सुझाता है, ताकि विशेषज्ञ खुद सही शब्द चुन सकें। अन्ना डोलगानोव का कहना है कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतिम निर्णय में इंसानी दक्षता बनी रहनी चाहिए, क्योंकि अगर हम ऐतिहासिक सामग्री की व्याख्या के लिए पूरी तरह एआई पर निर्भर हो गए तो वहीं से गंभीर समस्याएं शुरू हो जाएंगी।


















