भारतीय सिनेमा के प्रभावशाली कलाकारों में शुमार नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर को देहांत हो गया, जिससे पूरे फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई। अपनी बेलाग बातचीत और संजीदा अभिनय के लिए पहचाने जाने वाले इस अभिनेता ने शोहरत की बुलंदियों तक पहुंचने से पहले बेहद कड़े इम्तिहान झेले थे। उनके जीवन का सबसे दुखद पहलू वह दौर रहा, जब भयंकर आर्थिक तंगी के कारण वह अपने अस्वस्थ पिता की समुचित चिकित्सा व्यवस्था कराने में लाचार साबित हुए थे।
सफलता मिलने से पहले ही उजड़ गया था संसार
सिनेमाई सफर में मुकाम हासिल करने के बाद उनकी आर्थिक दशा में उल्लेखनीय सुधार आया और धन-दौलत भी खूब मिली, परंतु यह कामयाबी उनके लिए बहुत देर से आई। अपने बीते दिनों को साझा करते हुए उन्होंने एक बार स्पष्ट किया था कि जब पारिवारिक जीवन में पैसों की सख्त आवश्यकता थी, तब उनकी जेबें खाली थीं। उस लाचारी को याद करते हुए उन्होंने कहा था, “जब मेरे पिता बीमार पड़े, तो मेरे पास उनके इलाज के पैसे नहीं थे और अस्पताल में उनकी मौत हो गई।”
सीढ़ियों और फुटपाथ पर गुजारी थीं सर्द रातें
जिस अवधि में उनके पिता रुग्णालय में उपचाराधीन थे, वह समय अभिनेता और उनके परिजनों के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। चिकित्सालय परिसर के भीतर रात्रि विश्राम की मनाही होने के कारण नाना पाटेकर को अपने एक साथी के संग बाहर खुले में रात काटनी पड़ती थी। किसी भी अप्रिय या शुभ समाचार की प्रतीक्षा में वे दोनों फुटपाथ अथवा सीढ़ियों पर बैठकर समय व्यतीत करने के लिए अंताक्षरी गाया करते थे, ताकि मन की घबराहट और अनिश्चितता को किसी तरह दबाया जा सके।
सुविधासंपन्न अस्पताल में न ले जा पाने का आजीवन पछतावा
नाना पाटेकर को जीवनपर्यंत इस बात की पीड़ा सालती रही कि साधनहीनता के कारण वह अपने पिता को किसी उच्चस्तरीय चिकित्सा संस्थान में स्थानांतरित नहीं कर सके। अपनी कला के दम पर उन्होंने पूरे देश में नाम कमाया और अकूत प्रतिष्ठा अर्जित की, मगर अंतिम सांसों के समय अपने पिता को सर्वोत्तम सुविधाएं न दे पाने का मलाल कभी कम नहीं हुआ।
मन में हमेशा बाकी रह गई लाचारी की टीस
अपने संस्मरणों में उन्होंने स्वीकार किया था कि यदि उस समय उनके पास पर्याप्त जमापूंजी होती, तो वे अपने पिता के लिए बेहतरीन औषधियों और आधुनिक चिकित्सा का प्रबंध कर सकते थे। पिता के देहावसान के बाद मन में उपजा अपराधबोध कभी समाप्त नहीं हुआ। उस विवशता भरे अतीत का स्मरण करते ही उनकी आंखें नम हो जाया करती थीं, क्योंकि अपनों को खोने का यह खालीपन कोई भी सफलता कभी भर नहीं पाई।



















