मंच पर संगीत पेश करने के तौर-तरीकों को लेकर संगीत जगत में छिड़ी गरमागरम बहस के बीच बॉलीवुड के जाने-माने पार्श्व गायक अभिजीत भट्टाचार्य ने अपना सख्त रुख सामने रखा है। छत्तीसगढ़ में आयोजित एक जलसे के दौरान दर्शकों के सम्मुख अपनी बात रखते हुए उन्होंने सीधे गायन के नाम पर चलने वाले दिखावे को आड़े हाथों लिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जब कोई फनकार मंच संभालता है तो उसे दर्शकों के सामने अपनी ही आवाज में गाना चाहिए, चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों। उनका यह बयान उस वक्त सामने आया है जब हाल के दिनों में जाने-माने पंजाबी गायक दलेर मेहंदी के एक कॉन्सर्ट को लेकर खासा बवाल मच चुका है। दलेर मेहंदी पर एक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन में सीधे गाने के बजाय पहले से रिकॉर्ड की गई आवाज पर केवल मुंह चलाने का आरोप लगा था।
मंच पर असली गायकी का महत्व
छत्तीसगढ़ में जुटे दर्शकों के सामने अपने विचार साझा करते हुए इस अनुभवी गायक ने कहा कि जो लोग संगीत से प्यार करते हैं, वे कलाकारों पर गहरा यकीन रखते हैं। गायक का कहना था कि चाहे आवाज बैठ जाए, बदन थकान से चूर हो या सुरों में थोड़ी बहुत चूक रह जाए, गायकी हमेशा सीधी और असली होनी चाहिए। उन्होंने एक छोटी सी बात में अपनी पूरी सोच बयां करते हुए कहा,
‘मैं जो भी गाऊंगा, लाइव गाऊंगा.’उनके इस दो-टूक नजरिए ने महफिल में मौजूद संगीत प्रेमियों का दिल छू लिया। उनका यह संबोधन सामने आते ही इंटरनेट पर चर्चा का केंद्र बन गया और कला प्रेमियों ने उनके इस विचार का स्वागत किया।
दर्शकों की गाढ़ी कमाई और आयोजकों का पसीना
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अभिजीत भट्टाचार्य ने इस बात पर खास जोर दिया कि दर्शक अपना अनमोल वक्त और मेहनत से कमाया हुआ धन खर्च करके किसी कॉन्सर्ट का टिकट खरीदते हैं। इसके अलावा, किसी भी बड़े जलसे को जमीन पर उतारने के लिए स्थानीय प्रशासन, कार्यक्रम के प्रबंधकों और मंच पर साज बजाने वाले वादकों को दिन-रात पसीना बहाना पड़ता है। ऐसे में जब कोई नामचीन हस्ती पोडियम पर आकर सिर्फ रिकॉर्डेड ट्रैक पर अभिनय करके निकल जाती है, तो यह दूर-दराज से सफर करके आए कद्रदानों के भरोसे पर गहरी चोट है। उनका मानना है कि एक सच्चे फनकार की असली पहचान ही इस बात में है कि वह मंच की अप्रत्याशित मुश्किलों का सामना अपनी स्वाभाविक आवाज के दम पर करे।
दलेर मेहंदी प्रकरण से सुलगती बहस
लाइव परफॉर्मेंस में प्रामाणिकता का यह मुद्दा तब गरमाया जब कुछ समय पूर्व दलेर मेहंदी के एक मंच प्रदर्शन की तीखी आलोचना हुई थी। एक मंत्री समेत कई लोगों ने एक बड़े सांस्कृतिक आयोजन में उनके तौर-तरीकों पर भारी असंतोष जताया था। आरोप लगाया गया था कि वे मंच पर गायन के दौरान ऊर्जावान नहीं दिख रहे थे और केवल रिकॉर्डेड ट्रैक पर होंठ हिला रहे थे। इस वाकये को लेकर विवाद काफी बढ़ गया था और मंत्री सुबोध उनियाल ने भी इस मामले में माफी मांगने से साफ मना कर दिया था। दूसरी ओर, दलेर मेहंदी के छोटे भाई और मशहूर गायक मीका सिंह ने अपने भाई का पक्ष लेते हुए स्पष्ट किया था कि वे उस दौरान अस्वस्थ चल रहे थे और उन पर बेबुनियाद उंगलियां उठाई जा रही हैं। इस तकरार ने कॉन्सर्ट संस्कृति में गायकों की ईमानदारी को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी।
तकनीकी मदद बनाम गायकी का दिखावा
वर्तमान दौर में जब कॉन्सर्ट्स के दौरान ऑटो-ट्यून और भारी साउंड प्रोसेसिंग का सहारा आम हो चुका है, पुराने दौर के कई गायक आज भी मौलिक गायकी को सर्वोपरि मानते हैं। अभिजीत भट्टाचार्य का कहना है कि ध्वनि संतुलन के लिए तकनीकी साधनों का उपयोग करना समझ आता है, मगर अपनी मौलिक आवाज को पूरी तरह दबाकर मंच पर सिर्फ गाने का नाटक करना कला के प्रति नाइंसाफी है। उन्होंने अपने साथ मंच पर मौजूद साज बजाने वाले वादकों की हौसला-अफजाई की, उनकी पीठ थपथपाई और कहा कि संगीत की इस सच्ची परंपरा को हर हाल में जिंदा रखा जाना चाहिए। उनका स्पष्ट मानना था कि प्रशासन और आयोजकों को भी ऐसे तौर-तरीकों पर रोक लगानी चाहिए ताकि लाइव गायन के नाम पर दर्शकों के साथ छल न हो सके।



















