मुंबई की चकाचौंध में अपनी जगह बनाने का सपना देखने वाले हर कलाकार की राह आसान नहीं होती, लेकिन कुछ लोगों की दास्तान इतनी संघर्षपूर्ण होती है कि वह किसी भी आम इंसान को हौसला दे सकती है। छोटे पर्दे के सबसे लोकप्रिय चेहरों में गिने जाने वाले अभिनेता रवि दुबे आज मनोरंजन जगत में एक बहुत बड़ा नाम बन चुके हैं। वे अब भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स में शामिल 4000 करोड़ रुपये के भारी बजट में तैयार हो रही फिल्म 'रामायण' में अभिनय करते नजर आएंगे। आज करीब 150 करोड़ रुपये की अनुमानित कुल संपत्ति के मुकाम तक पहुंचने वाले रवि दुबे के जीवन में एक दौर ऐसा भी था जब वे दो वक्त के साधारण भोजन के लिए भी पूरी तरह अपने दोस्तों पर निर्भर रहते थे।
सपनों की नगरी में असफलता और गहरे अवसाद का सामना
रवि दुबे के सफर की शुरुआत साल 2001 में हुई थी, जब वे उच्च शिक्षा हासिल करने के इरादे से दिल्ली से मुंबई पहुंचे थे। उनके मन में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने का इरादा था, हालांकि उनके पिता उनके भीतर छिपी बड़ी महत्वाकांक्षाओं को पहले ही भांप चुके थे। इसी वजह से उनके पिता ने खुद मुंबई के एक कॉलेज का चयन किया ताकि रवि अपने बड़े सपनों को हकीकत में बदलने की दिशा में कदम बढ़ा सकें। उस वक्त रवि ने कभी खुलकर यह स्वीकार नहीं किया था कि वे एक पेशेवर अभिनेता बनना चाहते हैं, लेकिन उनके इरादे हमेशा से बहुत बड़े थे।
स्कूल के दिनों में अव्वल रहने वाले रवि जब इंजीनियरिंग कॉलेज पहुंचे, तो वहां का माहौल उनकी उम्मीदों से एकदम जुदा निकला। कॉलेज की पढ़ाई और तकनीकी विषयों से वे तालमेल नहीं बिठा पाए, जिसके कारण पहले सेमेस्टर के पांच विषयों में से चार में उन्हें असफलता हाथ लगी। यह सिलसिला यहीं नहीं थमा और दूसरे सेमेस्टर में भी उनकी स्थिति वैसी ही बनी रही। लगातार असफलताओं से टूटकर वे गुरुग्राम स्थित अपने घर लौट आए। परिवार की तरफ से पूरा सहयोग और प्यार मिलने के बावजूद वे भीतर से गंभीर मानसिक समस्याओं और आत्मग्लानि से घिरते चले गए।
निराशा के भंवर से निकलकर आध्यात्मिकता को बनाया ढाल
घर लौटने पर समाज और परिचितों के चुभते सवाल रवि के मन को गहरे तक आहत करने लगे थे। आसपास के लोग अक्सर उनसे पढ़ाई न करने और वापस लौटने के ताने कसते थे। उस उम्र में वे मानसिक तौर पर बेहद नाजुक थे और दूसरों की नकारात्मक टिप्पणियों का उन पर बहुत गहरा असर पड़ता था। हालात इस कदर बिगड़ गए कि रवि के मन में खुदकुशी करने तक का भयानक विचार आ गया था। बाद में इस दौर को याद करते हुए उन्होंने कहा था कि वे उस कोशिश में भी असफल रहे, जो उनके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य साबित हुआ।
उस कठिन दौर में उनके मन में यह निराशा इसलिए नहीं थी कि वे कॉलेज में फेल हो गए थे, बल्कि उन्हें लगने लगा था कि आगे बढ़ने के सारे दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं। उनका मस्तिष्क लगातार भारी उलझनों में उलझा रहता था और वे खुद को एक भटके हुए इंसान की तरह महसूस करते थे। धीरे-धीरे समय बीता और आध्यात्मिकता उनके जीवन का सबसे मजबूत संबल बनकर उभरी। उन्होंने महसूस किया कि वक्त के थपेड़ों ने उन्हें भीतर से मजबूत बना दिया है और इंसान अपने दृढ़ निश्चय से खुद को किसी भी चुनौती के सामने अजेय बना सकता है।
10,000 रुपये का पहला विज्ञापन और खुद के दम पर जीने की जिद
इंजीनियरिंग की डिग्री किसी तरह पूरी करने के बाद रवि समझ चुके थे कि उनका भविष्य तकनीकी दुनिया में नहीं है। इसके बाद उन्होंने पत्रकारिता में एक डिप्लोमा भी किया, लेकिन उससे भी करियर को कोई ठोस दिशा नहीं मिली। आखिरकार उन्होंने अपने कॉलेज के तीसरे साल के दौरान विज्ञापन फिल्मों के ऑडिशन देना शुरू कर दिया था। सालों तक चले लंबे इंतजार और दर्जनों रिजेक्शंस के बाद उन्हें पहला बड़ा अवसर मिला।
साल 2005 में शूजित सरकार के निर्देशन में एक बाइक के विज्ञापन में रवि को काम करने का मौका मिला, जिसके लिए उन्हें पारिश्रमिक के तौर पर 10,000 रुपये मिले। यह वही साल था जब शूजित सरकार की पहली फीचर फिल्म 'यहां' भी पर्दे पर आई थी। इस पहली कमाई ने रवि के सोचने का नजरिया पूरी तरह बदल दिया। उन्हें इस बात का गहरा अहसास था कि उनके माता-पिता ने उनकी शिक्षा पर अपनी गाढ़ी कमाई खर्च की है। इसलिए उन्होंने फैसला कर लिया कि वे अब कभी अपने परिवार से वित्तीय मदद नहीं मांगेंगे।
फाके के दिन और दोस्तों का बेमिसाल सहारा
पहला विज्ञापन करने के बावजूद रवि के पास आय का कोई नियमित स्रोत नहीं था। मुंबई जैसे महंगे शहर में बिना किसी तय आमदनी के गुजारा करना बेहद कठिन था। कई बार नौबत यहां तक आ जाती थी कि उनके पास दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए भी पैसे नहीं बचते थे। इसके बावजूद उन्होंने अपने माता-पिता को कभी अपनी वास्तविक तकलीफों का अहसास नहीं होने दिया और न ही कभी उनसे पैसे मांगे।
इस बेहद नाजुक और चुनौतीपूर्ण दौर में उनके दोस्तों ने उनका हाथ थामा। जब भी उनके पास भोजन की व्यवस्था नहीं होती थी, तो उनके करीबी दोस्त खुद उनके लिए खाना लेकर आते थे। दोस्तों को इस बात का भान था कि रवि अकेले संघर्ष कर रहे हैं और उनके इस निस्वार्थ सहयोग ने रवि को उस कठिन समय में टूटने से बचाए रखा। इस मानवीय सहारे ने उनके भीतर संघर्ष करने की नई ताकत फूंक दी।
दिलीप कुमार के साथ काम करने का सपना हुआ पूरा
रवि के धैर्य और कड़े संघर्ष का फल आखिरकार साल 2006 में मिलना शुरू हुआ। उन्हें दूरदर्शन के शो 'स्त्री: यह तेरी कहानी' में मुख्य किरदार निभाने का सुनहरा मौका मिला। यह प्रोजेक्ट किसी भी नए अभिनेता के लिए सपने के सच होने जैसा था क्योंकि इसका निर्माण दिग्गज अदाकार दिलीप कुमार और सायरा बानो कर रहे थे।
इस धारावाहिक की शूटिंग खुद दिलीप कुमार के बंगले पर हुई थी, जहां रवि को भारतीय सिनेमा के इस महान फनकार के साथ काफी वक्त बिताने और उनसे अभिनय की बारीकियां सीखने का सौभाग्य मिला। इस अनुभव ने रवि के आत्मविश्वास को आसमान पर पहुंचा दिया। उन्होंने हमेशा माना कि जीवन की हर विषम परिस्थिति में इंसान को सकारात्मक बने रहना चाहिए और खुद पर अटूट भरोसा रखना चाहिए।
टेलीविजन के स्टारडम से फिल्म 'रामायण' के भव्य मंच तक
इसके बाद रवि ने छोटे पर्दे पर लगातार अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया। साल 2009 उनके व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ, जब धारावाहिक '12/24 करोल बाग' के सेट पर उनकी मुलाकात सरगुन मेहता से हुई। सरगुन के सकारात्मक दृष्टिकोण और जीवन में आगमन ने रवि की जिंदगी की पूरी दिशा ही बदल दी। रवि ने हमेशा अपनी खुशहाली और कामयाबी का श्रेय सरगुन के जीवन में आने को दिया है।
साल 2010 में आए धारावाहिक 'सास बिना ससुराल' ने रवि को घर-घर में लोकप्रिय बना दिया, जबकि साल 2014 के सुपरहिट शो 'जमाई राजा' ने उन्हें छोटे पर्दे का शीर्ष सितारा बना दिया। आज जब वे लगभग 150 करोड़ रुपये के कारोबारी और निजी साम्राज्य के मालिक हैं और 4000 करोड़ रुपये के बजट वाली भव्य फिल्म 'रामायण' में एक अहम किरदार निभाने जा रहे हैं, तो उनका यह सफर साबित करता है कि अटूट आत्मविश्वास और कड़े परिश्रम से भाग्य की लकीरें भी बदली जा सकती हैं।



















