जीवन में लिए गए कई वादे मुश्किल वक्त के साथ कमजोर पड़ने लगते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने संकल्प को ही जीवन का सबसे बड़ा ध्येय बना लेते हैं। राजस्थान के झुंझुनूं जिले से सामने आई यह दास्तान इंसान के आत्मसम्मान, पारिवारिक निष्ठा और पिता के प्रति अगाध आदर की मिसाल पेश करती है। महज तेईस बरस की कच्ची उम्र में जब एक नौजवान के सिर से पिता का साया उठा, तब सामने सुरक्षित भविष्य के सपने नहीं बल्कि करीब एक करोड़ रुपये की भारी-भरकम देनदारी खड़ी थी। ऐसे नाजुक मोड़ पर टूटने के बजाय उस बेटे ने अपने पिता की अंतिम विदाई के समय यह पक्का इरादा किया कि वह परिवार पर लगे इस कर्ज के एक-एक पैसे को अपने दम पर चुकाकर ही चैन की सांस लेगा।
इस भारी-भरकम संकल्प को जमीनी हकीकत में बदलने के लिए पूरे दो दशक यानी 20 साल का लंबा सफर तय करना पड़ा। इस दौरान वक्त के कई थपेड़े आए, आर्थिक मुश्किलें सामने खड़ी हुईं और धैर्य की कई कड़ी परीक्षाएं हुईं, मगर मधुसूदन खेतान अपने रास्ते से रत्ती भर भी नहीं डिगे। जब पिता के सिर पर मौजूद देनदारियों का पाई-पाई हिसाब चुकता हो गया, तो इस मुकाम को परिवार ने सामान्य जश्न की तरह नहीं देखा। इसे पिता की स्मृति को समर्पित सच्ची श्रद्धांजलि मानते हुए एक भव्य और अनूठे ऋणमुक्ति महोत्सव का रूप दिया गया, जिसमें समाज और परिवार के लोग इस ऐतिहासिक निष्ठा के साक्षी बने।
युवा उम्र में सिर पर आया भारी आर्थिक संकट
साल 2006 का दौर था जब मधुसूदन के पिता संतोष कुमार खेतान का अचानक देहांत हो गया। पिता के इस दुनिया से विदा होते ही परिवार के सामने करीब एक करोड़ रुपये की देनदारी का पहाड़ खड़ा हो गया। उस समय मधुसूदन की उम्र सिर्फ 23 साल थी। आम तौर पर इस उम्र में युवा अपने करियर और सपनों को संवारने में जुटे होते हैं, लेकिन मधुसूदन के सामने सबसे बड़ी प्राथमिकता पूरे परिवार को बिखरने से बचाना और पिता द्वारा छोड़े गए दायित्वों का निर्वहन करना बन गई थी।
शुरुआती दौर में संकट से उबरने के लिए परिवार ने पिता की संपत्ति बेची। संपत्ति बेचकर जुटाए गए धन से कुल 69 लेनदारों को उनकी बकाया राशि का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा अदा किया गया। उस विकट परिस्थिति और परिवार की दयनीय आर्थिक हालत को देखते हुए सभी 69 लेनदारों ने दरियादिली दिखाते हुए बाकी 90 प्रतिशत कर्ज को अपनी तरफ से पूरी तरह माफ कर दिया। कानूनी और व्यावहारिक तौर पर परिवार के लिए यह एक बहुत बड़ा सहारा और राहत की बात थी, लेकिन मधुसूदन के अंतर्मन में यह बात गहराई से बैठ गई थी कि पिता ने जिन लोगों से अपनी जरूरत के वक्त पैसे लिए थे, उनका पूरा धन वापस करना उनका व्यक्तिगत और नैतिक कर्तव्य है।
साधारण जीवनशैली अपनाई और संकल्प पर अडिग रहे
माफ किए जा चुके 90 फीसदी कर्ज को भी पूरी तरह लौटाने का फैसला लेना जितना आसान लगता है, उसे जमीन पर उतारना उतना ही मुश्किल था। मधुसूदन ने अपने पैरों पर खड़े होने के लिए कारोबारी दुनिया में कदम रखा। उन्होंने ठेकेदारी के क्षेत्र में काम शुरू किया, विभिन्न सरकारी टेंडर हासिल किए और लगातार परिश्रम करते हुए अपनी आर्थिक स्थिति को धीरे-धीरे मजबूत किया। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं को बेहद सीमित रखा, फिजूलखर्ची से पूरी तरह दूरी बनाई और अपनी हर कमाई का बड़ा हिस्सा इसी मकसद से संचित करते रहे कि पिता की बकाया रकम को वापस किया जा सके।
इस दो दशक लंबे चुनौतीपूर्ण सफर में उन्हें परिवार और धर्म का मजबूत संबल मिला। उनकी बड़ी बहन सुधा अग्रवाल ने हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया, वहीं मनसा माता मंदिर के पुजारी राजेंद्र पांडे ने उन्हें सही मार्गदर्शन दिया। समय बीतने के कारण कई लेनदार अपनी जगह बदल चुके थे, लेकिन मधुसूदन ने जान-पहचान वालों और रिश्तेदारों की सहायता से उन सभी 69 लेनदारों के पते एक-एक करके तलाशे। इसके बाद वे खुद हर लेनदार के दरवाजे तक पहुंचे और अपनी गाढ़ी कमाई से वह पूरी रकम लौटाई, जिसे लेनदार बरसों पहले डूबा हुआ मानकर माफ कर चुके थे। कई लेनदारों ने तो यह कहकर पैसे लेने से मना कर दिया कि वे कर्ज बहुत पहले छोड़ चुके हैं, लेकिन मधुसूदन के लिए यह सिर्फ पैसों का आदान-प्रदान नहीं था। यह उनके पिता से किया गया वादा और अपनी आत्मा पर लदे भार को उतारने का पवित्र प्रयास था।
संपत्ति के साथ पूर्वजों की देनदारियों का भी सम्मान
आयोजित किए गए ऋणमुक्ति महोत्सव में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (एडीजे) डॉ. महेंद्र के. सिंह सोलंकी भी शरीक हुए। उन्होंने मधुसूदन के इस अनुकरणीय कदम की खुलकर सराहना की और इसे वर्तमान समाज के लिए एक बड़ा संदेश बताया। उन्होंने कहा कि उत्तराधिकार के नियमों के तहत जब संतानों को पूर्वजों की पैतृक संपत्ति हासिल होती है, तो उन्हें अपने पूर्वजों की वास्तविक और प्रमाणित देनदारियों और दायित्वों की भी उतनी ही गंभीरता से सुध लेनी चाहिए।
अदालती अधिकारी ने इस बात पर जोर दिया कि सिर्फ पैतृक संपत्तियों का उपभोग करना ही संतान का धर्म नहीं है, बल्कि पारिवारिक जिम्मेदारियों और ऋणों को स्वीकार करना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने मधुसूदन के इस कदम को पारंपरिक भारतीय पारिवारिक संस्कारों और उच्च नैतिक मूल्यों का बेजोड़ उदाहरण बताया। उनके अनुसार, यह घटना आने वाली नई पीढ़ियों को अपने माता-पिता और कुल के प्रति निष्ठावान रहने और अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करने के लिए प्रेरित करेगी।
बहनों का स्नेह और आंसुओं में झलका त्याग
इस महोत्सव का सबसे मार्मिक और भावुक क्षण तब देखने को मिला जब मधुसूदन की बड़ी बहन मधु अग्रवाल ने अपने भाई के बीस वर्षों के संघर्ष की कहानी साझा की। उन्होंने भारी मन से कहा कि पिता के देहांत के बाद उनके छोटे भाई ने पूरे परिवार के लिए एक पिता की तरह छत्रछाया बनकर काम किया। विकट से विकट परिस्थितियों में भी उसने परिवार को कभी डगमगाने नहीं दिया और हर मोड़ पर एक मजबूत स्तंभ बनकर साथ निभाया।
अपने भाई के प्रति अगाध प्रेम व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि ईश्वर हर घर में ऐसा पुत्र और भाई दे। बहन के इन मार्मिक उद्गारों को सुनकर वहां मौजूद तमाम लोगों की आंखें नम हो गईं। इस ऐतिहासिक अवसर पर मधुसूदन की माता सुमित्रा देवी के साथ-साथ दोनों बहनों सुधा अग्रवाल और मधु अग्रवाल को भी मंच पर सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन सभी आत्मीय रिश्तों और त्याग की भावना के प्रति कृतज्ञता थी, जिन्होंने मधुसूदन के इस बीस साल लंबे संघर्ष में कभी उनका साथ नहीं छोड़ा।
कर्ज से मुक्ति के बाद समाजसेवा का संकल्प
पिता की पूरी देनदारी चुकाने के बाद खेतान परिवार ने इस अवसर को केवल अपनी मुक्ति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे समाज कल्याण और धार्मिक सेवा के कार्यों से भी जोड़ा। आयोजन के दौरान परिवार की ओर से गौसेवा के लिए एक लाख 50 हजार रुपये की राशि का चेक प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त, श्री चावोसदी दादी मंदिर सेवा के लिए भी एक लाख रुपये का चेक भेंट स्वरूप सौंपा गया।
मधुसूदन खेतान का यह सफरनामा महज एक करोड़ रुपये के लेन-देन को पूरा करने की कहानी नहीं है। यह उस मानवीय चेतना और चरित्र की कहानी है, जहां एक व्यक्ति अपनी सुख-सुविधाओं और निजी आराम से ऊपर अपने संस्कारों, परिवार की गरिमा और दिए गए वचन को प्राथमिकता देता है। बीस साल तक बिना रुके प्रयास करना, 69 लेनदारों को तलाशना और माफ हो चुकी रकम को भी आदर सहित वापस लौटाना इस बात का प्रमाण है कि ईमानदारी और वचनबद्धता आज भी समाज में सबसे ऊंची प्रेरणा हैं।

















