राजस्थान के अलवर जिले अंतर्गत गोविंदगढ़ क्षेत्र में इस बार का प्रकाश पर्व एक खास सामाजिक और पर्यावरण हितैषी संदेश के साथ मनाया जा रहा है। त्योहारों पर घरों को रोशन करने की पुरानी परिपाटी को आगे बढ़ाते हुए यहां एक अनोखी पहल शुरू की गई है, जिसका सीधा सरोकार गोवंश के प्रति आदर और प्रकृति की रक्षा से है। स्थानीय सेवल मंदिर की अगुवाई में इस पारंपरिक रीति को एक व्यापक जनआंदोलन में बदल दिया गया है, जिसका उजाला क्षेत्र के कुल 108 मंदिरों तक पहुंचने वाला है। इस पूरी योजना के तहत दीपावली की गोधूली बेला के दौरान एक साथ 51 हजार से ज्यादा गाय के गोबर से निर्मित दीयों को जलाने का तय लक्ष्य बनाया गया है।
डेढ़ लाख दीयों का निर्माण और परिवारों को निःशुल्क वितरण
बीते वर्ष मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया और कामयाबी को आधार बनाकर इस सत्र में मंदिर परिसर में बड़े स्तर पर काम चल रहा है। यहां डेढ़ लाख से अधिक खास दीपक तैयार किए जा रहे हैं, जिसके चलते इलाके के बाशिंदों में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। इन दीयों को आमजन तक पहुंचाने के लिए एक विशेष व्यवस्था बनाई गई है। सेवल मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले हर परिवार को श्रद्धा और सेवा भाव के साथ 21 दीपक बिल्कुल मुफ्त दिए जा रहे हैं। इस कदम का मूल उद्देश्य यही है कि गोसंवर्धन और प्रकृति सुरक्षा का भाव हर घर के आंगन तक सहजता से पहुंच सके। यह व्यवस्था न केवल पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचाती है, बल्कि स्थानीय कारीगरी और प्राचीन परंपराओं को भी नया जीवन दे रही है।
शुद्ध प्राकृतिक तत्वों से तैयार हो रहे हैं इको-फ्रेंडली दीपक
मिट्टी के सामान्य दीयों के विकल्प के रूप में विकसित किए गए ये उत्पाद पूरी तरह से कुदरती और हानिरहित हैं। इन्हें बनाने की प्रक्रिया में केवल पर्यावरण के अनुकूल घटकों का चयन किया गया है। मुख्य सामग्री के तौर पर शुद्ध गाय का गोबर, लकड़ी का बारीक बुरादा और प्राकृतिक ग्वार गम का इस्तेमाल किया जा रहा है। रासायनिक रंगों या बनावटी तत्वों से मुक्त होने के कारण इनके जलने पर किसी तरह का प्रदूषण नहीं फैलता। निर्माण के इस तरीके से यह सुनिश्चित किया गया है कि त्योहार की जगमगाहट के बीच हवा और प्रकृति को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे।
दीपावली के बाद गमलों में खाद का काम करेंगे ये दीये
इस पूरे आयोजन के व्यापक उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए सेवल मंदिर से संबद्ध जमना जीवन कृष्ण दास जी ने स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि यह उपक्रम केवल दीप प्रज्वलन की रस्म भर नहीं है, बल्कि यह गोमाता के प्रति अटूट आस्था, भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्धन और पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने का एक मजबूत संकल्प है। इस नवाचार की सबसे अहम खूबी यह है कि उत्सव बीत जाने के बाद ये दीये कचरा बनकर नहीं फेंक दिए जाएंगे। उपयोग के उपरांत इन्हें सीधे पौधों के गमलों या बगीचों की मिट्टी में मिलाया जा सकता है, जहां ये बेहतरीन जैविक खाद के रूप में तब्दील हो जाएंगे। इस प्रकार ये दीपक घरों को प्रकाशमान करने के साथ-साथ धरती को उपजाऊ बनाने में भी मददगार साबित होंगे।
ग्रामीण और शहरी आबादी की सक्रिय भागीदारी
सेवल मंदिर द्वारा शुरू किए गए इस प्रेरक कार्य से समूचे गोविंदगढ़ अंचल में एक आध्यात्मिक और ऊर्जावान वातावरण तैयार हो चुका है। देहाती क्षेत्रों से लेकर नजदीकी कस्बों तक के नागरिक इस अभियान में अपनी स्वेच्छा से हाथ बंटा रहे हैं। स्थानीय लोगों के साथ-साथ प्रशासनिक हलकों का भी यह मानना है कि ऐसे सामूहिक प्रयासों से समाज में प्रकृति के प्रति दायित्व का अहसास गहरा होता है और लोग अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दोबारा जुड़ते हैं। अलवर का यह इलाका रोशनी के इस पावन पर्व को प्रकृति और गोवंश की समर्पित सेवा से जोड़कर एक अनुकरणीय मिसाल पेश कर रहा है।














