आध्यात्मिक विभूति बाबा नीम करौली के प्रेरक जीवन सफर को बड़े पर्दे पर उतारने वाली फीचर फिल्म 'हनुमान अंश' को लेकर दर्शकों के बीच खासा उत्साह देखा जा रहा है। इसी बीच देश की राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस सिनेमाई परियोजना से जुड़े कलाकारों तथा तकनीकी टीम के सदस्यों से खास भेंट की। इस शिष्टाचार बैठक के दौरान गृह मंत्री ने सिनेमा के माध्यम से भारतीय मूल्यों को सामने लाने के प्रयासों को सराहा और पूरी यूनिट को इस रचनात्मक कामयाबी के लिए शुभकामनाएं दीं। बातचीत में कलाकारों ने निर्माण प्रक्रिया और अपने निजी अनुभवों को भी साझा किया।
राष्ट्रीय स्तर पर मिले सम्मान और राजनीतिक हस्तियों की प्रतिक्रिया
गृह मंत्री के अतिरिक्त भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी फिल्म की निर्माण टीम के साथ विस्तृत चर्चा की। उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर इस मुलाकात की तस्वीरें साझा कीं, जिसमें फिल्म निर्देशक विशाल चतुर्वेदी तथा मुख्य नायक शोभिनव सत्या समेत तमाम साथी दिखाई दे रहे हैं। इस अवसर पर नितिन नवीन ने एक्स पर लिखा, 'भारतीय कल्चर और आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ी फिल्म के लिए पूरी टीम को शुभकामनाएं।' उन्होंने सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने वाले ऐसे सिनेमाई प्रयासों के महत्व को भी रेखांकित किया।
बॉक्स ऑफिस पर उलटफेर और कमाई का सफर
सिनेमाघरों में यह फिल्म 7 अगस्त 2026 को प्रदर्शित की गई थी। रिलीज के शुरुआती चरण में थियेटरों में दर्शकों की संख्या सीमित थी और कारोबार की गति काफी सुस्त बनी रही। पहले दिन टिकट खिड़की पर इसका खाता करीब 10 लाख रुपए के मामूली कलेक्शन से खुला था। इसके बाद शुरुआती दो हफ्तों के दौरान भी फिल्म का कुल कारोबार महज 1.48 करोड़ रुपए तक ही पहुंच सका था। हालांकि सोशल मीडिया पर सकारात्मक समीक्षाओं और दर्शकों की व्यक्तिगत प्रशंसा के दम पर माहौल पूरी तरह बदल गया। प्रदर्शन के 17वें दिन के बाद से टिकट बिक्री में अप्रत्याशित तेजी आई और इसके दैनिक संग्रह ने मजबूत उछाल दर्ज किया।
पटकथा का ताना-बाना और 1942 का दौर
विशाल चतुर्वेदी द्वारा लिखित और निर्देशित इस कथानक की रूपरेखा सीधे उपदेश देने के बजाय एक भावुक यादों के जरिए सामने आती है। कहानी की नींव भोसले नामक पात्र से रखी गई है, जिसे अभिनेता चंदन आनंद ने जीवंत किया है। यह पात्र अपने पौत्र को अपनी युवावस्था की दास्तान सुनाता है, जब वर्ष 1942 के स्वतंत्रता संग्राम के समय वह एक सक्रिय क्रांतिकारी हुआ करते थे। इसी संघर्षशील दौर में उनकी पहली भेंट नीम करौली बाबा से हुई थी। इस संवाद और संस्मरण के सहारे पूरी पटकथा दर्शक को इतिहास से जोड़ते हुए बाबा के बचपन और आत्मिक खोज के शुरुआती पड़ावों की ओर मोड़ देती है।
अकबरपुर से अध्यात्म तक लक्ष्मी नारायण का रूपांतरण
कथानक के केंद्र में 12 वर्ष का एक बालक लक्ष्मी नारायण है, जो अपनी मां के आकस्मिक निधन के पश्चात भीतर से असहनीय वेदना में डूब जाता है। मां को खोने का गम उसे इस गहरे विश्वास की ओर धकेलता है कि यदि वह ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति कर ले, तो शायद अपनी मां से पुनः मिल सकेगा। इसी विचार के साथ वह अकबरपुर गांव की अपनी चौखट छोड़कर एक अनिश्चित यात्रा पर निकल पड़ता है। बालक की यह खोज घने जंगलों, घाटों, नदियों और दूरदराज के अंचलों से होकर आगे बढ़ती है। धीरे-धीरे उसके मन में ईश्वर को पाने की परिभाषा बदलने लगती है और वह निराश्रितों को भोजन कराने, आमजन के कष्ट दूर करने, प्रेम बांटने तथा निःस्वार्थ लोकसेवा को ही अपने अस्तित्व का मुख्य ध्येय बना लेता है।
कलाकारों का प्रभावी अभिनय और चरित्र चित्रण
फिल्म में वयस्क जीवन की आध्यात्मिक गरिमा को मुख्य अभिनेता शोभिनव सत्या ने प्रभावी ढंग से साकार किया है। वहीं बचपन के संवेदनशील लक्ष्मी नारायण के रूप में बाल कलाकार विहान एस. हेगड़े ने अपनी सूक्ष्म अभिनय क्षमता से दर्शकों को प्रभावित किया है। बाबा की धर्मपत्नी की भूमिका को पूर्णिमा तिवारी ने सादगी के साथ पर्दे पर उतारा है, जबकि महंत के गंभीर और गरिमामय चरित्र में वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल रस्तोगी ने अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ी है। इन सभी कलाकारों के संतुलन ने पूरे आख्यान को प्रामाणिक और विश्वसनीय स्वरूप प्रदान किया है।



















