भारतीय सिनेमा के इतिहास में अपनी स्वाभाविक अदाकारी से हर किरदार को जीवंत बना देने वाले दिग्गज अभिनेता संजीव कुमार का जीवन जितनी कामयाबी और शोहरत से भरा रहा, उसके पीछे का संघर्ष और व्यक्तिगत दर्द भी उतना ही गहरा था। उद्योग जगत में प्यार से 'हरी भाई' पुकारे जाने वाले इस महान कलाकार को कई बार मितव्ययी या कंजूस कहकर आंका जाता रहा, लेकिन उनके निजी जीवन की परतें खोलने वाले संस्मरण कुछ और ही सच्चाई बयां करते हैं। फिल्म पत्रकार हनीफ जावेरी ने मेरी सहेली पॉडकास्ट पर अभिनेता के शुरुआती जीवन की तंगहाली, साथियों के प्रति उनकी बेमिसाल उदारता और शादी न करने के पीछे छिपे सबसे बड़े डर को साझा किया है।
मुफलिसी के वो शुरुआती दिन और दो जोड़ी कपड़ों का संघर्ष
संजीव कुमार जब फिल्म इंडस्ट्री में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे, उस वक्त उनका परिवार बेहद नाजुक आर्थिक दौर से गुजर रहा था। उनके पिता का व्यवसाय भारी नुकसान में जा चुका था और उनकी मां अकेले उस घाटे में डूबे काम को संभालने की जद्दोजहद में लगी थीं। घर के हालात इतने खराब थे कि संजीव के पास उस दौर में तन ढंकने के लिए सिर्फ दो जोड़ी कपड़े हुआ करते थे। परिवार को भुखमरी और कंगाली से बाहर निकालने के लिए संजीव ने हर उस काम को स्वीकार करने का मन बनाया जो उनके सामने आया।
उस दौर में काम हासिल करने और पेट पालने की मजबूरी इतनी बड़ी थी कि अभिनेता को जो भी रोल मिला, उन्होंने बिना नखरे किए उसे निभाया। हनीफ जावेरी बताते हैं कि उस समय संजीव कुमार को शायद यह समझने का भी मौका नहीं मिला कि वे जिन प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बन रहे थे, वे असल में C-ग्रेड श्रेणी की फिल्में थीं। उनके लिए उस मुश्किल वक्त में फिल्मों का स्तर तय करने से कहीं ज्यादा अहम अपने घर का चूल्हा जलाना और परिवार को दो वक्त की रोटी मुहैया कराना था।
कंजूसी का मिथक और 96 लाख रुपये की खामोश मदद
इंडस्ट्री में संजीव कुमार के बारे में यह धारणा काफी समय तक तैरती रही कि वे पैसों को लेकर जरूरत से ज्यादा सतर्क रहते थे और उन्हें कंजूस समझा जाता था। हालांकि, हकीकत इसके बिल्कुल उलट थी। हनीफ जावेरी के अनुसार, संजीव फिजूलखर्ची और दिखावे के सख्त खिलाफ थे, लेकिन जहां किसी करीबी को असल जरूरत होती थी, वहां वे अपना खजाना खोल देते थे। उन्होंने अपने दोस्तों और करीबियों को अलग-अलग मौकों पर लगभग 96 लाख रुपये की आर्थिक मदद उधार के तौर पर दी थी, और यह भारी-भरकम रकम उन्होंने कभी किसी से वापस नहीं मांगी।
उनकी दरियादिली का दायरा सिर्फ नामचीन दोस्तों तक सीमित नहीं था, बल्कि वे अपने स्टाफ का भी परिवार के सदस्य की तरह ख्याल रखते थे। संजीव ने अपने निजी ड्राइवर की शादी का पूरा खर्च अपनी जेब से उठाया था और एक साथी को कार तक भेंट की थी। इतना ही नहीं, जब उनकी वसीयत सामने आई, तो उसमें भी उन्होंने अपने ड्राइवर के बेटे की उच्च शिक्षा के लिए 2 लाख रुपये की सुरक्षित राशि तय कर रखी थी। जो इंसान दूसरों के भविष्य के लिए इस तरह चुपचाप प्रबंध करता हो, उसे कंजूस कहना सिर्फ एक नासमझी ही हो सकती है।
शत्रुघ्न सिन्हा और बोनी कपूर के साथ बिना कागजात का लेन-देन
फिल्म उद्योग में संजीव कुमार और शत्रुघ्न सिन्हा की दोस्ती काफी मजबूत मानी जाती थी। जब शत्रुघ्न सिन्हा को जिंदगी के एक मोड़ पर पैसों की सख्त दरकार हुई, तो संजीव कुमार ने बिना किसी औपचारिकता या सवाल के आगे बढ़कर उनकी सहायता की थी। उन्होंने अपने दोस्त को उस समय लगभग पांच से सात लाख रुपये दिए थे, और यह मदद उन्होंने शत्रुघ्न के मांगे बिना ही अपने मन से कर दी थी।
इसी तरह निर्माता बोनी कपूर को भी एक समय पर पैसों की भारी जरूरत पड़ी, तो संजीव कुमार उनके मददगार बने। संजीव ने बोनी कपूर को आवश्यक रकम सौंपी और इस पूरे लेन-देन का न तो कोई कानूनी कागज तैयार किया गया और न ही अभिनेता ने अपने घर-परिवार में किसी को इसकी भनक लगने दी। इस भरोसे का मान रखते हुए, संजीव कुमार के निधन के पश्चात बोनी कपूर ने पूरी रकम उनके परिवार को बाकायदा लौटा दी थी।
निजी जिंदगी, रिश्ते और शादी न करने की असली वजह
संजीव कुमार का नाम पर्दे पर 'शोले', 'आंधी', 'त्रिशूल', 'कोशिश' और 'मौसम' जैसी यादगार फिल्मों के लिए जितना सम्मान से लिया जाता है, उतनी ही चर्चा उनके निजी जीवन की भी रही। उनका नाम नूतन और हेमा मालिनी जैसी नामचीन अभिनेत्रियों के साथ जुड़ा, और बाद में सुलक्षणा पंडित भी उनसे गहरा प्रेम करने लगी थीं। हनीफ जावेरी के अनुसार, संजीव कुमार मन ही मन सुलक्षणा को बेहद पसंद करते थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उनसे विवाह करने से साफ इनकार कर दिया था।
इस फैसले के पीछे किसी भावनात्मक कड़वाहट की बजाय एक गहरा खौफ काम कर रहा था। संजीव कुमार के परिवार में एक दर्दनाक पारिवारिक इतिहास था, जिसके तहत उनके परिवार के पुरुषों की मृत्यु 50 वर्ष की आयु पार करने से पहले ही हो जाती थी। इस आनुवंशिक डर के साथ-साथ सुलक्षणा से मुलाकात के दौर तक संजीव खुद दो बार दिल के दौरे (हार्ट अटैक) का सामना कर चुके थे। उन्हें पक्का यकीन हो चला था कि वे ज्यादा दिन तक जिंदा नहीं रहेंगे और असमय दुनिया को अलविदा कह देंगे। संजीव नहीं चाहते थे कि किसी महिला से ब्याह रचाकर, अपनी आसन्न मौत के जरिए उसकी पूरी जिंदगी को आंसुओं और अकेलेपन के दुख में झोंक दें।
संजीव कुमार का यह अंदेशा अंततः सच साबित हुआ जब 6 नवंबर 1985 को महज 47 साल की उम्र में उन्होंने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। फिल्मों में अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले इस फनकार की जिंदगी में तालियों और कामयाबी के साथ-साथ एक अनकहा एकाकीपन और दूसरों के लिए धड़कने वाला विशाल दिल हमेशा मौजूद रहा।



















