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दृश्यम 3 रिव्यू (2026): सस्पेंस और कानूनी दांवपेच का जबरदस्त खेलमूवी रिव्यू
2 अक्तू॰ 2026, 8:43 am (15 दिन पहले)· 3

दृश्यम 3 रिव्यू (2026): सस्पेंस और कानूनी दांवपेच का जबरदस्त खेल

अभिषेक पाठक के निर्देशन में बनी 'दृश्यम 3' में विजय सालगांवकर और पुलिस प्रशासन के बीच कोर्टरूम व माइंड गेम्स की अंतिम जंग देखने को मिलती है। फिल्म में अजय देवगन और जयदीप अहलावत का आमना-सामना कहानी को बेहद रोमांचक बनाता है।

फिल्म उद्योग में रिलीज के खास महीने कई बार किसी कलाकार की सफलता का मजबूत जरिया बन जाते हैं। अजय देवगन के करियर में अक्टूबर का महीना हमेशा से बेहद भाग्यशाली माना गया है, जहां उनकी रिलीज हुई कृतियों ने टिकट खिड़की पर कमाई के नए प्रतिमान स्थापित किए हैं। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए पैनोरमा स्टूडियो और स्टार स्टूडियो 18 के निर्माण में तैयार 'दृश्यम 3' यानी 'दृश्यम: द कन्क्लूजन' बड़े पर्दे पर दस्तक दे चुकी है। इस बहुप्रतीक्षित सस्पेंस ड्रामा की समीक्षा में यह पड़ताल करते हैं कि क्या यह फ्रेंचाइजी अपने अंतिम पड़ाव पर दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतरती है।

अतीत के साये और कोर्टरूम की नई जंग

कहानी का ताना-बाना ठीक उसी मोड़ से आरंभ होता है जहां इसके दूसरे भाग का समापन हुआ था। सालगांवकर परिवार, जिसमें विजय, उसकी पत्नी नंदिनी और दो बेटियां अंजू और अनु शामिल हैं, अपने पुराने काले इतिहास से उबरकर एक सामान्य जीवन जीने की कोशिश में जुटे हैं। इस मामले को हमेशा के लिए कानूनी तौर पर खत्म कराने के उद्देश्य से वे अदालत में एक औपचारिक याचिका भी दाखिल करते हैं। लेकिन बीता हुआ कल उनका पीछा इतनी सरलता से नहीं छोड़ता।

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दूसरी तरफ, अपने बेटे की असामयिक मृत्यु के सदमे और पीड़ा में डूबे मीरा देशमुख और उनके पति महेश देशमुख इंसाफ हासिल करने के लिए पूरी ताकत झोंक देते हैं। अपने बेटे समीर देशमुख के लिए न्याय की इस लड़ाई में वे गोवा पुलिस के बेहद सख्त, चतुर और अडिग सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस राजीव सिंह तोमर को नए सिरे से छानबीन की जिम्मेदारी सौंपते हैं। तोमर की कार्यशैली का बुनियादी सिद्धांत यही है कि कानून की नजर में केवल पुख्ता सबूत ही सबसे बड़ा हथियार होते हैं। यहीं से जांच एजेंसियों और सालगांवकर परिवार के बीच एक खौफनाक मनोवैज्ञानिक और कानूनी शह-मात का खेल शुरू होता है। सड़कों से लेकर अदालत के कटघरे तक दोनों पक्षों के बीच तीखी रस्साकशी छिड़ती है, जहां तेज-तर्रार वकील समीर देशमुख के माता-पिता की तरफ से विजय के खिलाफ कानूनी मोर्चा संभालते हैं। इस बार विजय का सामना केवल खाकी वर्दी से नहीं, बल्कि कानून की बारीक धाराओं और तकनीकी पेचीदगियों से है। क्या विजय अपने परिवार को इस अंतिम कानूनी चक्रव्यूह से सुरक्षित बाहर निकाल सकेगा, यही पूरी कहानी की रीढ़ है।

अदाकारी की दुनिया: खामोशी और तीखे तेवरों का संगम

अभिनय के मोर्चे पर यह फिल्म अपनी छाप छोड़ने में पूरी तरह कामयाब रहती है। मुख्य भूमिका में अजय देवगन ने विजय सालगांवकर के किरदार को एक बार फिर जीवंत किया है। लगभग 2 घंटे 50 मिनट की कुल अवधि वाली इस फिल्म में उनके संवाद मुश्किल से 8 से 10 मिनट के दायरे में सिमटे हुए हैं। इसके बावजूद उनकी गहरी खामोशी किसी भी लंबे भाषण या चीख-पुकार से कहीं अधिक वजनदार साबित होती है। केवल अपनी आंखों के भाव, शांत चेहरे और सधी हुई शारीरिक भाषा के दम पर वे यह साबित करते हैं कि यह किरदार भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार किरदारों में क्यों गिना जाता है। उनके इस बाहरी ठहराव के भीतर एक बेहद शातिर, सतर्क और तेज दिमाग लगातार काम करता दिखता है।

वहीं दूसरी ओर, जयदीप अहलावत ने एसपी राजीव सिंह तोमर की भूमिका में एक सख्त, तार्किक और भय पैदा करने वाले पुलिस अधिकारी का किरदार गढ़ा है। स्क्रीन पर उनके प्रवेश करते ही माहौल में एक अजीब सा तनाव घुल जाता है। भले ही अजय देवगन और जयदीप अहलावत के आमने-सामने के दृश्य सीमित हैं, परंतु जब भी ये दोनों दिग्गज फ्रेम में साथ आते हैं, उस क्षण की ऊर्जा थ्रिलर को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा देती है।

तब्बू ने एक दुखी, आक्रोशित और बेबस मां की आंतरिक पीड़ा को बेहद संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। रजत कपूर, इशिता दत्ता और मृणाल जाधव ने अपने सीमित दृश्यों में भी सालगांवकर परिवार के आपसी जुड़ाव, भय और पारिवारिक एकजुटता को बखूबी प्रस्तुत किया है। अदालत में मुकदमे की पैरवी कर रहे प्रखर वकील की भूमिका में प्रकाश राज ने पूरी बहस में जान फूंक दी है। इसके साथ ही इंस्पेक्टर गायतोंडे के रूप में कमलेश सावंत का स्वाभाविक अभिनय कहानी के भारी तनाव के बीच दर्शकों को कुछ राहत भरे पल उपलब्ध कराता है।

निर्देशन और पटकथा का संतुलन

शुरुआती दोनों भागों की अपार सफलता के पश्चात तीसरे भाग का निर्देशन करना किसी भी फिल्मकार के लिए एक बड़ी चुनौती थी। निर्देशक अभिषेक पाठक ने इस जिम्मेदारी को बेहद संतुलित अंदाज में निभाया है। उन्होंने पटकथा लेखक अमील कियान खान और परवेज शेख के साथ मिलकर एक ऐसी कहानी तैयार की है जो मूल विचार की साख को बनाए रखती है। निर्देशक ने घटनाक्रम की रफ्तार पर इतना कड़ा नियंत्रण रखा है कि दर्शक एक पल के लिए भी स्क्रीन से ध्यान नहीं हटा पाते। हर दृश्य का निर्माण अत्यंत सावधानी और बारीकी से किया गया है। विजय की चुप्पी और राजीव तोमर के आक्रामक रुख के बीच का यह संतुलन निर्देशक की परिपक्वता को दर्शाता है। वे दर्शकों के मस्तिष्क के साथ लगातार खेल खेलते हैं और अंत तक रहस्य का पर्दा बनाए रखने में पूरी तरह सफल रहते हैं।

छायांकन और संगीत का तकनीकी प्रभाव

सिनेमा में अक्सर गोवा को उसके खूबसूरत समुद्र तटों और रंगीन नाइटलाइफ के लिए दिखाया जाता है, लेकिन यह श्रृंखला राज्य के एक बिल्कुल अलग, रहस्यमयी पहलू को सामने लाती है। इस थ्रिलर के माहौल को गढ़ने में कैमरावर्क की भूमिका अत्यंत अहम है। फिल्म के दृश्य काफी गहरे, गंभीर और यथार्थवादी रंग-रूप में फिल्माए गए हैं। सालगांवकर परिवार के घर के संकरे कोनों से लेकर थाने की दमघोंटू दीवारों तक, छायाकार ने हर फ्रेम को इस तरह कैद किया है कि दर्शक खुद उस भय और घुटन को महसूस कर सकते हैं। क्लोज-अप शॉट्स का उपयोग बेहद प्रभावशाली है, विशेषकर अजय देवगन की आंखों की क्लोज फ्रेमिंग और जयदीप अहलावत के चेहरे पर उभरता गुस्सा दृश्य को जीवंत बना देता है।

रवि बसरूर का पार्श्व संगीत इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बनकर उभरता है। जिस कहानी का मुख्य नायक अधिकांश समय चुप रहता हो, वहां संगीत को ही उसके अंतर्मन की बात कहनी होती है। रवि बसरूर ने इस चुनौती को बखूबी समझा है। उनका संगीत रहस्य और सस्पेंस को गहरा करता है, और जब भी कहानी में कोई अप्रत्याशित मोड़ आता है, पार्श्व संगीत रोमांच को चरम पर पहुंचा देता है। जहां शांति की आवश्यकता थी, वहां संगीत मौन रहता है और जहां ट्विस्ट आता है, वहां ध्वनि का संयोजन प्रभाव को दोगुना कर देता है।

कुछ कमजोर कड़ियां

किसी भी रचना में कुछ सीमाएं होती हैं और यह फिल्म भी उससे पूरी तरह अछूती नहीं है। फिल्म की कुल अवधि कुछ दर्शकों को थोड़ी अधिक लग सकती है। कहानी की पृष्ठभूमि तैयार करने और नए सिरे से घटनाओं को स्थापित करने में पहला भाग थोड़ा अधिक वक्त लेता है, जिससे आरंभिक रफ्तार धीमी जान पड़ती है। इसके अलावा तब्बू और रजत कपूर जैसे मंझे हुए कलाकारों को इस हिस्से में स्क्रीन पर अपेक्षाकृत कम समय दिया गया है। वहीं कानूनी प्रक्रियाओं और साक्ष्यों में हेरफेर से जुड़े कुछ दृश्यों में सिनेमैटिक छूट ली गई है, जो वास्तविक धरातल पर क्रियान्वित करना थोड़ा कठिन प्रतीत होता है।

सवाल-जवाब

क्या 'दृश्यम 3' देखने लायक फिल्म है?
यदि आप सस्पेंस, माइंड गेम्स और कोर्टरूम ड्रामा पसंद करते हैं, तो अजय देवगन और जयदीप अहलावत के शानदार अभिनय के लिए यह फिल्म जरूर देखने लायक है।
'दृश्यम 3' जैसी अन्य कौन सी फिल्में हैं?
यह फिल्म अपनी ही फ्रेंचाइजी के पिछले भागों 'दृश्यम' और 'दृश्यम 2' के समान गहन सस्पेंस और कानूनी दांवपेच पर आधारित है।
'दृश्यम 3' का निर्देशन किसने किया है?
इस फिल्म का निर्देशन अभिषेक पाठक ने किया है, जिन्होंने अमील कियान खान और परवेज शेख के साथ मिलकर इसकी पटकथा लिखी है।
फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में कौन-कौन से कलाकार हैं?
फिल्म में अजय देवगन, जयदीप अहलावत, तब्बू, रजत कपूर, इशिता दत्ता, मृणाल जाधव, प्रकाश राज और कमलेश सावंत प्रमुख भूमिकाओं में हैं।
'दृश्यम 3' का कुल रनटाइम कितना है?
फिल्म का रनटाइम लगभग 2 घंटे 50 मिनट यानी करीब 150 से 170 मिनट के आसपास है।
फिल्म में जयदीप अहलावत का क्या किरदार है?
जयदीप अहलावत ने गोवा पुलिस के सख्त और चतुर एसपी राजीव सिंह तोमर की भूमिका निभाई है, जो केवल सबूतों के आधार पर जांच करते हैं।
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टिप्पणियाँ 5

Vikram Yadav@vikram-yadav·14 दिन पहले

विजय सालगांवकर का चुप रहकर गेम खेलना और जयदीप अहलावत का आमने-सामने होना सच में गजब का रोमांच पैदा करता है। इस बार कोर्ट का चक्कर और सस्पेंस दोनों ही तगड़े लग रहे हैं, इंतज़ार खत्म हुआ।

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·14 दिन पहले

विजय सालगांवकर और कोर्टरूम की यह आखिरी टक्कर वाकई गज़ब की लग रही है। अजय देवगन की खामोश एक्टिंग और जयदीप अहलावत का आमना-सामना थिएटर में देखने का मज़ा ही अलग होगा।

Divya Reddy@divya-reddy·14 दिन पहले

स्नेह, तुम्हारी बात बिल्कुल सही है। पिछली बार जब मैं थिएटर में इसका दूसरा भाग देख रही थी, तो क्लाइमैक्स पर हॉल में सन्नाटा छा गया था।

Ananya Iyer@ananya-iyer·14 दिन पहले

अजय देवगन की खामोशी और कोर्टरूम ड्रामा का आइडिया अच्छा है, पर ढाई घंटे से ज्यादा की लंबाई में कहानी खींचना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। उम्मीद है बीच में बोरियत न हो।

Tanvi Desai@tanvi-desai·14 दिन पहले

अनन्या, मुझे नहीं लगता कि अजय की कम बोलती खामोशी बोर करेगी; कोर्टरूम में जयदीप के साथ उनकी टक्कर ही तो असली मज़ा है।

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