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सूरत से शोले तक: संजीव कुमार का अभिनय सफर, निजी जीवन में अधूरी रही प्रेम कहानीमनोरंजन
9 जुल॰ 2026, 5:22 am (21 दिन पहले)· 4

सूरत से शोले तक: संजीव कुमार का अभिनय सफर, निजी जीवन में अधूरी रही प्रेम कहानी

हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता संजीव कुमार की अनकही कहानी, जिन्होंने युवावस्था में ही बुजुर्ग पात्रों को जीवंत कर दिया और अपने अनूठे अभिनय से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई।

9 जुलाई 1938 को गुजरात के सूरत में जन्मे हरिहर जेठालाल जरीवाला, जिन्हें दुनिया संजीव कुमार के नाम से जानती है, भारतीय अभिनय जगत का एक गौरवशाली नाम हैं। उनके कलात्मक करियर की शुरुआत मुंबई के प्रसिद्ध नाट्य मंचों जैसे कि आईपीटीए और इंडियन नेशनल थिएटर से हुई थी, जहाँ उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं। उन्हें उनके करीबी दोस्त और प्रशंसक प्यार से हरिभाई भी बुलाते थे।

मंच पर उम्र से परे अभिनय

संजीव कुमार की प्रतिभा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केवल 22 वर्ष की उम्र में उन्होंने आर्थर मिलर के नाटक ऑल माई संस में एक बुजुर्ग पिता की चुनौतीपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनकी यही असाधारण क्षमता तब और निखर कर आई जब उन्होंने एके हंगल के निर्देशन में डमरू नाटक में 60 वर्षीय व्यक्ति का किरदार निभाया। फिल्मी दुनिया में कदम रखते समय उन्होंने अपने नाम को संजय कुमार से बदलकर संजीव कुमार करने का निर्णय लिया, ताकि उनकी पहचान उभरते हुए अभिनेता संजय खान से अलग बनी रहे। यह सलाह उन्हें निर्देशक एस्पी ईरानी ने दी थी।

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सहजता और पेशेवर नैतिकता

1960 की फिल्म हम हिंदुस्तानी से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत करने वाले संजीव कुमार ने अपनी सहज अभिनय शैली से उस दौर के स्थापित नायकों के बीच एक खास मुकाम हासिल किया। वे अपने गुरुओं के प्रति बेहद सम्मान रखते थे। फिल्म आंधी (1975) के सेट पर एक वाकया मशहूर है, जहां वे अपने वरिष्ठ कलाकार और गुरु एके हंगल को अपना कोट उठाने से रोकना चाहते थे। हालांकि एके हंगल ने उन्हें समझाया कि अभिनय की दुनिया में कैमरे के सामने वे केवल अपने किरदार के प्रति समर्पित हैं, न कि निजी जीवन के पदानुक्रम के प्रति।

विविधतापूर्ण किरदारों का जादू

संजीव कुमार ने भारतीय पर्दे पर ऐसे किरदारों को जीया जो आज भी मील का पत्थर माने जाते हैं। फिल्म नया दिन नयी रात (1974) में उन्होंने नौ अलग-अलग भावों को दर्शाते हुए नौ चरित्र निभाए, जो उनकी अद्भुत क्षमता का प्रमाण था। वहीं, शोले (1975) के ठाकुर बलदेव सिंह के रूप में उनका अभिनय भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर हो गया। उन्होंने मूक-बधिर किरदारों की पीड़ा को भी अपनी फिल्मों में गहराई से उतारा।

सम्मान और उपलब्धियां

उनके अभिनय को व्यापक स्तर पर सराहा गया। 1968 में फिल्म शिकार के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ। फिल्म खिलौना (1970) ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इसके अलावा, दस्तक (1971) और कोशिश (1973) के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) से सम्मानित किया गया। आंधी और अर्जुन पंडित के लिए भी उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। फिल्म अंगूर (1982) में उनकी दोहरी भूमिका को समीक्षकों ने कॉमेडी के क्षेत्र में उत्कृष्ट माना।

निजी जीवन का संघर्ष

संजीव कुमार का निजी जीवन एक अधूरी दास्तान की तरह रहा। फिल्म सीता और गीता (1972) की शूटिंग के दौरान एक ट्रॉली हादसे ने उन्हें हेमा मालिनी के करीब ला दिया। उनकी माता शांतशरण भी इस रिश्ते के लिए राजी थीं, लेकिन संजीव कुमार की यह शर्त कि शादी के बाद हेमा अभिनय छोड़ दें, परिवार को मंजूर नहीं हुई। बाद में सुलक्षणा पंडित ने उन्हें विवाह का प्रस्ताव दिया, लेकिन संजीव कुमार ने अपनी असामयिक मृत्यु के पूर्वाभास के कारण किसी का जीवन दांव पर न लगाने का निर्णय लिया।

विरासत और यादगार सम्मान

6 नवंबर 1985 को यह महान कलाकार हमसे विदा हो गया। उनकी स्मृति को सहेजने के लिए उनके गृहनगर सूरत में 108 करोड़ रुपए की लागत से संजीव कुमार ऑडिटोरियम बनाया गया है। वर्ष 2013 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक विशेष डाक टिकट भी जारी किया था, जो उनकी कला के प्रति राष्ट्र के सम्मान को दर्शाता है।

सवाल-जवाब

संजीव कुमार का असली नाम क्या था?
उनका जन्म का नाम हरिहर जेठालाल जरीवाला था।
उन्होंने अपना नाम संजीव कुमार क्यों रखा?
निर्देशक एस्पी ईरानी की सलाह पर उन्होंने अपना नाम बदल लिया ताकि उभरते हुए अभिनेता संजय खान से उनका नाम न टकराए।
संजीव कुमार को कौन सी फिल्मों के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला?
उन्हें दस्तक (1971) और कोशिश (1973) के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
संजीव कुमार का देहांत कब हुआ?
उनका निधन 6 नवंबर 1985 को हुआ था।
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