14 सितंबर 2026 से पावन गणेश उत्सव का शुभारंभ होने जा रहा है। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का प्राकट्य हुआ था। यही कारण है कि इस विशेष तिथि पर श्रद्धालु पूरे विधि-विधान और भक्ति भाव के साथ गणपति बाप्पा की प्रतिमा को अपने घरों में स्थापित करते हैं। पूरे भारतवर्ष में, विशेष रूप से महाराष्ट्र राज्य में, यह उत्सव पूरे 10 दिनों तक अत्यंत हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया जाता है। इस दौरान भक्त प्रतिदिन गौरी नंदन की विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं और उन्हें उनके अति प्रिय मोदक व अन्य पकवानों का भोग अर्पित करते हैं। 10 दिनों के इस आध्यात्मिक अनुष्ठान का समापन अनंत चतुर्दशी के दिन होता है, जब अश्रुपूर्ण नेत्रों और अगले वर्ष शीघ्र आने की प्रार्थना के साथ गणेश विसर्जन किया जाता है।
प्रतिमा स्थापना से मिलने वाले धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ
गृह स्थान में भगवान गणेश की पवित्र प्रतिमा को विराजमान करने से जीवन में बहुआयामी सकारात्मक बदलाव आते हैं। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, घर के पूजा स्थल या मुख्य कक्ष में गणपति जी की स्थापना करने से निवास स्थान में सुख, शांति और समृद्धि का स्थायी वास होता है। परिवार के सभी सदस्यों के मध्य आपसी प्रेम और खुशहाली का वातावरण निर्मित होता है। इसके साथ ही, प्रतिमा के दिव्य प्रभाव से घर में व्याप्त समस्त नकारात्मक ऊर्जाएं स्वतः ही नष्ट हो जाती हैं और संपूर्ण आभामंडल सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर हो जाता है। यदि आप भी इस वर्ष अपने घर में बप्पा का स्वागत करने की योजना बना रहे हैं, तो बाजार से प्रतिमा का चयन करते समय कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।
गणेश जी की मूर्ति खरीदते समय ध्यान रखने योग्य मुख्य बातें
बाजार में विभिन्न आकारों और शैलियों की मूर्तियां उपलब्ध होती हैं, किंतु शास्त्रीय नियमों के अनुसार प्रतिमा का सही चुनाव करना ही फलदायी होता है।
- सूंड की दिशा का सही चुनाव: मूर्ति लेते समय गणेश जी की सूंड की दिशा पर सबसे पहला ध्यान देना चाहिए। ज्योतिषशास्त्र और वास्तु सिद्धांतों के अनुसार, गृहस्थ जीवन के लिए बाएं हाथ की ओर मुड़ी हुई सूंड वाली प्रतिमा सबसे अधिक शुभ और फलदायी मानी जाती है। बाएं तरफ सूंड वाले गणपति जी की आराधना करने से जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त, यदि प्रतिमा में सूंड बिल्कुल सीधी हो, तो उसे भी बिना किसी संकोच के घर में स्थापित किया जा सकता है।
- मूषक और मोदक की उपस्थिति: बप्पा की मूर्ति चयन करते समय इस बात की पुष्टि अवश्य करें कि उसमें उनके साथ उनका वाहन मूषक (चूहा) अवश्य उपस्थित हो। इसके अलावा, भगवान गणेश के हाथ में उनका प्रिय मिष्ठान मोदक भी स्पष्ट रूप से बना होना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि मोदक और मूषक युक्त प्रतिमा घर लाने से व्यक्ति के करियर, व्यापार और आजीविका में अभूतपूर्व उन्नति और सफलता मिलती है।
- प्रतिमा का रंग और उसका प्रभाव: मूर्ति के रंग का भी विशेष आध्यात्मिक महत्व होता है। सिंदूरी या लाल रंग की गणेश प्रतिमा घर में स्थापित करने से व्यक्ति की व्यक्तिगत उन्नति और कार्यों में सफलता के मार्ग प्रशस्त होते हैं। वहीं दूसरी ओर, सफेद रंग की गणपति प्रतिमा अत्यंत शांतिप्रद मानी जाती है। सफेद मूर्ति स्थापित करने से मानसिक शांति, ज्ञान की प्राप्ति और आर्थिक समृद्धि का लाभ मिलता है।
- बैठी हुई मुद्रा का महत्व: घर के लिए हमेशा भगवान गणेश की बैठी हुई मुद्रा वाली मूर्ति ही खरीदनी चाहिए। शास्त्रों में बैठी हुई मुद्रा को ठहराव और स्थायी सुख-समृद्धि का सूचक माना गया है। खड़ी मुद्रा वाली मूर्ति की तुलना में बैठी हुई प्रतिमा घर में लक्ष्मी और रिद्धि-सिद्धि का स्थायी वास सुनिश्चित करती है।
कैसी गणेश प्रतिमा घर लाने से बचना चाहिए?
शास्त्रों में कुछ ऐसी मूर्तियों के चुनाव पर स्पष्ट रूप से मनाही की गई है, जिन्हें घर में स्थापित करना अशुभ माना जाता है।
- खंडित या टूटी हुई मूर्ति: किसी भी परिस्थिति में थोड़ी सी भी खंडित, चटकी हुई या टूटी हुई मूर्ति घर नहीं लानी चाहिए और न ही उसकी पूजा करनी चाहिए। ऐसी मूर्ति नकारात्मकता का कारण बनती है।
- दाएं तरफ मुड़ी सूंड वाली प्रतिमा: जिस मूर्ति में गणेश जी की सूंड दाएं हाथ की तरफ मुड़ी हुई हो, उसे घर में स्थापित करने से बचना चाहिए। ऐसी प्रतिमा को सिद्धपीठों या मंदिरों के लिए उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इनकी पूजा के नियम अत्यंत कठिन और कड़े होते हैं।
- फैंसी और आधुनिक आकृतियां: आजकल बाजार में अनेक प्रकार की आधुनिक और फैंसी डिजाइनों वाली मूर्तियां देखने को मिलती हैं। हालांकि, वास्तु के अनुसार ऐसी फैंसी आकृतियों के बजाय शास्त्रीय और पारंपरिक रूप वाली मूर्तियों का ही चुनाव करना चाहिए।
- सामग्री का सही चयन: प्लास्टिक, प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) या रसायनों से बनी मूर्तियों से परहेज करें। घर में हमेशा प्राकृतिक मिट्टी (इको-फ्रेंडली) से निर्मित प्रतिमा ही लानी चाहिए, जो पर्यावरण के अनुकूल हो और धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप शुद्ध मानी जाती हो।



















