12 लीटर दूध और एक कड़ाही से शुरू हुआ कारोबार, आज ग्रेटर नोएडा के कलाकंद की विदेशों में भी मांगखानपान
2 घंटे पहले· 2

12 लीटर दूध और एक कड़ाही से शुरू हुआ कारोबार, आज ग्रेटर नोएडा के कलाकंद की विदेशों में भी मांग

साल 2010 में किराए की छोटी दुकान और सिर्फ एक कड़ाही से शुरू हुई नवी कलाकंद अब 16 साल में ग्रेटर नोएडा की सबसे मशहूर मिठाई दुकान बन चुकी है, जहां का कलाकंद विदेशों तक पहुंचता है.

ग्रेटर नोएडा में मिठाई खरीदने निकलें तो लोगों की जुबान पर सबसे पहले एक ही नाम आता है, नवी कलाकंद. साल 2010 में एक किराए की छोटी दुकान और सिर्फ एक कड़ाही से शुरू हुआ यह सफर अब इतना बड़ा हो चुका है कि दिल्ली-एनसीआर के ग्राहक तो छोड़िए, विदेशों से आने वाले लोग भी यहां का कलाकंद चखने और साथ ले जाने के लिए खासतौर पर पहुंचते हैं.

एक कड़ाही और 12 लीटर दूध से हुई शुरुआत

दुकान चलाने वाले राहुल सिंह बिसोया बताते हैं कि नवी कलाकंद की नींव उनके पिता ने 2010 में रखी थी. उस वक्त दुकान किराए पर ली गई थी और रोज सिर्फ 12 लीटर दूध से मिठाइयां बनाई जाती थीं. ग्राहक भी गिने-चुने ही आते थे. लेकिन मिठाई की शुद्धता और स्वाद ने धीरे-धीरे लोगों का भरोसा जीतना शुरू किया. जैसे-जैसे वक्त बीता, ग्राहकों की तादाद बढ़ती गई और आज करीब 16 साल बाद यह दुकान ग्रेटर नोएडा की सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाली मिठाई दुकानों में गिनी जाती है. शुरुआती दिनों में सीमित संसाधनों के बावजूद परिवार ने मिठाई की गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं किया, और यही वजह रही कि दुकान की साख धीरे-धीरे मजबूत होती चली गई.

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किराए की दुकान से अपनी दुकान तक का सफर

राहुल बताते हैं कि हाल ही में उन्होंने अपनी पुरानी किराए की दुकान के ठीक सामने अपनी मालिकाना हक वाली नई दुकान खोली है. अब पूरा कारोबार इसी नई दुकान से चलता है. उनके मुताबिक यह बदलाव उनके परिवार की सालों की मेहनत और ग्राहकों के भरोसे का ही नतीजा है. किराए की दुकान से अपनी दुकान तक का यह सफर परिवार के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है.

कलाकंद की पहचान, त्योहारों में घेवर की मांग

दुकान की सबसे बड़ी पहचान वही मिठाई है जिसके नाम पर दुकान का नाम रखा गया है, कलाकंद. यही यहां की सबसे ज्यादा बिकने वाली मिठाई भी है. इसके अलावा सावन के महीने और रक्षाबंधन जैसे त्योहारों के दौरान यहां घेवर की भी खूब बिक्री होती है. ग्राहकों का कहना है कि यहां की मिठाइयों का स्वाद और गुणवत्ता उन्हें बार-बार खींच लाती है.

शुद्ध भैंस के दूध से बनती हैं मिठाइयां, चीनी भी कम

यहां की मिठाइयों में सिर्फ स्वाद ही नहीं, शुद्धता का भी खास ख्याल रखा जाता है. संचालकों का कहना है कि दूसरी दुकानों के मुकाबले यहां चीनी की मात्रा कम रखी जाती है और किसी भी तरह की मिलावट या कृत्रिम चीज नहीं मिलाई जाती. सारी मिठाइयां शुद्ध भैंस के दूध से बनती हैं. दिलचस्प बात यह है कि पिछले 10 सालों से एक ही दूधिया दुकान पर नियमित दूध पहुंचा रहा है, जिससे स्वाद और गुणवत्ता में कभी कोई फर्क नहीं आया. दुकान संचालकों के मुताबिक यही नियमितता ग्राहकों को भरोसा दिलाती है कि हर बार मिलने वाली मिठाई का स्वाद पहले जैसा ही रहेगा.

गैस की किल्लत ने लौटाया लकड़ी की आंच का जमाना

राहुल बताते हैं कि गैस सिलेंडर मिलने में दिक्कतें आने के बाद से ज्यादातर मिठाइयां अब लकड़ी की आंच पर तैयार की जा रही हैं. उनका मानना है कि धीमी आंच पर बनी मिठाइयों का स्वाद और भी निखर जाता है. फिलहाल दुकान पर रोजाना करीब 25 से 30 केन दूध खप जाता है, जो इस कारोबार के लगातार फैलते दायरे की तस्दीक करता है.

गूगल पर सर्च करके ऑर्डर, घर तक डिलीवरी

वक्त के साथ नवी कलाकंद ने ऑनलाइन तरीके भी अपना लिए हैं. दुकान की ऑनलाइन डिलीवरी सेवा चालू है और ग्राहक गूगल पर नवी कलाकंद सर्च करके सीधे संपर्क कर सकते हैं. दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग इलाकों से लोग फोन या ऑनलाइन माध्यम से ऑर्डर देते हैं, अपना पता और नंबर साझा करते हैं और उसके बाद मिठाई उनके घर तक पहुंचा दी जाती है. इस सुविधा ने दुकान को उन ग्राहकों तक भी पहुंचा दिया है, जो दूरी की वजह से पहले खुद दुकान तक नहीं आ पाते थे.

देश की सीमाओं से बाहर तक फैली शोहरत

दुकानदार के मुताबिक अब इस दुकान की पहचान देश की सीमाओं से भी आगे निकल चुकी है. विदेश से आने वाले कई लोग खासतौर पर यहां का कलाकंद खरीदने पहुंचते हैं, वहीं जो लोग विदेश जा रहे होते हैं, वे भी अपने साथ यहां की मिठाई ले जाना पसंद करते हैं. गूगल पर दुकान को लेकर देश-विदेश के ग्राहकों के सकारात्मक रिव्यू इस बढ़ती पहचान की गवाही देते हैं. करीब डेढ़ दशक पहले एक कड़ाही और 12 लीटर दूध से शुरू हुआ यह सफर आज ग्रेटर नोएडा की पहचान बन चुका है. शुद्ध दूध, कम चीनी, पारंपरिक स्वाद और ग्राहकों का भरोसा, इन्हीं चार बातों ने नवी कलाकंद को शहर की सबसे चर्चित मिठाई दुकानों में शामिल कर दिया है.

ग्राहकों की जुबानी

पिछले 10 से 15 सालों से यहां आ रहे कुलदीप नागर कहते हैं कि यहां की मिठाई बहुत मशहूर है और इसकी गुणवत्ता हमेशा एक जैसी रहती है. उनका कहना है कि शुद्ध दूध के इस्तेमाल से ही यहां की मिठाई का स्वाद अलग है, यही वजह है कि वे दूर-दूर से यहां मिठाई लेने आते हैं. एक और ग्राहक वैभव का कहना है कि यहां की मिठाई बहुत अच्छी है और वे लगभग रोज ही यहां आते रहते हैं. उनके मुताबिक यहां सिर्फ देश से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग मिठाई खरीदने और खाने आते हैं. ग्राहकों की मानें तो शुद्धता, पारंपरिक स्वाद और सालों से बनी साख ही नवी कलाकंद की सबसे बड़ी ताकत है, और यही वजह है कि यह दुकान ग्रेटर नोएडा और आसपास के इलाकों के साथ-साथ बाहर से आने वाले ग्राहकों के बीच भी उतनी ही लोकप्रिय बनी हुई है.

सवाल-जवाब

नवी कलाकंद की शुरुआत कब और कैसे हुई?
इसकी शुरुआत साल 2010 में राहुल सिंह बिसोया के पिता ने एक किराए की दुकान और सिर्फ एक कड़ाही से की थी, तब रोज केवल 12 लीटर दूध से मिठाई बनती थी.
दुकान की सबसे मशहूर मिठाई कौन सी है?
दुकान का नाम जिस मिठाई पर रखा गया है वही कलाकंद यहां की सबसे लोकप्रिय और सबसे ज्यादा बिकने वाली मिठाई है.
यहां की मिठाइयां किस चीज से बनाई जाती हैं?
सभी मिठाइयां शुद्ध भैंस के दूध से तैयार होती हैं, इनमें चीनी की मात्रा कम रखी जाती है और कोई मिलावट नहीं की जाती.
दुकान पर रोजाना कितना दूध खर्च होता है?
फिलहाल दुकान पर रोजाना करीब 25 से 30 केन दूध की खपत होती है.
क्या यहां से मिठाई ऑनलाइन ऑर्डर की जा सकती है?
हां, गूगल पर नवी कलाकंद सर्च करके ग्राहक सीधे संपर्क कर सकते हैं और दिल्ली-एनसीआर में घर बैठे डिलीवरी पा सकते हैं.
त्योहारों के मौसम में कौन सी मिठाई ज्यादा बिकती है?
सावन के महीने और रक्षाबंधन के दौरान यहां घेवर की बिक्री खासतौर पर बढ़ जाती है.
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