जैसे ही झारखंड में मानसून की पहली फुहारें गिरीं, जमशेदपुर के बाजारों में देसी मशरूम की रौनक लौट आई है। स्टेशन रोड, साकची और आसपास के इलाकों में सरायकेला, पटमदा, बोड़ाम, हालीपोखर, सिनी और हाता जैसे ग्रामीण इलाकों से जंगल में उगे मशरूम बेचने वाले पहुंचने लगे हैं। बारिश के इस मौसम में मिलने वाला यह मशरूम स्वाद और पोषण दोनों में इतना खास माना जाता है कि इसकी कुछ किस्में बाजार में 1000 रुपये प्रति किलो या उससे भी ज्यादा दाम पर बिक रही हैं।
जंगल से बाजार तक का सफर
ग्रामीण महिला प्रेमी मुर्मू के मुताबिक, बारिश शुरू होते ही गांव के लोग रोज सुबह चार बजे जंगल और खेतों की तरफ निकल पड़ते हैं। पेड़ों की जड़ों के आसपास, सड़ी हुई लकड़ियों पर, पुआल के ढेर में और नम जमीन पर उगे मशरूम को बड़ी सावधानी से चुना जाता है, क्योंकि इन्हें सही ढंग से पहचानना आसान काम नहीं है। इकट्ठा करने के बाद इन्हें अच्छी तरह साफ किया जाता है और टोकरियों व थैलों में भरकर जमशेदपुर के बाजारों तक लाया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया साल में सिर्फ कुछ ही दिन चलती है, क्योंकि देसी मशरूम का मौसम बहुत छोटा होता है। जंगल में प्राकृतिक रूप से उगने की वजह से इसे जंगली मशरूम भी कहा जाता है।
बाजार में मिल रहीं मशरूम की कई किस्में
फिलहाल बाजार में बटन मशरूम, पुआल मशरूम, बस करील, रुगड़ा जैसी कई देसी किस्में देखने को मिल रही हैं। इनमें रुगड़ा और बस करील को झारखंड की पारंपरिक खान-पान संस्कृति की पहचान माना जाता है। इनका स्वाद इतना अलग और खास होता है कि कई लोग इसे मांसाहारी खाने से भी ऊपर रखते हैं। गांवों में इन मशरूमों से सब्जी, झोल और भुजिया बनाने का चलन पुराना है और लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं।
मटन को टक्कर देता स्वाद
खरीदारों का कहना है कि देसी मशरूम की सब्जी का जायका आम बाजार में मिलने वाले मशरूम से बिल्कुल जुदा होता है। स्वाद के मामले में इसे शाकाहारी लोगों का मटन तक कहा जाता है। इसमें एक प्राकृतिक खुशबू और मिट्टी जैसी सौंधी महक होती है, जो पूरे भोजन का स्वाद कई गुना बढ़ा देती है। यही वजह है कि दाम ज्यादा होने के बावजूद लोग इसे खरीदने से पीछे नहीं हटते, बल्कि कई ग्राहक तो पहले से ही अपने जान-पहचान के ग्रामीणों को मशरूम लाने के लिए कह देते हैं।
सेहत का खजाना, लेकिन पहचान जरूरी
पोषण के लिहाज से देखें तो देसी मशरूम में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और कई तरह के खनिज तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं। हालांकि विशेषज्ञ यह भी आगाह करते हैं कि सिर्फ पहचाने हुए और सुरक्षित मशरूम ही खरीदे और खाए जाएं, क्योंकि जंगल में उगने वाले कुछ मशरूम जहरीले भी हो सकते हैं और गलत पहचान भारी पड़ सकती है।
ग्रामीणों के लिए कमाई का मौका
यह मौसम गांव के लोगों के लिए अतिरिक्त कमाई का एक अच्छा जरिया भी बन जाता है। साल में सिर्फ 10 से 15 दिन ही मिलने वाले इन मशरूमों को बेचकर कई परिवारों को ठीकठाक आमदनी हो जाती है। बरसात के इस छोटे से मौसम में जंगल की यह सौगात एक तरफ ग्रामीणों की जेब भरती है, तो दूसरी तरफ शहर के लोगों की थाली में देसी स्वाद का तड़का भी लगा देती है।











