बालोद से आती है यह खास खुशबू
छत्तीसगढ़ की रसोइयों में एक ऐसी डिश है जो पीढ़ियों से बनती आ रही है और आज भी उतनी ही चाव से खाई जाती है। यह है छत्तीसगढ़ी कढ़ी भजिया। गांव हो या शहर, गर्मी हो या ठंड, इस व्यंजन की मांग साल के हर मौसम में बनी रहती है। बालोद की टामिन बाई पटेल पिछले 20 वर्षों से इस पारंपरिक रेसिपी को अपनी रसोई में जीवित रखे हुए हैं।
माँ से मिली थी यह विरासत
TrendKia से बात करते हुए टामिन बाई ने बताया कि यह रेसिपी उन्होंने अपनी माताजी से सीखी थी और तब से लेकर अब तक वे इसे उसी पारंपरिक तरीके से बनाती आ रही हैं। घरेलू मसाले और पुराना ढंग ही इस डिश की असली पहचान है। पाचन के लिहाज से भी यह सब्जी हल्की मानी जाती है, इसीलिए गर्मी के महीनों में छत्तीसगढ़ में इसकी मांग खासतौर पर बढ़ जाती है।
पहले तैयार होती है बेसन की भजिया
इस डिश की शुरुआत होती है बेसन से तैयार भजिया से। बेसन में मसाले मिलाकर छोटी-छोटी भजिया तली जाती हैं और अलग रख दी जाती हैं। यही भजिया बाद में कढ़ी के साथ मिलकर पूरे व्यंजन को उसका अनोखा स्वाद देती है।
तड़के से शुरू होती है असली बात
कड़ाही में तेल गर्म करके उसमें जीरा, सरसों और मीठा नीम पत्ता डालकर तड़का लगाया जाता है। टामिन बाई कहती हैं कि यही तड़का इस सब्जी के स्वाद को खास बनाता है। तड़के के बाद पिसा हुआ टमाटर, लहसुन का पेस्ट, हल्दी, मिर्च पाउडर और धनिया पाउडर डालकर मसाले को अच्छी तरह भूना और पकाया जाता है।
दही और भजिया का लाजवाब मेल
जब मसाला पूरी तरह तैयार हो जाता है, तब उसमें दही मिलाया जाता है। इसके बाद पूरे मिश्रण को उबाल आने तक पकाया जाता है। उबाल आते ही पहले से तैयार भजिया इसमें डाल दी जाती है और करीब 10 मिनट तक धीमी आंच पर पकने दिया जाता है। बस इतना करते ही तैयार हो जाती है छत्तीसगढ़ की यह लाजवाब पारंपरिक डिश।
चावल के साथ है इसका सबसे बेहतरीन स्वाद
टामिन बाई बताती हैं कि यह व्यंजन रोटी के साथ भी खाया जा सकता है, लेकिन चावल के साथ इसका स्वाद कुछ और ही होता है। छत्तीसगढ़ में गर्मी के दिनों में लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं और इसकी मांग काफी बढ़ जाती है। यह व्यंजन आज भी प्रदेश की समृद्ध खानपान परंपरा को जिंदा रखने का काम कर रहा है।













