छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में स्थानीय खान-पान की अपनी एक अलग ही अनूठी पहचान है। यहां के पारंपरिक व्यंजनों में देसी मसालों के साथ इमली के पानी का प्रयोग करके एक बेहद स्वादिष्ट सब्जी बनाई जाती है। इस पारंपरिक व्यंजन में करेला, बरबटी और आलू का मुख्य रूप से इस्तेमाल किया जाता है, जो ग्रामीण इलाकों के घरों में बेहद चाव से खाई जाती है।
बस्तर की इस पारंपरिक सब्जी की खासियत
इस अनूठी रेसिपी को तैयार करने की प्रक्रिया बेहद सरल होती है। इसमें बहुत ज्यादा मसालों का इस्तेमाल करने से बचा जाता है ताकि सब्जियों का असली स्वाद बरकरार रहे। खास बात यह है कि इस देसी सब्जी को मिट्टी के बर्तन में पकाया जाता है, जिससे इसकी सौंधी खुशबू और स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। इमली के पानी का हल्का खट्टापन इस व्यंजन को बेहद खास बनाता है और खाने वाले का मन बार-बार इसे खाने का करता है।
आवश्यक सामग्री और सही मात्रा
इस लजीज व्यंजन को बनाने के लिए रसोई में मिलने वाली सामान्य सामग्रियों की जरूरत पड़ती है। इसके लिए 50 ग्राम करेला, 50 ग्राम बरबटी, 50 ग्राम आलू और 5 ग्राम इमली की आवश्यकता होती है। इसके अलावा मसाले और तड़के के लिए हल्दी पाउडर, लाल मिर्च पाउडर, स्वादानुसार नमक, एक कटी हुई प्याज और दो कटी हुई हरी मिर्च का उपयोग किया जाता है।
पारंपरिक तरीके से पकाने की विधि
इस देसी सब्जी को बनाने की शुरुआत मिट्टी के बर्तन में तेल गर्म करने से होती है। तेल गर्म होने पर उसमें कटी हुई प्याज और हरी मिर्च डाली जाती है और सुनहरा होने तक अच्छी तरह भूना जाता है। इसके बाद बर्तन में कटे हुए आलू, करेला और बरबटी डालकर कुछ देर तक पकाया जाता है। फिर इसमें हल्दी, लाल मिर्च पाउडर और स्वादानुसार नमक मिलाया जाता है।
इमली के पानी का सही इस्तेमाल
सब्जी को और अधिक स्वादिष्ट बनाने के लिए इसमें कटे हुए टमाटर डाले जाते हैं और अच्छी तरह पकाया जाता है। लगभग 10 मिनट तक पकाने के बाद इस मिश्रण में इमली का पानी मिलाया जाता है। इस चरण में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि इमली के पानी की मात्रा सीमित रहे ताकि खट्टापन संतुलित बना रहे। जब सभी सामग्रियां अच्छी तरह पक जाती हैं, तो इसे आंच से उतार लिया जाता है और गरमागरम रोटियों के साथ परोसा जाता है।



















