धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और व्रत-त्यौहारों में सुपरफूड मखाने को बेहद पवित्र मानकर देवी-देवताओं को भोग लगाया जाता है। आम तौर पर उपभोक्ता बाजार में मिलने वाले साफ और सफेद मखाने को ही देखते हैं, लेकिन तालाब से निकलकर बाजार की बोरियों तक पहुंचने की इसकी यात्रा बेहद कठिन और पारंपरिक श्रम पर आधारित होती है। बिहार राज्य के मधुबनी जिला अंतर्गत सप्ता गांव में इस पारंपरिक कृषि उत्पाद की प्रोसेसिंग बड़े पैमाने पर की जा रही है, जहां कारीगर अपनी पुश्तैनी तकनीकों के जरिए मखाने को तैयार करते हैं।
तालाब से धूप तक: मखाना बीज सुखाने की प्रक्रिया
सप्ता गांव में स्थानीय निवासी गनौर मुखिया के साथ लगभग एक दर्जन लोग मखाने के बीज, जिसे स्थानीय भाषा में गोरिया कहा जाता है, की लार लेने, चालने और फोड़ा-फोरी का काम संभालते हैं। तालाब के पानी से गोरिया निकाले जाने के बाद सबसे पहला और महत्वपूर्ण चरण इसे सुखाना होता है। बीजों को खुली धूप में पूरे 4 घंटे तक सुखाया जाता है। इस सुखाने की अवधि के दौरान कारीगरों को बहुत सतर्क रहना पड़ता है।
इन 4 घंटों के भीतर बीजों को समान रूप से सुखाने के लिए कम से कम 8 से 9 बार उलट-पलट कर धूप में फैलाया जाता है, जिसे स्थानीय स्तर पर लार देना कहा जाता है। बीजों को धीरे-धीरे और नियंत्रित तापमान में सुखाया जाता है ताकि उनकी गुणवत्ता प्रभावित न हो। इस बीच कारीगरों को बार-बार बीच में यह जांचना पड़ता है कि गोरिया पूरी तरह से सूखा है या नहीं।
दांतों से चबाकर नमी जांचने का अनूठा तरीका
मखाने की शुद्धता और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सुखाने की प्रक्रिया के दौरान एक अनोखी जांच पद्धति अपनाई जाती है। इस काम में लगे मलाह समाज के कारीगर सुखाए जा रहे गोरिया को अपने दांतों से चबाकर या फोड़कर देखते हैं। यह एक बेहद सटीक पारंपरिक परीक्षण माना जाता है।
यदि दांत से दबाने पर बीज का अंदरूनी हिस्सा सफेद दिखाई देता है, तो इसका स्पष्ट अर्थ होता है कि बीज में अभी नमी बाकी है और इसे धूप में और अधिक सुखाने की आवश्यकता है। वहीं दूसरी ओर, अगर दांत से फोड़ने पर बीज के अंदर का भाग पीला दिखाई पड़ता है, तो यह संकेत होता है कि गोरिया पूरी तरह सूख चुका है और आगे की प्रोसेसिंग के लिए तैयार है।
प्रोसेसिंग की लागत और मलाह समाज का रोजगार
गनौर मुखिया के अनुसार, गोरिया को सुखाने, छलनी से चालने से लेकर उसे भूनकर लाबा तैयार करने और अंत में बोरियों में पैक करने तक का पूरा काम सप्ता गांव में ही संपन्न होता है। इस पूरे काम के लिए कारीगरों को प्रत्येक मन यानी 40 किलो तैयार मखाने पर ₹6000 का भुगतान किया जाता है।
चाहे कारीगर इस 40 किलो मखाने की प्रोसेसिंग 1 दिन में पूरी करें या फिर 2 दिन का समय लें, उन्हें प्रति मन ₹6000 ही मिलते हैं। इस काम से मलाह समाज के लोग काफी संतुष्ट और खुश हैं, क्योंकि दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद जब वे अपने घर लौटते हैं तो उनके पास एक अच्छा मुनाफा और बेहतर कमाई होती है।



















