मानसून के दस्तक देते ही बाजारों और खेतों में हरी-भरी सब्जियों की बहार आ जाती है। इस मौसम में मध्य भारत के पारंपरिक खान-पान में हरी पत्तियों का प्रयोग काफी बढ़ जाता है। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के घरों में मूली भाजी और दाल की संयुक्त सब्जी बेहद लोकप्रिय मानी जाती है। कम मसालों और बेहद सरल विधि से तैयार होने वाला यह व्यंजन स्वाद में लाजवाब होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत पौष्टिक होता है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में इसे दोपहर या रात के भोजन के दौरान चावल और गरमा-गरम रोटी के साथ बड़े चाव से परोसा जाता है।
मूली भाजी की सफाई और कटाई का तरीका
स्वादिष्ट मूली भाजी और दाल बनाने के लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण शर्त भाजी की सही सफाई होती है। चूंकि पत्तियां खेतों और मिट्टी के सीधे संपर्क में रहती हैं, इसलिए उनमें धूल तथा बारीक मिट्टी के कण चिपके रह सकते हैं। खाना बनाने की शुरुआत में मूली भाजी को ध्यानपूर्वक छांटकर साफ किया जाता है। इसके बाद पत्तियों को साफ पानी से अच्छी तरह धोया जाता है। धोने के उपरांत भाजी को बारीक टुकड़ों में काटा जाता है। काटने के बाद भाजी को एक बार फिर से साफ पानी में धोया जाता है ताकि उसमें जरा सी भी मिट्टी या गंदगी का अंश न बचे। इस दोहरी सफाई प्रक्रिया से भाजी पूरी तरह से स्वच्छ और पकाने के लिए तैयार हो जाती है।
प्रेशर कुकर में भाजी और दाल को पकाना
भाजी की सफाई और कटाई पूरी होने के बाद अगला चरण इसे दाल के साथ पकाने का होता है। कटी हुई मूली भाजी और दाल को एक साथ प्रेशर कुकर में डाला जाता है। इसके बाद कुकर में आवश्यकता के अनुसार पानी और स्वाद के मुताबिक नमक मिलाया जाता है। कुकर का ढक्कन अच्छी तरह बंद करके इसे गैस पर पकने के लिए रख दिया जाता है। सामान्यतः 2 से 3 सीटी आने तक इसे पकाया जाता है ताकि दाल और भाजी दोनों अच्छी तरह से गल जाएं। सीटी आने के बाद कुकर को गैस से उतार लिया जाता है और उसकी भाप या सीटी को स्वतः ही शांत होने दिया जाता है। दबाव पूरी तरह खत्म होने पर ही कुकर का ढक्कन खोला जाता है।
देसी तड़के से स्वाद बढ़ाना
दाल और भाजी के उबल जाने के बाद इसमें पारंपरिक तड़का लगाया जाता है, जो इस सब्जी का मुख्य आकर्षण है। इसके लिए एक अलग कढ़ाई में तेल गर्म किया जाता है। तेल के अच्छी तरह गर्म हो जाने पर उसमें बारीक कटा लहसुन, साबुत जीरा और हरी या लाल मिर्च का तड़का लगाया जाता है। जब लहसुन और जीरा सुनहरा होकर अपनी खुशबू छोड़ने लगें, तब कुकर में पकी हुई मूली भाजी और दाल के मिश्रण को सावधानीपूर्वक कढ़ाई में डाल दिया जाता है। इस सामग्री को चम्मच से अच्छी तरह चलाते हुए धीमी आंच पर कुछ देर तक पकाया जाता है। इससे तड़के का स्वाद, लहसुन की सोंधी सुगंध और मिर्च का तीखापन पूरी भाजी और दाल में समान रूप से रच-बस जाता है। कुछ ही मिनटों में स्वादिष्ट मूली भाजी और दाल की देसी सब्जी तैयार हो जाती है।
खान-पान का महत्व और परोसने की परंपरा
छत्तीसगढ़ी पारंपरिक भोजन में विभिन्न प्रकार की हरी भाजी का विशेष स्थान रहा है। बरसात के दिनों में जब नमी के कारण पाचन तंत्र को सुपाच्य भोजन की आवश्यकता होती है, तब कम तेल और कम मसालों में बनी यह मूली भाजी और दाल उत्तम आहार साबित होती है। इस सब्जी में कृत्रिम मसालों का प्रयोग न के बराबर होता है, जिससे मूली के पत्तों और दाल का प्राकृतिक स्वाद बरकरार रहता है। छत्तीसगढ़ के पारंपरिक परिवारों में इसे चावल और रोटी दोनों के साथ खाया जाता है। बरसात के मौसम में हर घर की रसोई में दिखने वाली यह भाजी न केवल स्वाद का बेहतरीन अनुभव देती है बल्कि रोजमर्रा के भोजन को पौष्टिक और सुपाच्य भी बनाती है।



















