पुरानी दिल्ली की भीड़भाड़ और तंग गलियों के बीच जामा मस्जिद के पास एक ऐसा ठिकाना है जहां का स्वाद बीते सात दशकों से एक जैसा ही बना हुआ है। जहांगीरपुरी से लेकर दिल्ली के कोने-कोने से लोग इस छोटी-सी दुकान की तरफ खींचे चले आते हैं, जिसकी सबसे बड़ी वजह इसका बेजोड़ और पारंपरिक जायका है। इस फूड बिजनेस की नींव साल 1953 में नईमुद्दीन के दादा ने रखी थी और तब से लेकर आज तक न तो इसके मेन्यू में कोई बदलाव किया गया है और न ही इसकी रेसिपी बदली गई है। शुरुआत से लेकर अब तक यहां सिर्फ एक ही चीज परोसी जाती है और वह है हलीम, जिसे खाने के शौकीन आज भी बेहद चाव से खाते हैं।
विरासत और पहचान
करीम होटल के करीब स्थित इस अनूठे स्टॉल को स्थानीय लोग ‘नाइम भाई हलीम वाले’ और ‘बुंदू हलीम’ के नाम से पहचानते हैं। नईमुद्दीन के लिए यह महज आजीविका कमाने का साधन नहीं है, बल्कि उनके पुरखों से मिली एक अनमोल थाती है जिसे वे अपने परिवार की विरासत और आशीर्वाद मानते हैं। उनके दादा के दौर में इस लजीज व्यंजन की एक प्लेट की कीमत मात्र चार आने यानी लगभग 25 पैसे हुआ करती थी। हालांकि आज के समय में यहां एक प्लेट हलीम की कीमत 50 रुपये है, लेकिन दुकान की दरियादिली आज भी कायम है और कम पैसे लेकर आने वाले किसी भी जरूरतमंद को 10 रुपये तक में भी इसकी छोटी मात्रा दे दी जाती है।
धीमी आंच पर घंटों की तैयारी
इस लजीज पकवान को तैयार करने की प्रक्रिया बेहद लंबी और मेहनत मांगती है। नईमुद्दीन हर दिन सुबह 4 बजे से ही अपनी इस कला में जुट जाते हैं। लगभग 11 बजते-बजते हांडी में हलीम बनकर तैयार हो जाता है और कई बार तो दोपहर ढलने से पहले ही सारा बर्तन खाली हो जाता है। हर दिन करीब 25 से 30 किलो हलीम कोयले की हल्की आंच पर पकाया जाता है। मटन के खास हिस्सों के साथ इसमें गेहूं, दाल, हल्दी, मिर्च, नमक और चुनिंदा गरम मसालों का मेल होता है। इस पारंपरिक तरीके से खाना पकाने में बहुत वक्त लगता है, जिसके चलते मौजूदा दौर में ऐसे नुस्खों को अपनाने वाले लोग बहुत कम बचे हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
हलीम का यह सफर केवल एक साधारण दुकान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका इतिहास काफी पुराना माना जाता है। इसकी जड़ें ‘हरीस’ नाम के एक पकवान से जुड़ी बताई जाती हैं जो अरब देशों से सफर करते हुए दक्कन के इलाकों तक पहुंचा था। वक्त के पहिए के साथ इसमें दाल, घी और स्थानीय मसालों का समावेश होता चला गया, जिसके परिणामस्वरूप भारत के अलग-अलग हिस्सों में इसके विभिन्न क्षेत्रीय स्वाद विकसित हुए।
जीवन के मोड़ और दुकान की कमान
अपनी जिंदगी के शुरुआती दौर में नईमुद्दीन ने स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद सरकारी नौकरियों के लिए काफी मेहनत की थी। उन्होंने कुछ वक्त तक दिल्ली पुलिस के लिए ट्रेनिंग भी ली और सिविल डिफेंस सेंटर में अध्यापन का कार्य भी संभाला। लेकिन जब उनके पिता का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा तो उन्होंने बिना देर किए परिवार की इस पुरानी जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठा लिया। आज 51 साल की उम्र में भी वे खुद अपनी देखरेख में दुकान पर खड़े होकर हलीम बनाते हैं और ग्राहकों को परोसते हैं। हालांकि उनका कहना है कि वे इस काम को अपनी बेटियों को नहीं सौंपेंगे क्योंकि वे अपने करियर में आगे बढ़ रही हैं।
दिलों से जुड़ी पुरानी यादें
यहाँ आने वाले शौकीनों के लिए यह सिर्फ भोजन नहीं बल्कि पुरानी दिल्ली की तहजीब और यादों का एक जीवंत हिस्सा है। दशकों से इस गली के चक्कर काटने वाले पुराने लोग हों या दूरदराज से आने वाले नए ग्राहक, सभी के लिए इसका स्वाद बीते दिनों की याद दिला देता है। कई लोग ऐसे हैं जो अपने बचपन में अपने पिता के साथ यहां आते थे और आज भी उसी जायके की तलाश में वापस लौटते हैं। यही वजह है कि महानगर की बदलती तासीर और आधुनिक खान-पान के बीच यह छोटी-सी दुकान अपनी अनूठी पहचान को शान से बचाए हुए है।



















