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जयपुर की इन तंग गलियों से सजती हैं पूरे शहर की प्लेट, 100 साल और तीन पीढ़ियों से चल रहा पानी-पतासी का यह अनोखा कारोबारखानपान
9 जुल॰ 2026, 3:18 pm (20 दिन पहले)· 4

जयपुर की इन तंग गलियों से सजती हैं पूरे शहर की प्लेट, 100 साल और तीन पीढ़ियों से चल रहा पानी-पतासी का यह अनोखा कारोबार

जयपुर के ऐतिहासिक चारदीवारी बाजार के भीतर स्थित नटनियों का रास्ता सूखी पतासी का एक विशाल थोक बाजार बन चुका है, जहां पीढ़ियों से चल रहा यह पारिवारिक व्यवसाय आज हजारों लोगों की आजीविका का सहारा है।

जयपुर का ऐतिहासिक चारदीवारी बाजार अपनी शानदार वास्तुकला, भव्य बाजारों और जीवंत सांस्कृतिक विरासत के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। लेकिन इस दृश्य सुंदरता के अलावा, इन ऐतिहासिक गलियों में स्वाद का एक समृद्ध संसार भी बसता है। पुराने शहर की संकरी और घुमावदार गलियों में काम करने वाले हुनरमंद हलवाई और कारीगर केवल व्यंजन ही तैयार नहीं करते, बल्कि वे ऐसे पारंपरिक जायके बनाते हैं जो समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध स्थान चौड़ा रास्ता में स्थित नटनियों का रास्ता है। यह विशेष गली पूरे राजस्थान में सूखी पानी-पतासी या गोलगप्पे के सबसे बड़े थोक बाजार के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है। वैसे तो जयपुर के लोग कई तरह के व्यंजनों के शौकीन हैं, लेकिन पानी-पतासी एक ऐसा सदाबहार और लोकप्रिय स्ट्रीट फूड है जिसका आनंद लोग चलते-फिरते हर समय लेना पसंद करते हैं।

100 साल पुराना इतिहास और तीन पीढ़ियों का सफर

नटनियों का रास्ता की चहल-पहल को करीब से देखने पर पता चलता है कि यहां गोलगप्पे का यह व्यापार केवल एक सामान्य व्यवसाय नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही एक मजबूत पारिवारिक विरासत है। इस कारोबार से जुड़े एक युवा उद्यमी, 23 वर्षीय युवराज सिंह बताते हैं कि उनके परिवार में पानी-पतासी बनाने का यह पारंपरिक काम लगभग 100 वर्षों से बिना रुके चल रहा है। इस काम की नींव उनके दादाजी राजपाल सिंह ने रखी थी, और आज युवराज सिंह खुद इस पैतृक व्यवसाय को आगे बढ़ाने वाली तीसरी पीढ़ी के रूप में सक्रिय हैं। इस गली में लगभग 10 से 12 ऐसी दुकानें हैं जहां कई परिवार दशकों से इस काम में लगे हुए हैं। यही कारण है कि नटनियों का रास्ता पूरे जयपुर शहर में सूखी पतासी की थोक आपूर्ति का सबसे बड़ा और विश्वसनीय केंद्र बन गया है।

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कारखानों में निर्माण और बाजारों में बिक्री का सफर

इस व्यापक कारोबार की दैनिक गतिविधियों के बारे में जानकारी देते हुए युवराज सिंह बताते हैं कि दुकानों पर सजी हुई सूखी पतासियां तो सिर्फ ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए होती हैं, लेकिन इनका वास्तविक और बड़े पैमाने पर निर्माण स्थानीय कारखानों में किया जाता है। कारखानों में पूरी तैयारी और सिकाई के बाद इन पतासियों को दुकानों पर लाया जाता है, जहां से इन्हें पूरे जयपुर और आसपास के क्षेत्रों में भेजा जाता है। ग्राहकों की विभिन्न प्राथमिकताओं को पूरा करने के लिए निर्माता कई तरह की पतासियां तैयार करते हैं। इनमें आटे, मैदा, दाल और सूजी से बनी पतासियां शामिल हैं, जिनकी स्थानीय बाजारों में भारी मांग रहती है। थोक व्यापार को आसान बनाने के लिए इन सूखी पतासियों को 100, 500 और 1000 पीस की व्यवस्थित पैकिंग में बेचा जाता है।

अलग-अलग राज्यों में एक ही स्वाद के अनेक नाम

दिलचस्प बात यह है कि इस पसंदीदा स्ट्रीट फूड को भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। उदाहरण के लिए, राजस्थान और हरियाणा में इसे आमतौर पर पानी पतासी कहा जाता है। उत्तर प्रदेश में लोग इसे पड़ाका या पानीपुरी के नाम से बुलाते हैं। असम में इस स्वादिष्ट स्नैक को फुस्का कहा जाता है, जबकि ओडिशा के लोग इसे प्यार से गुप-चुप कहते हैं। इसी तरह, बंगाल में इसे पुचका और छत्तीसगढ़ में फुचका के नाम से जाना जाता है। नाम भले ही क्षेत्रीय भाषा के अनुसार बदल जाते हों, लेकिन इस तीखे-चटपटे स्वाद का आनंद देश के हर हिस्से में एक समान ही रहता है।

हजारों लोगों को आजीविका देने वाली आर्थिक चेन

स्वाद और मनोरंजन से अलग, पानी-पतासी का यह कारोबार वास्तव में सैकड़ों परिवारों के लिए आजीविका का एक मुख्य जरिया है। जयपुर अपनी अनूठी स्ट्रीट फूड संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है, और लोग दिन के किसी भी समय पानी-पतासी खाना पसंद करते हैं क्योंकि यह हल्का और किफायती होता है। इस निरंतर मांग के कारण जयपुर में हजारों लोगों का रोजगार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस व्यापार से जुड़ा हुआ है। शहर के हर कोने, आवासीय कॉलोनियों और व्यावसायिक बाजारों में पानी-पतासी के ठेले आसानी से देखे जा सकते हैं। यह पूरा व्यापार एक सुनियोजित आर्थिक श्रृंखला की तरह काम करता है, जिसमें आटा मिलों के मालिक, थोक निर्माता, पैकेजिंग करने वाले मजदूर, परिवहन कर्मी और सड़क किनारे ठेला लगाने वाले छोटे विक्रेता शामिल हैं, जो इस साधारण दिखने वाले व्यवसाय के जरिए अपने परिवारों का भरण-पोषण कर रहे हैं।

सवाल-जवाब

जयपुर में सूखी पतासी का सबसे बड़ा थोक बाजार कहाँ स्थित है?
जयपुर के चौड़ा रास्ता में स्थित 'नटनियों का रास्ता' सूखी पतासी या गोलगप्पे का सबसे बड़ा थोक बाजार माना जाता है।
नटनियों का रास्ता में इस गोलगप्पे के व्यापार का इतिहास क्या है?
यहाँ पानी-पतासी बनाने का काम लगभग 100 वर्षों से चल रहा है। इसकी शुरुआत राजपाल सिंह ने की थी और अब उनकी तीसरी पीढ़ी इसे संभाल रही है।
यहाँ किस-किस प्रकार की पानी-पतासी बनाई जाती हैं?
यहाँ ग्राहकों की मांग के अनुसार आटा, मैदा, दाल और सूजी से बनी पतासियां तैयार की जाती हैं।
थोक बाजार में पतासी किस तरह की पैकिंग में बेची जाती हैं?
थोक खरीदारों की सुविधा के लिए सूखी पतासियों को 100, 500 और 1000 पीस की पैकिंग में बेचा जाता है।
पानी-पतासी को देश के अन्य हिस्सों में किन नामों से जाना जाता है?
इसे उत्तर प्रदेश में पड़ाका, असम में फुस्का, ओडिशा में गुप-चुप, बंगाल में पुचका और छत्तीसगढ़ में फुचका कहा जाता है।
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