मिथिलांचल की समृद्ध खानपान संस्कृति में अरिकंचन की सब्जी एक बेहद खास और लोकप्रिय व्यंजन है। इस मौसम में तैयार होने वाली यह सब्जी स्थानीय लोगों के दैनिक भोजन का प्रिय हिस्सा तो है ही, साथ ही मधुबनी और पूरे मिथिला क्षेत्र से बाहर रहने वाले प्रवासी भी इन पत्तों को देश और दुनिया के अलग-अलग कोनों तक ले जाना पसंद करते हैं। जो लोग मांसाहार से दूर रहते हैं, उनके बीच अरिकंचन को शाकाहारियों की मछली का दर्जा दिया जाता है। इस तुलना के पीछे सबसे बड़ी वजह इसे पकाने का अनूठा तरीका और मसालों का विशेष संयोजन है, जो पारंपरिक मछली की करी के समान तैयार किया जाता है। जिस प्रकार मछली को मसालों के साथ मैरीनेट करके तला जाता है, ठीक उसी तरह अरिकंचन के पत्तों को बेसन और नींबू के घोल के साथ तलकर व्यंजन का मुख्य आधार गढ़ा जाता है।
पत्तों की तैयारी और लोढ़ा बनाने की पारंपरिक कला
इस व्यंजन को शुद्ध देशी अंदाज में पकाने की शुरुआत पत्तों के सही रख-रखाव से होती है। सबसे पहले अरिकंचन के ताजे पत्तों को साफ पानी से अच्छी तरह धोया जाता है और उनकी नमी हटाने के लिए कुछ देर धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद बेसन, पिसी हुई हल्दी और स्वादानुसार नमक मिलाकर एक गाढ़ा पेस्ट तैयार किया जाता है। कई घरों में लोग अपनी पसंद और स्वाद के हिसाब से इस पेस्ट में अतिरिक्त पिसे मसाले भी शामिल करते हैं। सूखे पत्तों को एक समतल जगह पर फैलाकर उनके ऊपर तैयार बेसन के मिश्रण की एक समान परत लगाई जाती है। एक-एक करके पत्तों की परतें जमाई जाती हैं और उन पर मसाला लगाते हुए उन्हें बेहद सावधानी से लपेटा जाता है, जिससे एक टाइट रोल का रूप बन जाता है। मैथिली भाषा में पत्तों के इस रोल को लोढ़ा कहा जाता है।
धूप में सुखाने और हफ्तों तक सहेजने का हुनर
पत्तों का लोढ़ा तैयार हो जाने के बाद इसे पूरे एक दिन तेज धूप में सुखाया जाता है। धूप में सुखाने की यह प्रक्रिया इस व्यंजन के लंबे समय तक टिके रहने का राज है। अच्छी तरह सूख जाने पर यह लोढ़ा लगभग एक सप्ताह से दस दिनों तक बिल्कुल खराब नहीं होता। यही कारण है कि मिथिला के लोग इसे तैयार करके दूर-दराज के शहरों और विदेशों में रहने वाले अपने परिजनों के पास ले जाते हैं। जब भी सब्जी बनानी हो, इस सूखे लोढ़े को धारदार चाकू से छोटे-छोटे गोल टुकड़ों में काटा जाता है। इसके बाद इन टुकड़ों को गर्म तेल में सुनहरा और कुरकुरा होने तक डीप फ्राई किया जाता है। कई लोग तले हुए इन गोल टुकड़ों को नाश्ते के रूप में भी पसंद करते हैं, जबकि मुख्य व्यंजन के लिए इन्हें ग्रेवी में पकाया जाता है।
सरसों वाली तीखी ग्रेवी का निर्माण
अरिकंचन के तले हुए टुकड़ों के लिए ग्रेवी तैयार करने में मुख्य रूप से पीली सरसों, साबुत प्याज, ताजा लहसुन और हरी मिर्च का इस्तेमाल होता है। इन सभी सामग्रियों को सिलबट्टे या मिक्सी में पीसकर एक महीन पेस्ट बना लिया जाता है। इसके बाद कढ़ाई में सरसों का तेल गर्म करके उसमें साबुत जीरा, सूखी लाल मिर्च और तेज पत्ता का छौंक लगाया जाता है। जैसे ही छौंक चटकने लगता है, उसमें पिसे हुए मसालों का पेस्ट डाल दिया जाता है। इसके साथ ही हल्दी पाउडर, लाल मिर्च पाउडर, धनिया पाउडर, गरम मसाला और नमक मिलाकर धीमी आंच पर तेल छोड़ने तक भुना जाता है। मसाला भूनने की यह पूरी तकनीक बिल्कुल वही है जो मछली का झोर बनाते समय अपनाई जाती है। मसाला पूरी तरह पक जाने के बाद इसमें आवश्यकतानुसार पानी डालकर रसे को उबलने दिया जाता है।
कड़वाहट दूर करने में नींबू की भूमिका और परोसने का तरीका
जब ग्रेवी अच्छी तरह उबलकर गाढ़ी होने लगे, तब उसमें पहले से तले हुए गोल अरिकंचन के टुकड़े डाल दिए जाते हैं ताकि वे मसालों का स्वाद सोख सकें। इस पूरे व्यंजन में नींबू के रस का बहुत गहरा और निर्णायक महत्व है। अरिकंचन के पत्तों में प्राकृतिक तौर पर एक खास तरह का तीखापन या कड़वाहट होती है, जिसे खत्म करने के लिए नींबू का भारी मात्रा में उपयोग किया जाता है। नींबू का रस लोढ़ा बनाते समय पेस्ट में भी डाला जाता है, तलने की प्रक्रिया में भी उपयोग होता है और अंत में जब सब्जी पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है, तब कढ़ाई में प्रचुर मात्रा में ताजा नींबू का रस निचोड़ा जाता है। नींबू की यह खटास पत्ते के कसैलेपन को काटकर सब्जी को चटपटा और संतुलित स्वाद देती है। तैयार अरिकंचन की सब्जी को सादे उबले चावल के साथ सबसे ज्यादा चाव से खाया जाता है। जिन बड़े शहरों में अरिकंचन के पत्ते आसानी से उपलब्ध नहीं होते, वहां लोग अरबी के पत्तों के साथ भी इसी हूबहू तरीके और मसालों से यह व्यंजन तैयार करते हैं।



















