मिथिलांचल की पावन भूमि पर खान-पान केवल भूख मिटाने का जरिया नहीं, बल्कि गहरे आदर और संस्कृति का प्रतीक है। इस क्षेत्र में छप्पन प्रकार के पकवानों वाली खास थाली की प्रथा त्रेतायुग से जुड़ी मानी जाती है। धार्मिक आयोजनों से लेकर परिवार के दामाद के स्वागत तक, इस विस्तृत भोजन को तैयार करने का रिवाज आज के समय में भी पूरी आस्था से निभाया जा रहा है।
सीता स्वयंवर और बारात के स्वागत से जुड़ा ऐतिहासिक प्रसंग
इस अनूठी परंपरा की जड़ें मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु राम और माता सीता के विवाह समारोह से जुड़ी बताई जाती हैं। जब श्री राम विवाह के लिए मिथिला पधारे थे, तब राजा दशरथ, प्रभु राम और पूरी बारात के स्वागत में छप्पन प्रकार के विविध पकवान परोसे गए थे। मिथिलावासी प्रभु राम को अपना आदरणीय दामाद मानते हैं। इसी कारण क्षेत्र में जब भी कोई दामाद ससुराल पहुंचता है, तो उसका सत्कार श्री राम की तरह ही छप्पन व्यंजनों से सजाकर करने का चलन कायम है।
पारंपरिक थाली के खास क्षेत्रीय पकवान और मिष्ठान
मिथिला की इस विशेष थाली में क्षेत्र के कई पारंपरिक और दुर्लभ स्वाद शामिल रहते हैं। इसमें तली हुई पूड़ी, कई तरह के नमकीन, सादा व खास चावल और पकवान सजाए जाते हैं। इसके साथ ही तिलकोर का तरुआ और खमहाउर का तरुआ जैसे खास स्थानीय तले हुए व्यंजन मुख्य रूप से रखे जाते हैं। मिष्ठान के तौर पर मिथिलांचल का प्रसिद्ध मखाना खीर, पारंपरिक चावल वाला खीर और नारियल के लड्डू सजाए जाते हैं, जो थाली को संपूर्ण बनाते हैं।
विभिन्न धार्मिक अवसरों और विशेष अतिथियों के लिए तैयारी
यह भव्य भोजन केवल दामाद तक ही सीमित नहीं है, बल्कि घर आए विशिष्ट अतिथियों, कन्या पूजन और ईष्ट देवों के भोग के लिए भी बनाया जाता है। इसके अलावा एक मान्यता भगवान कृष्ण से भी जुड़ी है, जिन्हें छप्पन भोग अति प्रिय हैं। क्षेत्र के लोग दिवाली, कृष्ण जन्माष्टमी, काली पूजा, दुर्गा पूजा और बच्चों के जन्मदिन जैसे पावन मौकों पर भी 56 भोग तैयार कर स्वयं ग्रहण करते हैं और समाज में बांटते हैं।





















