मध्य प्रदेश के बुरहानपुर और पूरे निमाड़ इलाके के घरों में सादगी से भरा एक पारंपरिक मीठा व्यंजन आज भी अपनी खास जगह बनाए हुए है। गेहूं के मोटे पिसे आटे और शुद्ध देसी गुड़ के मेल से तैयार होने वाला यह पकवान गुलगुले के नाम से जाना जाता है। आधुनिक बाजार में तरह-तरह के नए मिष्ठान उपलब्ध होने के बावजूद ग्रामीण परिवेश और पारंपरिक परिवारों में इसका आकर्षण जरा भी कम नहीं हुआ है।
सामग्री और पकाने की सरल विधि
इस देहाती मिष्ठान को तैयार करने के लिए बहुत तामझाम की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसे बनाने में मुख्य रूप से मोटा गेहूं का आटा, गुड़ और तलने के लिए तेल का उपयोग होता है। पकवान बनाने की प्रक्रिया के बारे में फूलाबाई ने साझा किया कि गुड़ और आटे के संतुलित घोल से यह विशेष स्वाद हासिल होता है। सबसे पहले गुड़ को आटे के साथ अच्छी तरह फेंटकर गाढ़ा मिश्रण बना लिया जाता है। इसके पश्चात हाथों से मनचाहा आकार देकर इसे खौलते हुए तेल में मध्यम आंच पर सेका जाता है। अच्छी तरह पकने के बाद इसकी बाहरी परत हल्की कुरकुरी हो जाती है, जबकि भीतर से यह काफी स्पंजी और कोमल बना रहता है।
सफर और मेहमाननवाजी का खास हिस्सा
निमाड़ के सामाजिक जीवन में इस व्यंजन की मौजूदगी बेहद आम है। घरों में जब भी किसी खास अतिथि का आगमन होता है, तो गृहिणियां प्रेमपूर्वक इसे बनाकर परोसती हैं। बच्चे हों या बुजुर्ग, हर उम्र के लोग इसे चाव से खाते हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में इसे बड़े चावल जैसे पारंपरिक स्थानीय खान-पान के साथ मिलाकर खाने का भी रिवाज है।
सात दिनों तक बना रहता है सुरक्षित
इस व्यंजन की सबसे प्रमुख खूबी इसका लंबे वक्त तक खाने योग्य रहना है। सही ढंग से पकाने और सुरक्षित रखने पर यह करीब 7 दिन तक बिल्कुल खराब नहीं होता। लंबे सफर पर निकलने वाले मुसाफिर इसे अपने साथ नाश्ते के रूप में ले जाना बेहद मुफीद मानते हैं। सीमित संसाधनों और चंद बुनियादी चीजों से बनने वाला यह गुलगुला स्थानीय खान-पान की सादगी और सांस्कृतिक धरोहर का नायाब नमूना है।



















