दूध की धीमी आंच पर तैयार होने वाली पारंपरिक भारतीय मिठाइयों में मलाई की परतों से सजने वाली खुरचन का रुतबा हमेशा से खास रहा है। मध्य प्रदेश में रामपुरबघेलन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम नेमुआ वार्ड नंबर 5 के निवासी कमलेश पांडे पिछले 40 से भी अधिक वर्षों से इस मिठास को लोगों तक पहुंचा रहे हैं। वह अपने खानदान की तीसरी पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं, जो पूरी शिद्दत के साथ इस पुश्तैनी हुनर को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने यह पारंपरिक कला सीधे अपने माता-पिता के सान्निध्य में सीखी थी। अपनी शुरुआत के दिनों में उन्होंने एक पक्का ढाबा संचालित करके इस मिठाई की बिक्री शुरू की थी, लेकिन आगे चलकर सड़क किनारे अन्य साथी हलवाइयों की भांति टीन शेड की छोटी सी दुकान सजा ली। आज वे अपने ही गांव में सड़क किनारे स्थापित इस टीन शेड के प्रतिष्ठान से प्रतिदिन कम से कम 5 से 10 किलोग्राम खुरचन बहुत सहजता से बेच लेते हैं, जबकि विशेष ऑर्डर पर की जाने वाली आपूर्ति इससे पूरी तरह अलग रहती है।
आजादी से पहले का इतिहास और हाईवे पर सजा तीन किलोमीटर लंबा बाजार
इस अनूठे मिष्ठान्न का बाजार कोई नया नहीं, बल्कि 100 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है, जिसकी जड़ें देश को स्वाधीनता मिलने से पहले के दौर से जुड़ी हुई हैं। वर्तमान समय में नेशनल हाईवे के लगभग तीन किलोमीटर लंबे हिस्से में करीब 150 दुकानें पूरी भव्यता के साथ इस खुरचन बाजार को आबाद किए हुए हैं। यहां तैयार होने वाले स्वाद की ख्याति केवल स्थानीय सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि कमलेश पांडे के हाथों से बनी खुरचन की मांग संयुक्त राज्य अमेरिका तक पहुंचती है। यदि पूरे रामपुर क्षेत्र की बात करें, तो यहां निर्मित यह खास मिठाई भारत के कई अलग-अलग प्रांतों में भेजी जाती है और वैश्विक स्तर पर भी दुनिया के अनेक मुल्कों में मिठास घोल रही है।
कड़ाही में मलाई उतारने की पारंपरिक और सटीक विधि
इस लोकप्रिय मिष्ठान्न को तैयार करने की शैली जितनी सीधी और पारंपरिक है, उतनी ही इसमें धैर्य और हुनर की दरकार होती है। कारीगर सबसे पहले एक कतार में 6 बड़ी कड़ाहियों को भट्टी की मंद आंच पर चढ़ाते हैं। इसके बाद प्रत्येक कड़ाही के भीतर ठीक एक-एक पाव दूध डाला जाता है। दूध जैसे-जैसे आंच पकड़कर उबलने की स्थिति में आता है, उसकी ऊपरी सतह और कड़ाही की दीवारों पर गाढ़ी मलाई की सुनहरी परत जमना शुरू हो जाती है। हलवाई इस मलाईदार परत को कड़ाही के भीतरी किनारों पर चिपकाते चले जाते हैं। पर्याप्त मलाई जमा हो जाने पर खुरचनी नामक औजार से उसे खुरचकर सावधानी से अलग कर लिया जाता है और उसमें हल्की मिठास देने के लिए शक्कर मिलाई जाती है। यह पूरी प्रक्रिया लगातार बार-बार दोहराई जाती है, जिसमें खुरची हुई मलाई को एक के ऊपर एक तह बनाकर जमाया जाता है और साथ ही बीच में शक्कर का छिड़काव किया जाता है।
दो स्वरूपों में बिक्री और स्वाद के आधार पर तय भाव
बाजार में ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए यह खुरचन प्रमुख रूप से दो अलग-अलग रूपों में उपलब्ध कराई जाती है। पहला प्रकार रोल वाली खुरचन का है, जो 600 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिकती है। इसमें दूध की मलाई की सभी परतों को एक साथ सहेजकर गोल रोल के आकार में बांध दिया जाता है। वहीं दूसरा स्वरूप 400 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर मिलता है, जिसके निर्माण में मलाई की परतों को एक के ऊपर एक चौरस बिछाया जाता है और फिर चाकू की मदद से मिठाई के छोटे-छोटे चौकोर टुकड़ों में काट लिया जाता है।
सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी और फलता-फूलता स्थानीय डेयरी तंत्र
स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार की दृष्टि से यह पारंपरिक व्यापार आजीविका का एक मजबूत सहारा बन चुका है। नेशनल हाईवे पर स्थित प्रत्येक छोटी और मध्यम दुकान हर रोज कम से कम 5 किलोग्राम खुरचन आसानी से बेच लेती है, जिसके दम पर एक सामान्य दुकानदार भी महीने में करीब 60 हजार रुपये तक की आमदनी कमा लेता है। दूसरी तरफ, बाजार के कई बड़े कारोबारियों का वार्षिक लेन-देन करोड़ों रुपये के आंकड़े को भी पार कर चुका है। रामपुरबघेलन और इसके आसपास के ग्रामीण अंचलों के 150 से अधिक परिवार प्रत्यक्ष रूप से इस मिठाई के कारोबार में सक्रिय हैं। इसके साथ ही, पूरे अंचल के हजारों लोगों के लिए यह व्यापार आर्थिक उन्नति का साधन बना हुआ है, क्योंकि प्रतिदिन भारी मात्रा में दूध की खपत होने के कारण क्षेत्र का स्थानीय डेयरी कारोबार भी निरंतर नई ऊंचाइयों को छू रहा है।


















