बिहार के मिष्ठान्न प्रेमियों के बीच रसकदम का नाम आते ही मुंह में पानी आ जाता है, लेकिन जब बात समस्तीपुर के चमन लाल के रसकदम की होती है तो दीवानगी कुछ अलग ही स्तर पर पहुंच जाती है। लोगों के मन में हमेशा यह उत्सुकता बनी रहती है कि इस मिठाई में ऐसा क्या जादू है जो खाने वालों को बार-बार दुकान की ओर खींच लाता है। इसी रहस्य से पर्दा उठाने के लिए जब हकीकत टटोली गई तो दुकान पर काम करने वाले कारीगर संतोष कुमार राय ने इसकी खासियतों से पर्दा उठाया और बताया कि असली स्वाद के पीछे शुद्धता का सबसे बड़ा हाथ है।
दूध से लेकर खोवा और छेना बनाने की पूरी विधि
बाजार में मिलने वाली कई मिठाइयों के विपरीत यहां रेडीमेड खोवा या छेना बाहर से नहीं खरीदा जाता है। दुकान पर ही गाय और भैंस के दूध को आपस में मिलाकर शुद्ध खोवा तैयार किया जाता है और किसी भी तरह की मिलावट से पूरी तरह परहेज किया जाता है। कारीगर संतोष कुमार राय का मानना है कि बेहतरीन मिठाई वही है जिसके कच्चे माल में कोई मिलावट न हो और इसी परंपरा का पालन यहां शुरुआती दौर से ही किया जा रहा है।
रसकदम तैयार करने की प्रक्रिया बेहद दिलचस्प और पारंपरिक है। सबसे पहले एक बड़े बर्तन में दूध को उबाला जाता है और उसे लगातार आंच पर तब तक पकाया जाता है जब तक वह गाढ़ा होकर खोवा न बन जाए और उसमें एक खास लालिमा न आ जाए। इसके बाद इस तैयार खोवा में चीनी मिलाकर अच्छी तरह भुना जाता है और फिर इसे ठंडा होने के लिए कुछ देर छोड़ दिया जाता है। स्वाद को और अधिक बढ़ाने के लिए इसमें इलायची पाउडर भी मिलाया जाता है।
इस तरह तैयार होती है रसकदम की फाइनल शेप
खोवा तैयार होने के ठीक समांतर प्रक्रिया में दूसरे बर्तन में दूध को फाड़कर ताजा छेना बनाया जाता है। इस छेना को हाथों से अच्छी तरह मसलकर छोटी-छोटी गोलियों का आकार दिया जाता है। इसके बाद खोवा की एक परत हाथ में ली जाती है और उसके बिल्कुल बीच में छेना की गोली को सुरक्षित रखा जाता है। चारों तरफ से खोवा को अच्छी तरह लपेटकर इसे पूरी तरह गोल आकार दिया जाता है।
मिठाई को अंतिम रूप देते समय इसके बाहरी हिस्से पर पोस्ता दाना लगाया जाता है, जिसके बाद चमन लाल का यह स्पेशल रसकदम बनकर पूरी तरह तैयार हो जाता है। कारीगर का यह भी कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान खोवा और छेना का सही अनुपात बनाए रखना बहुत जरूरी होता है क्योंकि थोड़ी सी भी चूक मिठाई के स्वाद और बनावट दोनों को बिगाड़ सकती है।
प्रतिदिन दो क्विंटल दूध की खपत और कीमत
इस मशहूर रसकदम की मांग और लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे बनाने में प्रतिदिन दो क्विंटल से अधिक दूध की खपत होती है। इतनी भारी मात्रा में मिठाई बनने के बावजूद कई बार शाम ढलते-ढलते दुकान का पूरा स्टॉक खाली हो जाता है। कीमत की बात करें तो यह लजीज मिठाई लगभग 600 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से बेची जाती है, जबकि ग्राहक चाहें तो इसे 25 रुपये प्रति पीस के हिसाब से भी खरीद सकते हैं।
कारीगर बताते हैं कि इसकी शुद्धता और अनोखा स्वाद ही है जो ग्राहकों को दूर-दूर से खींचकर यहां लाता है। कई खरीदार तो ऐसे हैं जो नियमित रूप से इस दुकान पर आते हैं और बिना रसकदम खरीदे नहीं लौटते हैं, जिससे इस पुरानी दुकान की साख आज भी उतनी ही मजबूत बनी हुई है।



















