सर्दियों का मौसम दस्तक देते ही झारखंड के ग्रामीण और शहरी घरों में पारंपरिक व्यंजनों की खूशबू फैलने लगती है। इस ठंडे मौसम में खानपान की परंपराएं जीवित हो उठती हैं, और देवघर का देसी मोरब्बा इनमें एक अलग पहचान रखता है। यह किसी हलवाई की दुकान पर बिकने वाली आम मिठाई नहीं है, बल्कि घरेलू रसोई में आसानी से बनने वाला एक पारंपरिक व्यंजन है। इसे बनाने के लिए आपको बाजार से किसी महंगी सामग्री को लाने की जरूरत नहीं पड़ती है। रसोई में आसानी से मिलने वाले गेहूं का आटा, दही, गुड़ और थोड़ा सा घी ही इस लजीज व्यंजन को तैयार करने के लिए काफी है। इस पकवान की सबसे खास बात इसका अनोखा स्वाद है जो हल्का खट्टा और मीठा होता है, और एक बार चखने के बाद लंबे समय तक याद रहता है।
अचानक आने वाले मेहमानों के लिए बेहतरीन विकल्प
कई बार घरों में बिन बुलाए मेहमान आ जाते हैं और उस वक्त समझ पाना मुश्किल होता है कि उन्हें क्या नया और पारंपरिक परोसा जाए। ऐसी स्थिति में देवघर का यह मोरब्बा एक शानदार और झटपट तैयार होने वाला विकल्प साबित होता है। इसे बनाने की प्रक्रिया इतनी सरल है कि कम समय में ही एक बेहतरीन मेहमाननवाजी का इंतजाम हो जाता है। इसमें लगने वाली सामग्री बेहद आम है, लेकिन इसका स्वाद और पारंपरिक जुड़ाव मेहमानों को जरूर पसंद आता है। आधुनिक समय की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह पकवान पुरानी पारंपरिक खानपान शैली की याद ताजा कर देता है।
मोरब्बा तैयार करने की आसान चरण-दर-चरण विधि
इस स्वादिष्ट व्यंजन को बनाने की शुरुआत सबसे पहले एक साफ बर्तन में आवश्यकतानुसार आटा लेने से होती है। अब इस आटे में धीरे-धीरे दही मिलाया जाता है और इसका एक गाढ़ा घोल तैयार किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में इस बात का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि बैटर तैयार करते वक्त पानी का बिल्कुल भी इस्तेमाल न किया जाए। केवल दही की मदद से ही इस मिश्रण को गूंथा या तैयार किया जाना चाहिए। घोल न तो बहुत ज्यादा पतला होना चाहिए और न ही अत्यधिक गाढ़ा होना चाहिए। इसकी बनावट को ऐसा रखना होता है कि हाथों की सहायता से इसके छोटे-छोटे गोल आकार आसानी से बनाए जा सकें।
बैटर तैयार होने के बाद चूल्हे पर एक कड़ाही चढ़ाई जाती है और उसमें जरूरत के मुताबिक घी या तेल डाला जाता है। जब तेल अच्छी तरह गर्म हो जाता है, तब तैयार किए गए मिश्रण को हाथों से छोटे-छोटे लड्डू के आकार में ढालकर धीरे-धीरे कड़ाही में छोड़ा जाता है। इन्हें मध्यम आंच पर सुनहरा भूरा होने तक अच्छी तरह से तला जाता है ताकि वे अंदर तक पूरी तरह पक जाएं। जब ये गोले सिककर तैयार हो जाते हैं, तो इन्हें कड़ाही से बाहर निकालकर एक तरफ रख दिया जाता है।
इसके बाद एक अलग बर्तन या कड़ाही में गुड़ को लेकर गर्म किया जाता है। जब गुड़ पूरी तरह से पिघलकर चाशनी का रूप ले लेता है, तब उसमें पहले से तले हुए गोलों को मिला दिया जाता है। इस मिश्रण को कुछ मिनटों तक लगातार चलाते रहना पड़ता है ताकि गुड़ की चाशनी हर एक गोले पर अच्छी तरह से लिपट जाए। इसके बाद यह जायकेदार देसी मोरब्बा बनकर बिल्कुल तैयार हो जाता है। इसे कुछ देर के लिए ठंडा होने के लिए छोड़ दिया जाता है और फिर अपने परिवार के सदस्यों या मेहमानों को परोसा जाता है।
पारंपरिक रसोई की अनमोल विरासत
इस पारंपरिक व्यंजन का आकर्षण सिर्फ इसके अनोखे स्वाद तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसे बनाने की पूरी शैली भी अपने आप में अनोखी है। बेहद कम संसाधनों और सामग्री में तैयार होने वाला यह मोरब्बा हमें गांव-घर की पुरानी रसोइयों और पारंपरिक जीवनशैली की याद दिलाता है। इस पकवान को बनाकर दो से तीन दिनों तक सुरक्षित रखकर भी खाया जा सकता है, हालांकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपने इसे किस तरह के वातावरण में और कैसे संग्रहीत किया है। सर्दियों के दिनों में शाम की चाय के साथ या फिर घर आने वाले अतिथियों को कुछ अलग और पारंपरिक खिलाने के लिए देवघर का यह मोरब्बा एक बेहतरीन विकल्प बन जाता है। इस बार सर्दियों के मौसम में बाजार की कृत्रिम मिठाइयों से तौबा करके आटा, दही और गुड़ के मेल से बनने वाले इस पारंपरिक और देसी पकवान का लुत्फ जरूर उठाएं।


















