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दालचीनी नाम के पीछे का दिलचस्प इतिहास और असली-नकली की पहचान के तरीकेखानपान
24 अग॰ 2026, 3:56 pm (1 घंटे पहले)· 2

दालचीनी नाम के पीछे का दिलचस्प इतिहास और असली-नकली की पहचान के तरीके

दालचीनी का नाम कैसे पड़ा और इसमें न तो दाल होती है और न ही चीनी, जानिए इसके इतिहास, असली-नकली की पहचान और सेहत से जुड़े फायदों के बारे में।

दालचीनी एक बेहद गुणकारी मसाला है जिसका उपयोग भारतीय रसोई में स्वाद, सुगंध और औषधीय लाभ के लिए व्यापक रूप से किया जाता है। यह मूल रूप से एक सदाबहार पेड़ की छाल होती है जिसकी भीनी खुशबू और हल्की सी मिठास भोजन के स्वाद को कई गुना बढ़ा देती है। भोजन का स्वाद बढ़ाने के अलावा यह एक असरदार औषधि भी है और आयुर्वेद में इसे बहुत गुणकारी माना गया है। दिलचस्प बात यह है कि इस मसाले का न तो किसी दलहन परिवार से कोई संबंध है और न ही यह चीनी की तरह स्वाद में पूरी तरह मीठा होता है, फिर भी इसे दालचीनी कहा जाता है। यानी न तो इसमें दाल है और न ही चीनी, तो फिर इसके इस अनोखे नाम के पीछे की असल कहानी क्या है और यह नाम कैसे चलन में आया, इसके अलावा असली और नकली दालचीनी में क्या अंतर होता है और इसका पानी पीने से सेहत को क्या-क्या लाभ मिलते हैं, इन सभी बातों को विस्तार से समझना जरूरी है।

दालचीनी में न तो दाल है और न ही चीनी, फिर इसका नाम दालचीनी कैसे पड़ा, इस सवाल का जवाब इसके ऐतिहासिक नाम में छिपा है। दरअसल दालचीनी का यह नाम फारसी और अरबी शब्द दारचीनी से आया है जो समय के साथ ढलकर हिंदी में दालचीनी बन गया। पुरानी फारसी भाषा में दार शब्द का अर्थ पेड़ या लकड़ी होता है। चीनी शब्द का संबंध चीन से है क्योंकि यह मसाला सबसे इस रूट से होते हुए पश्चिमी देशों और भारत तक पहुंचा था। इस तरह से दारचीनी का मूल अर्थ चीन के पेड़ की लकड़ी या छाल था। आगे चलकर दारचीनी का उच्चारण बदलते-बदलते दालचीनी हो गया। वैसे भी हमारे देश में चीन से लाई गई कई चीजों के नाम के आगे चीनी शब्द जोड़ दिया जाता है। इस प्रकार पेड़ की छाल से मिलने और चीन से आने के कारण इसका नाम दालचीनी पड़ गया।

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एक और दिलचस्प ऐतिहासिक सच्चाई यह है कि दालचीनी की उत्पत्ति भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका यानी सीलोन से हुई थी। वहीं से यह मसाला दक्षिण भारत, दक्षिण अमेरिका और वेस्टइंडीज तक पहुंचा। इतिहास में एक दौर ऐसा भी था जब दालचीनी इतनी बेशकीमती हुआ करती थी कि इसके लिए बड़े युद्ध लड़े जाते थे। इसे राजाओं और देवताओं के लिए एक बहुमूल्य और कीमती उपहार भी माना जाता था। हालांकि भारत के प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों में इसका सीधा वर्णन नहीं मिलता है, लेकिन प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने इसे एक सामान्य और उपयोगी मसाला माना है। दालचीनी के गुण काफी हद तक काली मिर्च जैसे ही माने गए हैं और यह एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-वायरल तथा एंटी-फंगल गुणों से भरपूर होती है। इसकी छाल में सिनामाल्डिहाइड नाम का एक आवश्यक तेल पाया जाता है और इसी सिनामाल्डिहाइड के कारण दालचीनी में ये तमाम औषधीय गुण मौजूद होते हैं।

अब यह जानना बहुत जरूरी है कि बाजार में मिलने वाली असली और नकली दालचीनी की पहचान कैसे की जाए। इसके लिए चार बेहद आसान तरीके अपनाए जा सकते हैं जिनसे आप आसानी से परख सकते हैं कि दालचीनी असली है या नकली। सबसे पहले साबुत दालचीनी खरीदते समय उसके रंग पर गौर करें। सीलोन दालचीनी हल्के लाल-भूरे रंग की होती है, जबकि कैसिया दालचीनी का रंग अपेक्षाकृत काफी गहरा हो सकता है। इसके अलावा चिकनाई से भी इसकी असलियत का पता लगाया जा सकता है। असली दालचीनी की छाल ऊपर से काफी स्मूद यानी चिकनी होती है, जबकि अमरूद और कैसिया की छाल से तैयार की जाने वाली नकली दालचीनी ऊपर से खुरदरी होने के साथ-साथ अंदर से खोखली भी होती है।

असली दालचीनी को पास से सूंघने पर एक सोंधी और बेहतरीन खुशबू आती है, जबकि नकली दालचीनी में किसी प्रकार की खास सुगंध नहीं होती है। इसी तरह जब असली दालचीनी को चखा जाता है तो हल्की सी मिठास का अहसास होता है, लेकिन नकली दालचीनी का स्वाद फीका लगता है। असली दालचीनी पतली होती है और आसानी से टूट जाती है, वहीं नकली दालचीनी इतनी आसानी से नहीं टूटती। सीलोन दालचीनी की छाल कई बारीक और पतली परतों में लिपटी हुई साफ नजर आती है, जबकि कैसिया की छाल आमतौर पर काफी मोटी और सख्त होती है और उसमें ऐसी बारीक परतें दिखाई नहीं देती हैं। इसके अलावा, सीलोन दालचीनी के पैकेट पर उसका लेबल जरूर पढ़ना चाहिए जिस पर सीलोन दालचीनी या सिनामम वेरुम लिखा होना चाहिए।

दालचीनी में औषधीय गुणों का खजाना छिपा हुआ है जो शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाता है। यह विभिन्न प्रकार के बैक्टीरिया और फंगल संक्रमण से बचाव करने में बहुत सहायक होती है। दालचीनी के नियमित और संतुलित सेवन से ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है और इसके साथ ही यह शरीर में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को भी काबू में रखती है। दालचीनी दिल से जुड़ी बीमारियों के खतरे को कम करती है और इससे शरीर की इम्युनिटी मजबूत होती है जिससे रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। रोज सुबह खाली पेट दालचीनी के पानी का सेवन करने से डायबिटीज के रोगियों को काफी लाभ मिलता है। दालचीनी शरीर का मेटाबॉलिज्म बढ़ाती है जिससे वजन घटाने और वसा कम करने में मदद मिलती है। पेट से जुड़ी तमाम समस्याओं के लिए भी दालचीनी को एक अचूक उपाय माना गया है और पेट के रोगियों को सुबह खाली पेट हल्के गुनगुने पानी के साथ दालचीनी के पाउडर का सेवन करना चाहिए, हालांकि इसका सेवन हमेशा डॉक्टर की सलाह के बाद ही करना चाहिए।

सवाल-जवाब

दालचीनी नाम कैसे पड़ा?
दालचीनी नाम फारसी शब्द दारचीनी से आया है जिसका अर्थ चीन के पेड़ की लकड़ी होता है और समय के साथ यह बदलकर दालचीनी हो गया।
असली दालचीनी की पहचान कैसे करें?
असली सीलोन दालचीनी हल्के लाल-भूरे रंग की, ऊपर से चिकनी, पतली और कई परतों में लिपटी होती है तथा सूंघने पर सोंधी खुशबू देती है।
दालचीनी का पानी पीने से क्या फायदे मिलते हैं?
सुबह खाली पेट दालचीनी का पानी पीने से डायबिटीज रोगियों को लाभ मिलता है, मेटाबॉलिज्म बढ़ता है और वजन घटाने में मदद मिलती है।
क्या दालचीनी में दाल या चीनी होती है?
नहीं, इस मसाले में न तो किसी दलहन परिवार की दाल होती है और न ही यह चीनी की तरह मीठा होता है।
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