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बनासकांठा में दुग्ध क्रांति की नई इबारत: कभी सूखे से जूझने वाला इलाका कैसे बना समृद्धि की मिसालगुजरात
31 अक्तू॰ 2026, 9:25 am (1 घंटे पहले)· 0

बनासकांठा में दुग्ध क्रांति की नई इबारत: कभी सूखे से जूझने वाला इलाका कैसे बना समृद्धि की मिसाल

गुजरात के बनासकांठा में पशुपालक महिलाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया, जहां सहकारिता और आधुनिक तकनीकों के समन्वय से दूध उत्पादकों की मासिक आय 1400 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है।

गुजरात के सूखा प्रभावित सीमावर्ती जिले बनासकांठा ने पिछले ढाई दशकों के दौरान ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सशक्तिकरण का एक अनूठा मॉडल पेश किया है। भीलड़ी स्थित भारत बोवाइन ब्रीडिंग एंड रिसर्च सेंटर के लोकार्पण अवसर पर जुटी हजारों दुग्ध उत्पादक महिलाओं का उत्साह इस बदलाव की प्रत्यक्ष गवाही दे रहा था। हाथों में नारे लिखे पोस्टर थामे इन पशुपालकों का मानना है कि दूरदर्शी रणनीतियों और सहकारिता के तालमेल ने उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी है।

सहकारिता के जरिए आमदनी में ऐतिहासिक उछाल

शुरुआती साढ़े तीन दशकों में बनास डेयरी से संबद्ध पशुपालकों को हर महीने कुल मिलाकर लगभग 22.88 करोड़ रुपये का भुगतान होता था। इसके बाद जब नीतिगत प्राथमिकताओं में बुनियादी बदलाव आया, तो अगले 12 वर्षों के भीतर यह आंकड़ा बढ़कर 288 करोड़ रुपये प्रति माह पर पहुंच गया। निरंतर आधुनिकीकरण और संस्थागत समर्थन के चलते बीते 12 सालों में यह मासिक आय 1400 करोड़ रुपये के स्तर को छू चुकी है। अकेले पिछले वित्तीय वर्ष में ही डेयरी प्रबंधन ने अपने 3 लाख से अधिक पंजीकृत सदस्यों के बीच 2300 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि लाभ के रूप में वितरित की।

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सिंचाई में नवाचार और बागवानी की नई राह

भौगोलिक रूप से जलसंकट झेलने वाले इस क्षेत्र में आधुनिक कृषि पद्धतियों को तेजी से लागू कराया गया। ज्योतिग्राम योजना और वर्ष 2005 में शुरू हुए कृषि महोत्सव के माध्यम से किसानों को उन्नत तकनीकों से जोड़ा गया। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली को प्रोत्साहित करने का परिणाम यह रहा कि आज जिले के 80 प्रतिशत से ज्यादा काश्तकार ड्रिप अथवा स्प्रिंकलर प्रणालियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। पानी की एक-एक बूंद के सदुपयोग ने पारंपरिक फसलों की जगह अनार एवं ड्रैगन फ्रूट जैसे उच्च मूल्य वाले फलों की बंपर पैदावार संभव बना दी है।

टीकाकरण अभियान और रिकॉर्ड दुग्ध संकलन

शुरुआती दौर में ग्रामीण अंचलों के भीतर मवेशियों के टीकाकरण को लेकर तमाम हिचकिचाहट और भ्रांतियां मौजूद थीं। सहकारी समितियों के सघन नेटवर्क ने पशुपालकों के बीच जागरूकता फैलाई और नियमित प्रतिरक्षण अभियान संचालित किए। स्वस्थ मवेशियों की बदौलत जिले में दूध संकलन का स्तर तेजी से बढ़ा, जिसके परिणामस्वरूप बनास डेयरी वर्तमान में प्रतिदिन औसतन 90 लाख लीटर दूध एकत्रित कर रही है। सनादरा गांव में 50 लाख लीटर की दैनिक क्षमता वाला अत्याधुनिक ग्रीनफील्ड संयंत्र स्थापित होने के साथ ही यह सहकारी उपक्रम अब हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तक अपनी गतिविधियां बढ़ा चुका है।

मीठी क्रांति और ऊर्जा उत्पादन का केंद्र

परंपरागत पशुपालन के साथ किसानों की कमाई बढ़ाने के लिए वर्ष 2016 में शहद उत्पादन की शुरुआत इसी क्षेत्र से की गई। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग की सहभागिता से आरंभ हुआ यह मिशन आज देशव्यापी अभियान बन चुका है, जिससे हजारों किसान सालाना लाखों रुपये की अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं। इसके साथ ही कृषि अवशेषों और आलू की बर्बादी रोकने के लिए प्रसंस्कऱण इकाइयां लगाई गई हैं। पशुधन के अपशिष्ट को उपयोगी ईंधन में बदलने की पहल के तहत कंप्रेस्ड बायो गैस के 5 संयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं, जिनमें सुजुकी जैसी कॉर्पोरेट संस्था के साथ मिलकर स्वच्छ ईंधन का उत्पादन किया जा रहा है।

स्वदेशी नस्ल सुधार और आधुनिक प्रजनन तकनीक

भारत बोवाइन ब्रीडिंग एंड रिसर्च सेंटर की स्थापना से कांकरेज एवं गिर जैसी देशज गायों तथा भैंसों की आनुवंशिक क्षमता में अभूतपूर्व सुधार की नींव रखी गई है। तीन वर्ष के भीतर आकार लेने वाले इस केंद्र का लक्ष्य प्रतिवर्ष 25000 भ्रूण तैयार करना है। संस्थान में इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन, ओवम पिक-अप और भ्रूण प्रत्यारोपण जैसी अत्याधुनिक वैज्ञानिक विधियों का इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि मवेशियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा जलवायु अनुकूलन को बेहतर बनाया जा सके। स्थानीय स्तर पर प्रजनक समूहों का गठन होने से आम पशुपालक अब वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाले मवेशी तैयार कर रहे हैं।

संकट में ढाल और सामाजिक कल्याण के कार्य

सहकारी नेटवर्क केवल व्यापार तक सीमित न रहकर सामाजिक सुरक्षा का सशक्त माध्यम साबित हुआ है। पालनपुर में 100 करोड़ रुपये की लागत से 200 सीटों वाला मेडिकल कॉलेज और मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल तैयार किया गया, जिसके निर्माण के लिए सदस्यों ने वर्षों तक अपने दूध मूल्य से 2 पैसे प्रति लीटर का अंशदान दिया। कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान सदस्यों ने मात्र 4 दिनों के भीतर ऑक्सीजन प्लांट खड़ा करके जीवन रक्षा का मोर्चा संभाला था, जबकि पहली लहर के समय महिला पशुपालकों ने केवल 3 दिन में 7 करोड़ रुपये एकत्र कर पीएम केयर्स फंड में समर्पित किए थे। आर्थिक स्वावलंबन के इस दौर में कई महिला सदस्य सालाना 1 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का दूध बेचकर ग्रामीण समृद्धि की मिसाल कायम कर चुकी हैं।

सवाल-जवाब

बनासकांठा में दुग्ध उत्पादकों की मासिक आय में कितनी वृद्धि हुई है?
शुरुआती 35 वर्षों में बनास डेयरी से जुड़े पशुपालकों की मासिक आय 22.88 करोड़ रुपये थी, जो पिछले 12 वर्षों में बढ़कर 1400 करोड़ रुपये प्रति माह तक पहुंच चुकी है।
बनास डेयरी ने पिछले साल अपने सदस्यों को कितना मुनाफा बांटा?
बनास डेयरी ने पिछले वित्तीय वर्ष में अपने 3 लाख से अधिक सदस्यों के बीच 2300 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि लाभ के तौर पर बांटी।
भारत बोवाइन ब्रीडिंग एंड रिसर्च सेंटर का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस केंद्र का उद्देश्य गिर और कांकरेज जैसी स्वदेशी नस्लों की आनुवंशिक गुणवत्ता सुधारना तथा हर साल 25000 उन्नत भ्रूण तैयार करना है।
बनासकांठा में सूखे से निपटने के लिए किस सिंचाई तकनीक का प्रयोग हो रहा है?
जिले के 80 प्रतिशत से अधिक किसान ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर प्रणाली का इस्तेमाल कर अनार और ड्रैगन फ्रूट की भरपूर पैदावार कर रहे हैं।
जिले में बायो सीएनजी उत्पादन के लिए किसके साथ साझेदारी की गई है?
बनास डेयरी ने सुजुकी कंपनी के साथ मिलकर कंप्रेस्ड बायो गैस के संयंत्र लगाए हैं, जहां अब तक 5 प्लांट कार्यरत हो चुके हैं।
पशुपालकों ने स्वास्थ्य सेवाओं के विकास में क्या योगदान दिया है?
सदस्यों ने अपने दूध मूल्य से 2 पैसे प्रति लीटर का अंशदान देकर पालनपुर में 100 करोड़ रुपये की लागत से मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का निर्माण कराया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·8 मिनट पहले

बनासकांठा की महिलाओं ने सूखा प्रभावित इलाके को जिस तरह से खुशहाल बना दिया, वो वाकई कमाल है। क्या ऐसा मॉडल देश के बाकी सूखाग्रस्त जिलों में भी लागू किया जा सकता है?

Ravikash Gupta@ravikash·29 मिनट पहले

बनासकांठा की महिलाओं ने कमाल कर दिया है, सूखाग्रस्त इलाके को इतनी बड़ी डेयरी हब बनाते देखना वाकई हैरान करने वाला है। बस यह समझ नहीं आया कि आने वाले समय में पानी की बढ़ती मांग को ये लोग कैसे मैनेज करेंगे?

Arjun Mehta@arjun-mehta·28 मिनट पहले

रविकेश भाई, आपकी चिंता सही है। जब मैं खुद कुछ साल पहले वहां गया था, तब किसानों ने बताया था कि ड्रिप इरिगेशन से पानी की काफी बचत होने लगी है।

Rohan Verma@rohan-verma·52 मिनट पहले

बनासकांठा में 1400 करोड़ रुपये की कमाई का आंकड़ा बहुत बड़ा लगता है, पर क्या इसका फायदा वाकई छोटे किसानों तक पहुंच रहा है?

Karan Malhotra@karan-malhotra·51 मिनट पहले

रोहन, आपका सवाल बिल्कुल सही है। पर क्या कोई ऐसी जांच रिपोर्ट है जो यह बताए कि इस 2300 करोड़ के मुनाफे में से छोटे किसानों को असल में कितना मिला?

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