दक्षिण कच्छ की खाड़ी में समुद्री जीवों का एक जीवंत संसार आकार ले रहा है, जहां डॉल्फिन की बढ़ती आबादी ने पर्यावरणविदों और वन्यजीव विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है। मरीन नेशनल पार्क और वाइल्डलाइफ सेंचुरी के समीपवर्ती इलाकों में अक्टूबर 2023 से फरवरी 2025 के बीच गीर फाउंडेशन द्वारा संचालित एक विस्तृत अध्ययन संपन्न हुआ। इस दीर्घकालिक सर्वे के परिणामों ने पुष्टि की है कि इस क्षेत्र में डॉल्फिन अब सबसे अधिक दिखाई देने वाला जलीय जीव बन चुकी हैं। पूरे अध्ययन काल के दौरान कुल 193 डॉल्फिन की उपस्थिति दर्ज की गई, जो तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के लिए एक सकारात्मक संदेश है। इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए गुजरात के वन और पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार मरीन बायोडायवर्सिटी के संरक्षण तथा समुद्री आवासों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह सतर्क एवं प्रतिबद्ध है।
समुद्री सर्वे के आंकड़े और प्रमुख तटीय इलाके
गुजरात के तटीय क्षेत्र में जलीय जीवन की विविधता का सटीक आकलन करने के लिए गीर फाउंडेशन की शोध टीमों ने विशेष नौकाओं के माध्यम से उथले तटीय जल तथा प्रवाल भित्तियों (रीफ) के किनारों का गहन निरीक्षण किया। इस वैज्ञानिक निगरानी के दौरान विभिन्न समुद्री जीवों के कुल 177 समूह देखे गए, जिनके अंतर्गत 342 समुद्री जीवों के आंकड़े विधिवत रिकॉर्ड किए गए। एकत्र किए गए आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण से यह तथ्य सामने आया कि कुल दर्ज मरीन जीवों में डॉल्फिन की हिस्सेदारी 36.2 प्रतिशत थी। क्षेत्रवार वितरण पर दृष्टि डालें तो नरारा रीफ का इलाका डॉल्फिन गतिविधियों का मुख्य केंद्र बनकर उभरा, जहां सर्वाधिक 39 डॉल्फिन देखी गईं। इसके अतिरिक्त पिरोटन आइलैंड तथा सिक्का के तटीय क्षेत्रों में भी डॉल्फिन के बड़े झुंडों की मौजूदगी निरंतर दर्ज की गई। वन विभाग के प्रधान सचिव विनोद राव ने इस भौगोलिक अनुकूलता का कारण स्पष्ट करते हुए बताया कि कच्छ की खाड़ी की तीव्र समुद्री धाराएं अपने साथ भारी मात्रा में पोषक तत्व और मछलियों की प्रजातियां बहाकर लाती हैं। भोजन की इस सहज उपलब्धता के कारण डॉल्फिन के लिए यहां शिकार करना और अपनी दैनिक ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करना बेहद आसान हो जाता है।
स्थाई निवास और देड़का-मुंडेका आइलैंड का मार्ग
शोध के दौरान प्राप्त वैज्ञानिक साक्ष्यों ने डॉल्फिन की आवाजाही को लेकर कई नए दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। गीर फाउंडेशन के डायरेक्टर बीपी पति ने अध्ययन के निष्कर्षों की व्याख्या करते हुए बताया कि डॉल्फिन की मौजूदगी किसी विशेष मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि वे पूरे वर्ष इस जलीय क्षेत्र में सक्रिय पाई गई हैं। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि डॉल्फिन की एक बड़ी आबादी ने इस क्षेत्र को अपना स्थाई अथवा अर्ध-स्थाई प्राकृतिक घर बना लिया है। पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से देड़का-मुंडेका आइलैंड को डॉल्फिन के आवागमन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री गलियारा माना गया है। इस द्वीप के आसपास मछलियों के बड़े-बड़े झुंड तैरते रहते हैं, जिनका पीछा करते हुए डॉल्फिन लगातार अपनी स्थिति बदलती रहती हैं। इस सर्वेक्षण के दौरान शोधकर्ताओं ने अत्याधुनिक कैमरों की मदद से डॉल्फिन के कई दुर्लभ सामाजिक व्यवहारों को भी रिकॉर्ड किया। तस्वीरों और वीडियो फुटेज में डॉल्फिन को सुसंगठित समूहों में तैरते हुए, समुद्री लहरों की गति के साथ तालमेल बिठाते हुए और शिकार के लिए रणनीतिक तकनीकों का प्रदर्शन करते हुए देखा गया है।
पारिस्थितिक संतुलन और भावी संरक्षण की रणनीति
कच्छ की खाड़ी का समुद्री वातावरण कई विशिष्टताओं का संगम है, जहां विस्तृत सीग्रास (समुद्री घास) के मैदान और प्राकृतिक समुद्री नहरें मिलकर एक अत्यंत गतिशील प्राकृतिक आवास का निर्माण करती हैं। इस प्राकृतिक संरचना के महत्व को रेखांकित करते हुए वाइल्डलाइफ के चीफ कंजरवेटर जयपाल सिंह ने कहा कि डॉल्फिन की जैविक गतिविधियों और निर्बाध आवाजाही के लिए खुले तटीय जल का विस्तृत क्षेत्र होना अनिवार्य शर्त है। यह खुला वातावरण उन्हें न केवल तैरने की स्वतंत्रता प्रदान करता है, बल्कि प्रचुर मात्रा में भोजन भी उपलब्ध कराता है। गीर फाउंडेशन के डिप्टी डायरेक्टर अमितकुमार नायक ने शोध के दुर्गामी प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि साल के अलग-अलग महीनों और बदलते मौसमों में डॉल्फिन की निरंतर उपस्थिति पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से एक अत्यंत शुभ संकेत है। इस सर्वेक्षण के माध्यम से संकलित वैज्ञानिक डेटा भविष्य में वन्यजीव संरक्षण की ठोस नीतियां तैयार करने के लिए एक मजबूत आधार रेखा प्रदान करेगा, जिससे कच्छ की खाड़ी के इस नाजुक समुद्री तंत्र को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखा जा सकेगा।





















