अदालतों में वर्षों से लंबित विवादों से मुक्ति पाने और नियमित पेशियों के झंझट को समाप्त करने के लिए लोक अदालत एक बेहद प्रभावी जरिया साबित हो रही है। सामान्य कानूनी प्रक्रियाओं में अक्सर साधारण झगड़ों को सुलझाने के चक्कर में पक्षों का धन और कीमती समय भारी मात्रा में नष्ट हो जाता है। ऐसे हालात में आपसी बातचीत और सहमति के आधार पर विवादों को हमेशा के लिए समाप्त कराने का विकल्प लोक अदालत प्रदान करती है। फरीदाबाद सेक्टर-12 कोर्ट के अधिवक्ता मोहन तिवारी के अनुसार, इस व्यवस्था की बुनियादी मंशा यही है कि न्यूनतम व्यय और त्वरित गति से विवादों का सौहार्दपूर्ण समाधान निकाला जा सके।
किन मुकदमों का हो सकता है निपटारा
लोक अदालत का मुख्य कार्यक्षेत्र समझौते के योग्य मामलों तक सीमित रहता है, जहां दोनों पक्षों की रजामंदी से विवाद सुलझाए जाते हैं। अधिवक्ता मोहन तिवारी ने स्पष्ट किया कि बैंक ऋण से जुड़े मामले, चेक बाउंस के विवाद, पारिवारिक अनबन तथा मोटर दुर्घटना से संबंधित क्लेम जैसे केस यहां आसानी से सुलझाए जा सकते हैं। इस मंच के माध्यम से विवाद निस्तारित होने पर वादियों को कई वर्षों तक अदालत के चक्कर काटने की मजबूरी से पूरी तरह निजात मिल जाती है। सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि लोक अदालत के मंच पर प्रकरण के निपटारे की पूरी प्रक्रिया पूर्णतः निःशुल्क संपन्न होती है।
गंभीर अपराधों में समझौते की अनुमति नहीं
कानूनी रूप से हर विवाद लोक अदालत में नहीं ले जाया जा सकता। मोहन तिवारी के मुताबिक, गंभीर प्रकृति के आपराधिक मामलों के साथ-साथ ऐसे सभी विवाद जिनमें कानूनी प्रावधानों के तहत सुलह या समझौते की इजाजत नहीं है, उनका निस्तारण लोक अदालत में संभव नहीं है। जो वाद पहले से किसी नियमित अदालत में विचाराधीन हैं, उन्हें लोक अदालत में स्थानांतरित कराने के लिए संबंधित अदालत में एक औपचारिक अर्जी दाखिल करनी होती है। इस स्थानांतरण के लिए दोनों पक्षों की आपसी सहमति होना अनिवार्य शर्त है, जिसके बाद न्यायालय द्वारा विधिवत प्रक्रिया पूरी कर पत्रावली लोक अदालत को भेज दी जाती है।
निर्णय की प्रकृति और अस्वीकृति की स्थिति
लोक अदालत की कार्यवाही की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी भी पक्ष पर फैसले के लिए अनुचित दबाव नहीं डाला जाता। जब दोनों पक्ष अपनी स्वेच्छा से सभी बिंदुओं पर एकमत होते हैं, तभी समझौते पर अंतिम मुहर लगाई जाती है। इस प्रक्रिया के लिए कोई अतिरिक्त फीस देय नहीं होती, हालांकि पहले किए जा चुके कानूनी खर्चों की वापसी मामले की परिस्थितियों और लागू नियमों के अधीन तय होती है। इस मंच से पारित सुलह-समझौते का निर्णय अंतिम माना जाता है और इसके विरुद्ध नियमित अपील का प्रावधान नहीं रहता, इसलिए पक्षों को सभी शर्तों को भलीभांति परखकर ही दस्तखत करने चाहिए। यदि किन्हीं कारणों से पक्षों में आम सहमति नहीं बन पाती, तो प्रकरण पुनः संबंधित नियमित अदालत को लौटा दिया जाता है, जहां साक्ष्यों एवं बहसों के आधार पर पूर्ववत सुनवाई जारी रहती है।





















