खेल की दुनिया में कभी-कभी हार खिलाड़ी को पूरी तरह तोड़ने के बजाय उसके भीतर एक नया हौसला फूंक देती है। हरियाणा के अंबाला से गहरा नाता रखने वाली 36 वर्षीय शॉटपुट खिलाड़ी मनप्रीत कौर के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जुलाई के महीने में आयोजित ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में मनप्रीत बेहद मामूली अंतर से कांस्य पदक जीतने से चूक गई थीं और चौथे स्थान पर रही थीं। इस हार से निराश होने के बजाय उन्होंने अपनी कमियों पर काम किया और महज दो महीने के भीतर अपनी मेहनत का लोहा मनवा दिया। जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन गेम्स में उन्होंने 17.17 मीटर दूर थ्रो फेंककर कांस्य पदक अपने नाम कर लिया। मनप्रीत के करियर का एशियन गेम्स में यह पहला पदक है, जिसने उनके खेल जीवन में एक नया अध्याय जोड़ दिया है।
कड़े मुकाबले में पोडियम तक का सफर
जापान में आयोजित इस प्रतियोगिता का फाइनल मुकाबला बेहद कड़ा था। महिलाओं की शॉटपुट स्पर्धा के फाइनल में भारतीय खिलाड़ी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। मनप्रीत ने अपने पहले तीन प्रयासों के बाद चौथे प्रयास में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। उनका चौथा थ्रो 17.17 मीटर की दूरी पर गिरा, जिसने उन्हें पदक की रेस में बनाए रखा और अंततः उन्हें पोडियम पर तीसरा स्थान दिलाया। इस स्पर्धा में चीनी एथलीटों का दबदबा देखने को मिला। चीन की सोंग जियायुआन ने 19.40 मीटर के भारी-भरकम थ्रो के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि उनकी हमवतन झांग लिनरू ने 18.14 मीटर का थ्रो कर रजत पदक पर कब्जा जमाया। मनप्रीत के इस शानदार प्रदर्शन की खबर मिलते ही अंबाला से लेकर उनके पूरे परिवार में जश्न का माहौल बन गया है।
अंधेरे में शुरू होती थी कड़ी ट्रेनिंग
मनप्रीत का जन्म पंजाब के पटियाला जिले में हुआ था, लेकिन साल 2004 के बाद से वह अपने पति के साथ अंबाला में ही रहने लगी थीं। वर्तमान में अपनी सरकारी नौकरी के कारण वह पिछले कुछ वर्षों से वापस पटियाला में शिफ्ट हो चुकी हैं। उनकी इस बड़ी कामयाबी पर परिवार के सदस्य उनके पुराने दिनों के संघर्षों को याद कर भावुक हो रहे हैं। वह वह दौर था जब मनप्रीत परिवार और घर की तमाम जिम्मेदारियों को संभालते हुए रोज सुबह तड़के अंधेरे में ही अंबाला के खेल स्टेडियम के लिए निकल जाया करती थीं।
मनप्रीत की बुआ सास चरणजीत कौर ने उनके इस लंबे संघर्ष के बारे में बताया कि उन्हें अपनी बहू की इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर बेहद गर्व महसूस हो रहा है। मनप्रीत पहले भी कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर परिवार और देश का मान बढ़ा चुकी हैं, लेकिन एशियन गेम्स की इस जीत का महत्व बेहद खास है। उन्होंने याद करते हुए बताया कि साल 2004 में जब मनप्रीत अंबाला में रहती थीं, तब वह रोजाना सुबह करीब 4 बजे प्रैक्टिस के लिए स्टेडियम चली जाती थीं। इसके बाद घर लौटकर परिवार की सभी जिम्मेदारियां निभाती थीं और फिर शाम को भी मैदान पर जाकर कई घंटों तक पसीना बहाती थीं।
पति बने कोच और दिया पूरा साथ
पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, कुछ साल पहले रेलवे में नौकरी मिलने के बाद मनप्रीत अपने पति करमजीत सिंह के साथ पटियाला चली गई थीं। दोनों वर्तमान में भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं और उनकी 15 साल की एक बेटी है जिसका नाम जश्नूर कौर है। मनप्रीत की इस सफलता के पीछे उनके पति का भी बड़ा योगदान है। करमजीत सिंह खुद शॉटपुट के राष्ट्रीय स्तर के पदक विजेता रह चुके हैं। खेल की बारीकियों को समझने के कारण वह अब अपनी पत्नी के कोच की भूमिका निभा रहे हैं। रोजाना रेलवे की नौकरी की व्यस्तता के बीच अपनी पत्नी को मैदान पर ट्रेनिंग देना और उनकी कमियों को सुधारना उनके दैनिक जीवन का मुख्य हिस्सा बन चुका है।
इस बड़ी जीत के बाद करमजीत सिंह ने पटियाला से अपनी बुआ और फूफा को फोन कर यह खुशखबरी साझा की। फोन पर बातचीत के दौरान पूरे परिवार में भारी उत्साह देखा गया। बुआ ने उन्हें इस जीत की बधाई देते हुए कहा कि मनप्रीत ने बहू नहीं बल्कि बेटी बनकर पूरे परिवार का सिर गर्व से ऊंचा किया है। अब पूरा परिवार उनकी सफलता के लिए गुरुद्वारा साहिब जाकर अरदास करने और पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बांटकर इस पल को मनाने की तैयारियों में जुट गया है।
मुश्किल दौर से उबरकर की शानदार वापसी
मनप्रीत के ससुर मनजीत सिंह ने अपने बेटे और बहू के इस सफर पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि उनका बेटा करमजीत खुद एक बेहतरीन खिलाड़ी था, लेकिन स्वास्थ्य खराब होने और बीमारी की वजह से उसे समय से पहले ही खेल से दूरी बनानी पड़ी। इसके बावजूद उसने अपनी पत्नी के सपनों को कभी टूटने नहीं दिया और मनप्रीत की प्रैक्टिस को लगातार जारी रखा। दोनों पति-पत्नी रेलवे की अपनी नौकरी के साथ-साथ खेल को भी पूरी शिद्दत से आगे बढ़ा रहे हैं। अंबाला में एक लंबा वक्त बिताने के बाद अब दोनों पटियाला में हैं, लेकिन अंबाला का परिवार उनके लौटने का बेसब्री से इंतजार कर रहा है और उनके वापस आने पर ढोल-नगाड़ों के साथ भव्य स्वागत की तैयारी की जा रही है।
मनप्रीत के लिए खेल की यह राह कभी भी फूलों की सेज नहीं रही। साल 2017 में उनके करियर में तब एक बड़ा भूचाल आया जब वह एक डोपिंग टेस्ट में असफल पाई गईं। इसके बाद उन पर चार साल का कड़ा प्रतिबंध लगा दिया गया था। इतने लंबे समय तक मुख्यधारा के खेल और मैदान से दूर रहने के बाद किसी भी एथलीट के लिए वापसी करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन मनप्रीत ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने प्रतिबंध खत्म होने के बाद मैदान पर दोबारा कदम रखा और खुद को साबित किया। साल 2023 में आयोजित एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतना उनकी इस मजबूत वापसी का पहला बड़ा प्रमाण था।
अगला लक्ष्य है 18 मीटर का थ्रो
सात बार की नेशनल चैंपियन रह चुकीं मनप्रीत का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 18.06 मीटर का रहा है। कॉमनवेल्थ गेम्स में 17.49 मीटर के थ्रो के साथ चौथे स्थान पर रहने की मायूसी को उन्होंने अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। एशियन गेम्स में 17.17 मीटर का थ्रो फेंककर उन्होंने यह साफ कर दिया कि खेल के मैदान पर अनुभव, निरंतरता और कड़ी मेहनत का कोई दूसरा विकल्प नहीं होता है। अब मनप्रीत का अगला बड़ा लक्ष्य अपने थ्रो को फिर से 18 मीटर के पार ले जाना है। उनके परिवार के लिए यह सिर्फ एक कांस्य पदक नहीं है, बल्कि उन अनगिनत रातों और सुबह के संघर्षों की कहानी है जिसकी नींव कभी अंबाला की सर्द सुबहों में रखी गई थी।




















