अंबाला में गणेश चतुर्थी का पावन त्योहार जैसे-जैसे पास आ रहा है, वैसे ही बाजारों में विघ्नहर्ता बप्पा की अलग-अलग रंगों और रूपों वाली मूर्तियों की रौनक बढ़ गई है। शहर के बाजारों में पारंपरिक रूप से लेकर आधुनिक और मनमोहक अंदाज में सजी भगवान गणेश की प्रतिमाएं हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच रही हैं। हालांकि अंबाला के इस बाजार में कुछ ऐसी मूर्तियां भी मौजूद हैं, जिनके सृजन में केवल मिट्टी और रंगों का मेल नहीं है, बल्कि इसके पीछे तीन दशकों से अधिक की कड़ी मेहनत, पारिवारिक कला और भगवान के प्रति अगाध श्रद्धा शामिल है।
तीन दशकों से अधिक समय से जारी है परंपरा
हरियाणा के इस शहर में बीते लगभग 35 वर्षों से राजस्थान के जयपुर से ताल्लुक रखने वाला एक हुनरमंद परिवार भगवान श्री गणेश की भव्य और सुंदर प्रतिमाएं गढ़ने का काम कर रहा है। मुख्य मूर्तिकार रमेश और उनके परिवार के सदस्य चिकनी मिट्टी और चाक की मिट्टी का उपयोग करके बप्पा की ऐसी कलात्मक मूर्तियां तैयार करते हैं, जिन्हें बुक कराने और खरीदने के लिए हर साल दूर-दराज के इलाकों से श्रद्धालु अंबाला खींचे चले आते हैं। रमेश बताते हैं कि यह कला उनके लिए कोई नया हुनर नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही उनकी पैतृक विरासत का एक अहम हिस्सा है। उनके पूर्वज राजस्थान में पत्थरों को तराशकर विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाने का काम किया करते थे। जैसे-जैसे वक्त बदला, परिवार ने पत्थर के साथ-साथ मिट्टी की मूर्तियां गढ़ने की दिशा में कदम बढ़ाया और आज से करीब 35 साल पहले अंबाला को अपनी आजीविका और कर्मभूमि बना लिया।
मिट्टी के साधारण ढेर से सजते हैं बप्पा
मूर्तिकार रमेश साझा करते हैं कि गणेश चतुर्थी के पावन पर्व से लगभग चार महीने पहले ही उनके परिवार के सदस्यों के हाथ मिट्टी से जुड़ जाते हैं। इस लंबी अवधि में मिट्टी का एक साधारण और बेजान ढेर धीरे-धीरे भगवान गणेश के बेहद मनमोहक और अलौकिक स्वरूप में तब्दील हो जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में रमेश अकेले नहीं होते, बल्कि उनके परिवार के बेटे और बहू भी पूरी लगन के साथ इस काम में उनका हाथ बंटाते हैं। इस तरह एक अकेली भव्य प्रतिमा के तैयार होने के पीछे पूरे परिवार का कई दिनों का श्रम, समर्पण और कला के प्रति निष्ठा जुड़ी होती है।
दो से दस फीट तक की विशाल मूर्तियां
इस साल रमेश ने अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए करीब 2 फीट से लेकर 10 फीट तक की विभिन्न साइज की गणेश प्रतिमाएं तैयार की हैं। इनमें से कई विशेष डिजाइन श्रद्धालुओं के बीच मुख्य आकर्षण का बड़ा केंद्र बने हुए हैं। उन्होंने बताया कि इस सीजन में मोरपंखी गणेश, भगवान शिव के स्वरूप वाले गणेश, शेषनाग के साथ विराजित गणेश और मुंबई के मशहूर लालबाग के राजा की तर्ज पर गढ़ी गई प्रतिमाओं को लोग बहुत पसंद कर रहे हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र की समृद्ध संस्कृति से प्रेरित मूषक राजा डिजाइन वाली गणेश मूर्तियां भी खरीदारों का भरपूर ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर रही हैं।
हर साल पेश किए जाते हैं नए डिजाइन
रमेश का कहना है कि वे हर साल गणेश उत्सव के लिए करीब 10 से 12 बिल्कुल नए और अलग डिजाइन तैयार करते हैं, ताकि उनके यहां आने वाले भक्तों को हर बार कुछ नया और अनूठा देखने को मिले। इस बार खासतौर पर भगवान भोलेनाथ के रूप से प्रेरणा लेकर एक नई गणेश प्रतिमा को रूप दिया गया है, जिसे देखने के लिए लोग खासे उत्सुक नजर आ रहे हैं।
पड़ोसी राज्यों तक फैली है कला की ख्याति
अंबाला के स्थानीय बाजारों में बिकने वाली इन मूर्तियों की मांग केवल हरियाणा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पंजाब, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से भी बड़ी संख्या में लोग गणेश प्रतिमाएं लेने के लिए विशेष तौर पर यहां पहुंचते हैं। इसके साथ ही महाराष्ट्र से ताल्लुक रखने वाले ऐसे सैनिक और नागरिक जो वर्तमान में अंबाला में अपनी सैन्य सेवाएं दे रहे हैं, वे भी हर साल रमेश के पास आकर गणपति बप्पा की प्रतिमा अपने साथ ले जाते हैं।
रोजी-रोटी के साथ गहरी आस्था का संगम
रमेश मानते हैं कि उनके लिए यह काम केवल पेट भरने का साधन या रोजी-रोटी का जरिया नहीं है, बल्कि यह उनकी सच्ची आस्था का प्रतीक है। जब लगातार कई दिनों की मेहनत के बाद मिट्टी से भगवान गणेश का मुखमंडल पूरी तरह आकार ले लेता है और कोई भक्त श्रद्धा के साथ उसे अपने घर ले जाने के लिए चुनता है, तब उन्हें ऐसा महसूस होता है कि उनकी महीनों की तपस्या सफल हो गई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गणेश चतुर्थी का पर्व समाप्त होने के बाद भी उनके परिवार के हाथों को आराम नहीं मिलता, क्योंकि इसके तुरंत बाद दीपावली के पावन अवसर के लिए मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की मूर्तियां तथा विभिन्न प्रकार की सजावटी वस्तुएं तैयार करने का सिलसिला शुरू हो जाता है। यही कला उनके परिवार की आजीविका भी है और सदियों पुरानी उनकी विशिष्ट पहचान भी है।



















