त्योहारी सीजन में घरों को रोशन करने वाले पारंपरिक मिट्टी के कारीगर फरीदाबाद में इस बार गहरी आर्थिक परेशानी का सामना कर रहे हैं। करवा चौथ और अहोई अष्टमी जैसे पर्वों पर मिट्टी के करवे, दीये और मटके बेचकर साल भर के बड़े मुनाफे की आस लगाने वाले कुम्हार परिवारों को बाजार की सुस्ती ने मायूस कर दिया है। पूरे दिन चाक पर पसीना बहाने, बर्तनों को धूप में सुखाने, भट्टी में पकाने और फिर बाजार तक ढोने की भारी मशक्कत के बावजूद कारीगरों को उनकी लागत के बराबर भी दाम नहीं मिल पा रहे हैं। कच्ची मिट्टी की बढ़ती कीमतों और खरीदारों की ओर से की जा रही अत्यधिक मोलभाव ने उनकी बचत को पूरी तरह खत्म कर दिया है।
लागत के मुकाबले ग्राहकों की भारी मोलभाव
बल्लभगढ़ स्थित कुम्हार मोहल्ले के कारीगरों का कहना है कि त्योहारी सीजन में खरीदार मिट्टी के बर्तनों की कीमत गिराकर मांग रहे हैं। लाडो देवी के अनुसार साधारण बिना रंग वाले जिस करवे की कीमत 30 रुपये रखी गई है, उसके लिए ग्राहक केवल 10 रुपये या 20 रुपये देने की जिद करते हैं। वहीं 50 रुपये में बिकने वाले रंगे हुए करवे पर खरीदार 30 से 40 रुपये की पेशकश करते हैं। पूजा के साधारण दीयों की कीमत महज 1 रुपये प्रति पीस होने के बावजूद लोग 10 रुपये में 15 दीये मांगते हैं। इस तरह के औने-पौने दामों में सामान बेचने से न तो मिट्टी और ईंधन का खर्च निकल पाता है और न ही दिनभर की मजदूरी हाथ आती है।
कच्चे माल की महंगाई और घटती बिक्री
बल्लभगढ़ के कुम्हार मोहल्ले की निवासी बुलबुल गोला बताती हैं कि पिछले साल की तुलना में इस बार कारोबार में भारी गिरावट दर्ज की गई है। दूर-दराज से मिट्टी मंगवाने, उसे तैयार करने और फिर बर्तनों को पकाने में लगने वाले ईंधन के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। इसके विपरीत जब तैयार माल बाजार में पहुंचता है, तो खरीदारों की संख्या काफी कम दिखती है। जो लोग खरीदारी करने आते भी हैं, वे उत्पादन में लगी मेहनत को समझे बिना बेहद सस्ते में सामान चाहते हैं। स्थिति यह हो गई है कि जितनी मेहनत पूरा परिवार मिलकर करता है, शाम तक उतनी बुनियादी आमदनी भी नहीं जुट पाती।
बाजार में नए विक्रेताओं के आने से बंटा कारोबार
त्रिवेणी देवी और ऊषा देवी बताती हैं कि पहले गलियों और आवासीय कॉलोनियों में घूम-घूमकर भी सामान बिक जाता था, लेकिन अब केवल मुख्य बाजार में ही थोड़ी-बहुत बिक्री हो रही है। पारंपरिक रूप से खुद मिट्टी तैयार कर बर्तन बनाने वालों के सामने अब यह चुनौती भी है कि बाजार में कई अन्य विक्रेता भी तैयार मिट्टी के बर्तन बेचने लगे हैं। इससे पारंपरिक कारीगरों का ग्राहक वर्ग बंट गया है। त्रिवेणी देवी खुद भी मिट्टी के बर्तन बनाने के साथ-साथ तैयार उत्पाद खरीदकर बेचती हैं, लेकिन कम लाभ मार्जिन के चलते दुकान का खर्च चलाना भी कठिन हो गया है।
पुश्तैनी काम से दूर होती नई पीढ़ी
कुम्हार परिवारों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि उनका पुश्तैनी हुनर अब आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं रह गया है। मिट्टी की बढ़ती कीमतें, भारी शारीरिक श्रम और नाममात्र के मुनाफे को देखते हुए युवा पीढ़ी इस काम को अपनाने से कतरा रही है। कारीगरों का मानना है कि यदि बाजार में हस्तशिल्प और मिट्टी के काम को वाजिब कीमत नहीं मिली, तो आने वाले वर्षों में परिवार के युवा इस पुश्तैनी पेशे को हमेशा के लिए छोड़ देंगे।





















